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वक्त की नब्जः जो झूठ का सहारा ले रहे हैं

मोदी ने कई गलतियां की हैं प्रधानमंत्री बनने के बाद। इन गलतियों की आलोचना जायज है और हुई भी है शुरू से। विदेश और रक्षा नीतियों में जब भी गलती दिखी है, तो दोष सीधा मोदी पर लगाया गया है। इसलिए मेरी समझ से बाहर है कि उन पर झूठे आरोप लगाने की जरूरत क्या है!

Author September 9, 2018 2:59 AM
शुरू से कोई न कोई मुद्दा उछाला गया है मोदी को बदनाम करने के मकसद से और मोदी ने खुद गलतियां भी की हैं, जिनकी खूब आलोचना होती रही है।

किसी प्रधानमंत्री का कार्यकाल जब पूरा होने को आ रहा हो तो आलोचना के लिए मुद्दे अक्सर अनेक होते हैं। सो, समझ में नहीं आता कि नरेंद्र मोदी को लेकर उनके आलोचक झूठ का सहारा क्यों ले रहे हैं। आलोचक कई किस्म के हैं मोदी के। वापमंथी हैं, जिनकी राजनीतिक विचारधारा उनसे नहीं मिलती है। कांग्रेसी हैं, जिनकी नजरों में मोदी उस जगह पर बैठे हैं, जिस पर उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। भारतीय जनता पार्टी के कुछ पूर्व मंत्री हैं, जिनको आज तक तकलीफ होती है कि मोदी ने उनको मंत्री क्यों नहीं बनाया। और हम मीडियावालों में तो उनके प्रशंसक ढूंढ़ना मुश्किल है। सो, शुरू से कोई न कोई मुद्दा उछाला गया है मोदी को बदनाम करने के मकसद से और मोदी ने खुद गलतियां भी की हैं, जिनकी खूब आलोचना होती रही है। लेकिन जब आरोप उन पर लगता है लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का, तो उनकी तरफदारी करना मैं अपना फर्ज मानती हूं। इसलिए कि यह झूठ है।

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लोकतांत्रिक संस्थाओं में सबसे ऊपर है संसद। माना कि पिछले चार वर्षों में लोकतंत्र के इस मंदिर में बहस कम हुई है और हल्लागुला बहुत ज्यादा। इसका दोष लेकिन मोदी पर अगर डाला जाए तो सिर्फ इसको लेकर कि पूर्ण बहुमत के बावजूद उन्होंने क्यों चौवालीस कांग्रेसी सांसदों को इतना हल्ला मचाने दिया कि संसद सत्र कई बार बेकार गए हैं। आपने अगर ध्यान दिया है संसद की कार्यवाही पर तो देखा होगा कि लोकसभा में शांति तभी दिखती है जब कांग्रेस अध्यक्ष या उनकी माताजी बोलना चाहते हैं। सो, संसद को न चलने का दोष अगर किसी के सिर थोपना हो तो कांग्रेस के सिर थोपा जाएगा। संसद के बाद बारी आती है न्यायतंत्र की।

मोदी के आलोचक उन पर आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को ठीक से नहीं चलने दिया है। सबूत देते हैं उन चार वरिष्ठ जजों की प्रेस कान्फ्रेंस की, जिसमें उन्होंने खुल कर कहा था कि प्रधान न्यायाधीश ने पीठों के चयन में गड़बड़ी की है। यह कहते हुए उन्होंने माना कि पीठों का चयन करना प्रधान न्यायाधीश का अधिकार है, लेकिन फिर भी उनकी इस बात को ऐसा बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया कि विदेशी अखबार तक लिखने लगे कि मोदी न्यायतंत्र में दखल दे रहे हैं। मुझसे पूछें तो मैं स्पष्ट शब्दों में कहने को तैयार हूं कि इन चार जजों ने गलत किया। प्रेस कान्फ्रेंस बुलाते यह समझाने के लिए कि न्यायालयों में सुधार लाने की गंभीर जरूरत है, ताकि मुकदमे दशकों तक न चलें। या बुलाते यह स्वीकार करने के लिए कि अदालतों के दरवाजों तक नहीं पहुंचने के काबिल हैं भारत के अधिकतर गरीब नागरिक, तो उनको सलाम मैं भी करती। पीठों के चयन को लेकर शिकायतें करने से न सर्वोच्च न्यायालय का भला किया, न देश का।

