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तवलीन सिंह का कॉलम वक़्त की नब्ज़ : हकीकत और फसाने

ईसाई सुरक्षित हुए तो मोहम्मद अखलाक की निर्मम हत्या हुई और यहां से सिलसिला चला मुसलमानों को असुरक्षित साबित करने का।

Author नई दिल्ली | April 24, 2016 08:47 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (पीटीआई फाइल फोटो)

पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री से मुलाकात हुई बहुत दिनों बाद। मेरी एक नई किताब छपी है भारतीय राजनीति पर, जिसका मुख्य संदेश है परिवर्तन की आवश्यकता प्रशासन के हर महकमे में, देश के हर क्षेत्र में। सो, प्रधानमंत्री को इस किताब की पहली प्रति देने गई, क्योंकि 2014 वाले आम चुनाव में मेरा विश्वास है कि नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत मिला परिवर्तन के नाम पर। प्रधानमंत्री से मिलने के बाद हैरान हुई कि मोदी वही मोदी हैं, जिनसे एकांत में मेरी मुलाकात पिछली बार तीन साल पहले गांधीनगर में हुई थी। हैरान इसलिए हुई, क्योंकि मीडिया में काफी दिनों से खबर है कि प्रधानमंत्री बन जाने के बाद मोदी बिलकुल बदल गए हैं।

मीडिया के इस प्रचार का इतना असर हुआ है कि दिल्ली के आला सरकारी दफ्तरों में भी बात फैल गई है कि गुजरात का यह चायवाला प्रधानमंत्री निवास पहुंचने के बाद अपने आपको बादशाह समझने लगा है। मैंने इस बात का जिक्र किया प्रधानमंत्री से, तो उन्होंने मुझे दो किस्से सुनाए। एक था उस समय का, जब वे दिल्ली में किसी भाजपा सांसद के गैराज में रहते थे और जमीन पर सोया करते थे एक चटाई पर। बहुत सुबह उनसे एक पत्रकार मिलने आए, यह देखने के लिए कि वे वास्तव में इतने साधारण तरीके से रहते हैं या नहीं। लेकिन जब सच मालूम हुआ तो उन्होंने इस बारे में एक शब्द नहीं लिखा।

फिर दो वर्ष पहले एक अंगरेजी अखबार के पत्रकार अमदाबाद पहुंचे और मोदी के दर्जी से मिले और उस दुकान में गए, जहां से वे अपनी ऐनक बनवाते हैं। जब मालूम हुआ कि ऐनक सिर्फ छह सौ रुपयों की थी और कुर्ते पैजामे भी बिलकुल साधारण, तो इस पत्रकार ने भी एक शब्द नहीं लिखा इस बारे में। दिल्ली के मेरे कई पत्रकार बंधु मानते हैं आज भी कि मोदी की ऐनक, उनकी घड़ी और उनकी जेब में जो पेन है वो सब कीमती विदेशी डिजाइनरों के बनाए हुए हैं। इस झूठ को खूब फैलाया गया है।

प्रधानमंत्री के साथ लंबी बातचीत हुई और बिलकुल वैसे जैसे गांधीनगर में हुई थी। इस बातचीत के दौरान न उनका कोई अफसर अंदर आया और न ही उन्होंने सेलफोन पर किसी से बात की। इंटरव्यू नहीं था, निजी बातचीत थी, सो मुझे आपको यह नहीं बताना है कि हमने किन-किन विषयों पर बातचीत की। इस मुलाकात का जिक्र यहां इसलिए कर रही हूं यह साबित करने की कोशिश में कि मोदी की छवि और यथार्थ में कितना फासला है।

कुछ दोष प्रधानमंत्री का है। मोदी दूर रहते हैं हम पत्रकारों से, इसलिए कि 2002 दंगों को हमने ऐसे पेश किया जैसे 1947 के बाद पहली बार इस पैमाने पर हिंसा और मुसलमानों के साथ जुल्म हुआ हो। यह भी हमने कहा है बिना सबूत के कि हिंसा मोदी की मर्जी से कराई गई थी। दोनों चीजें गलत साबित हुई हैं, लेकिन पत्रकारिता की दुनिया में अब भी अधिकतर लोग ऐसे हैं जो मोदी को 2002 वाले दंगों के लिए जिम्मेवार ठहराते हैं। सो, मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद हमने शुरू से उनको बदनाम करने की कोशिश की है। पहले दिनों में जब एक-दो गिरजाघरों पर हमले हुए थे, हमने इस खबर को सुर्खियों में इतने दिन रखा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोग कहने लगे कि भारत में ईसाई लोग सुरक्षित नहीं हैं।

ईसाई सुरक्षित हुए तो मोहम्मद अखलाक की निर्मम हत्या हुई और यहां से सिलसिला चला मुसलमानों को असुरक्षित साबित करने का। अब जब मुसलमानों के रहनुमाओं और मौलवियों ने ऊंची आवाजों में कह दिया है कि मुसलमान कभी भारत माता की जय नहीं कह सकते, तो बारी आई है दलितों की। हैदराबाद विश्वविद्यालय के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या दर्दनाक थी, पर इससे पहले भी दलित छात्रों ने अपनी जानें ली हैं इसी विश्वविद्यालय में और हम उनके नाम तक नहीं जानते। स्पष्ट शब्दों में कहना चाहूंगी के ऐसे हादसे कांगे्रस राज में बहुत बार हो चुके हैं और हम पत्रकारों ने इनको कोई अहमियत नहीं दी। अब अगर दे रहे हैं तो इसलिए कि अब भी हम नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों का खलनायक मानते हैं। और चूंकि प्रधानमंत्री का हम पत्रकारों से तकरीबन कोई रिश्ता नहीं है, हम लगे रहते हैं उनको बदनाम करने में इस बात की भी परवाह न करके कि बदनाम भारत देश भी हो रहा है।

अब जब असहनशीलता का मुद्दा पुराना हो गया है, ईसाई और मुसलिम लोग भी सुरक्षित हैं और कन्हैया कुमार जैसे छात्र जगह-जगह भाषण दे रहे हैं बिना किसी रोकटोक के, तो नया मुद्दा यह बन रहा है दिल्ली के मीडिया गलियारों में कि मोदी तानाशाह हैं और उनके मंत्री छोटे फैसले भी उनसे पूछे बिना नहीं कर सकते। मैं उनमें से हूं जो जानती हूं कि यह बिलकुल झूठ है, लेकिन प्रधानमंत्री अगर चाहते हैं कि उनके अच्छे कार्यों को, उनकी परिवर्तन लाने की योजनाओं पर मीडिया ज्यादा ध्यान दे, तो उनको नए सिरे से मीडिया से रिश्ता जोड़ना होगा।

मीडिया आजकल इतना शक्तिशाली है कि अगर किसी राजनेता की छवि बिगाड़ने में लग जाए तो अक्सर सफल होता है। यह नहीं कह रही हूं मैं कि मोदी रोज किसी न किसी विषय पर हमसे मुखातिब हों, लेकिन यह जरूर कह रही हूं कि मोदी को अपने घर में एक मीडिया टीम तैयार करनी होगी, जो पत्रकारों से रोज मिलने का काम करे, ताकि गलतफहमियां फौरन दूर हों। मोदी को इस बात पर भी विचार करना होगा कि इंटरव्यू न देकर उनका नुकसान ज्यादा हुआ है कि हम मीडियावालों का। लोकतांत्रिक देशों में जब प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति दूर रहते हैं पत्रकारों से, तो अक्सर नुकसान उनका ही होता है।

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