मोदी पर आरोप ये भी लग रहे हैं इन दिनों कि वे इतने बड़े तानाशाह हैं कि अपने मंत्रियों से भी सलाह नहीं लेते हैं नोटबंदी जैसे गंभीर फैसले से पहले। यह बात है तो सही, लेकिन यह भी बात सही है कि जब नोटबंदी से हासिल कुछ खास नहीं हुआ तो मोदी ने चुप करके अपने आप पर हुए निजी हमले बर्दाश्त किए हैं। राहुल गांधी ने आरोप उन पर यहां तक लगाया है कि उन्होंने नोटबंदी करवाई सिर्फ इसलिए कि वे जनता के पैसे चुरा कर अपने उद्योगपति दोस्तों को देना चाहते थे। बेतुका आरोप है, लेकिन मोदी ने जवाब में कुछ नहीं कहा है अभी तक। कहने का मतलब है कि अगर फैसले अकेले ले रहे हैं, तो गलतियों का दोष भी स्वयं बर्दाश्त कर रहे हैं।

अब चलिए मीडिया की तरफ। मेरे कई पत्रकार बंधु हैं, जो कहते हैं कि आलोचना जब भी वे करते हैं सरकार की, तो उनको अधिकारियों के फौरन फोन आ जाते हैं अपने दायरे में रहने के लिए। कहते हैं कि कुछ संपादकों ने अपनी नौकरियां तक गंवाई हैं सिर्फ इसलिए कि उन्होंने मोदी की नीतियों की आलोचना की है। सबूत नहीं हैं मेरे पास ऐसी चीजें के, लेकिन इतना जरूर कह सकती हूं कि स्मृति ईरानी ने अपनी नौकरी तब गंवाई थी जब उन्होंने बतौर सूचना मंत्री पत्रकारों को औपचारिक तौर पर धमकाने की कोशिश की थी। यह भी कहना जरूरी है कि एक भी प्रेस कान्फ्रेंस न करके और इतने कम इंटरव्यू देकर प्रधानमंत्री ने अपना नुकसान ज्यादा किया है और मीडिया का कम।

आखिरी आरोप उन पर लग रहा है कि शिक्षा संस्थाओं में वे अपनी सोच- यानी संघ की सोच- के व्यक्ति नियुक्त कर रहे हैं। ये ऐसी संस्थाएं हैं, जहां पर एक ही सोच के लोग नियुक्त होते आए हैं पिछले सत्तर वर्षों से। वामपंथी सोच इतनी छाई रही है इन जगहों पर कि अगर किसी अलग सोच के लोग आने लगे हैं, तो इसका हमको स्वागत करना चाहिए। विश्वविद्यालयों में आखिर बहस तभी होगी न, जब अलग-अलग सोच के लोग बैठ कर आपस में बातें करेंगे। चर्चाओं में सिर्फ एक ही सोच के लोग रहेंगे तो बहस कहां से होगी? नई सोच कहां से पैदा होगी?

मोदी ने कई गलतियां की हैं प्रधानमंत्री बनने के बाद। इन गलतियों की आलोचना जायज है और हुई भी है शुरू से। गोरक्षकों की हिंसा पर चुप रहे हैं, तो उन पर आरोप लगा है नेतृत्व न दिखाने का। नोटबंदी से जिन छोटे व्यापारियों और किसानों को नुकसान हुआ है उसको लेकर भी खूब आलोचना हुई है और आज भी हो रही है। विदेश और रक्षा नीतियों में जब भी गलती दिखी है, तो दोष सीधा मोदी पर लगाया गया है। इसलिए मेरी समझ से बाहर है कि उन पर झूठे आरोप लगाने की जरूरत क्या है!

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