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तवलीन सिंह का कॉलम वक़्त की नब्ज़ : अब खामोशी टूटनी चाहिए

अखलाक की बेटी शाइस्ता ने पंद्रह लोगों की शिनाख्त भी की है, जिनमें से एक-दो लड़के भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं के रिश्तेदार हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मोहम्मद अखलाक को किसी भीड़ ने नहीं मारा था..

Author नई दिल्ली | December 27, 2015 5:50 PM
गोमांस खाने की अफवाह फैलने के बाद आक्रोशित भीड़ के हमले में मोहम्मद अखलाक की मौत हो गई थी। (फाइल फोटो)

इसलिए कि यह 2015 का मेरा आखिरी लेख है, इरादा था मोदी सरकार के दूसरे वर्ष का विश्लेषण करने का। लेकिन लिखने बैठी ही थी कि इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर मोहम्मद अखलाक की हत्या के बारे में पढ़ा, उसकी बेटी शाइस्ता की जबानी। अदालत में बयान दर्ज कराते वक्त शाइस्ता ने मजिस्ट्रेट के सामने कहा कि अट्ठाईस सितंबर की रात कोई दस बजे जब पूरा परिवार सोने वाला था, उनके घर में पंद्रह-बीस लोग घुस आए और उसके पिता और भाई दानिश को बाहर घसीट कर ले जाने से पहले सारे घर में मिट्टी का तेल छिड़का। ‘उन्होंने जाते समय धमकी दी कि हम अगर पुलिस के पास जाएंगे, तो हमको भी मारा जाएगा।’

शाइस्ता ने पंद्रह लोगों की शिनाख्त भी की है, जिनमें से एक-दो लड़के भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेताओं के रिश्तेदार हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि मोहम्मद अखलाक को किसी भीड़ ने नहीं मारा था। उसके हत्यारे गांव के जाने-पहचाने लोग थे, जिनका वास्ता था भारतीय जनता पार्टी से। सो, अब अगर प्रधानमंत्री इनको अपनी पार्टी से नहीं निकालते हैं, तो संदेश जाएगा कि जिस बीफ पर प्रतिबंध को लेकर मोहम्मद अखलाक की हत्या हुई थी, उस प्रतिबंध को प्रधानमंत्री का समर्थन है। मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद प्रधानमंत्री की चुप्पी उनको महंगी पड़ी है और अब अगर चुपके से हत्यारों के परिजन भारतीय जनता पार्टी के सदस्य बने रहते हैं तो नरेंद्र मोदी का वह ‘सबका साथ, सबका विकास’ वाला नारा खोखला माना जाएगा।

एक नए साल की शुरुआत अगर ऐसे होगी, तो न देश के लिए अच्छा होगा, न नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए। मुसलमानों की आबादी इतनी बड़ी है भारत में कि इंडोनेशिया के बाद हमारे देश में दुनिया के सबसे ज्यादा मुसलिम रहते हैं। इनको अगर लगने लगे कि मोदी सरकार सिर्फ हिंदुओं के लिए है, तो ऐसी अराजकता फैलेगी कि देश का सारा माहौल बदल जाएगा। अगर प्रधानमंत्री अब भी नहीं समझे हैं कि मोहम्मद अखलाक की हत्या ने उनको व्यक्तिगत तौर पर कितना नुकसान पहुंचाया है, तो बेहतर होगा कि वे जल्दी समझने की कोशिश करें।

साथ में यह भी तय कर लें मोदी कि भारत में बीफ पर प्रतिबंध लगना चाहिए कि नहीं। फिलहाल स्थिति यह है कि यह प्रतिबंध चुपके से लग चुका है, लेकिन स्पष्ट तौर पर नहीं। सो, दिल्ली के एक जापानी रेस्तरां में मैंने जब बीफ मांगा, तो मुझे बताया गया कि अब नहीं रखते हैं बीफ, क्योंकि उनको डर है कि खबर अगर कट्टरपंथी हिंदुत्ववादी लोगों तक पहुंचती है, तो रेस्तरां पर हमला हो सकता है। मुंबई के किसी भी रेस्तरां में बीफ नहीं मिलता है, जबसे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने जैनियों के पर्यूषण पर्व के बहाने प्रतिबंध लगाया था शहर भर में।

उनके यह कदम उठाने के बाद ही देश भर में कट्टरपंथी हिंदुओं ने मुहिम चलाई थी, जिसका खास निशाना बने मुसलिम लोग। लेकिन इस मुहिम का शिकार वे गैर-मुसलिम भी बने, जो बीफ खाया करते थे या ऐसे कारोबार में शामिल थे, जो गोमांस या गोवंश की तिजारत से चलते थे। पुष्कर के मेले में इस साल चौरानबे फीसद गाय-भैंसें कम बिकीं, क्योंकि खरीदने वाले लोगों को डर था कि उनको भी किसी हाइवे पर रोक कर मार दिया जाएगा। मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद तीन और मुसलिम नौजवानों की हत्या की गई, जिसमें था सोलह-सत्रह वर्ष का जईद खान, जो पहली बार कश्मीर घाटी के बाहर आया था अपने भाई के साथ दिल्ली देखने की उम्मीद में। इस तरह की घटनाएं तब कम होंगी, जब स्पष्ट तौर पर प्रतिबंध लगाया जाएगा बीफ पर।
गोहत्या पूरी तरह बंद की जाती है तो प्रधानमंत्री को यह भी तय करना पड़ेगा कि उन गायों का क्या होना चाहिए, जो उस समय हिंदू घरों से निकाल दी जाती हैं जब वे बूढ़ी या बेकार हो जाती हैं। इन बेचारी गायों को गुजारा करना पड़ता है कचरा खाकर, इसलिए कि गोशालों का गंभीर अभाव है अपने इस गऊ माता को पवित्र मानने वाले देश में।

इतना शोर मचाया कट्टरपंथी हिंदू संस्थाओं ने बीफ को लेकर साल भर कि जिन मुल्कों में बीफ रोज खाते हैं लोग उनको ऐसा लगने लगा कि भारत आधुनिक होने के बदले वापस जा रहा है, उस दिशा में जहां कभी धर्म-मजहब के नाम पर किसी की जान लेना अच्छी बात मानी जाती थी। अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि भारत में कुछ ही दशक पहले हर साल दंगे हुआ करते थे मजहब के नाम पर। मैं उनमें से नहीं हूं, जो मानते हैं कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद देश में असहनशीलता की लहर फैल गई है। लेकिन मैं उनमें से जरूर हूं, जो मानते हैं कि मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद प्रधानमंत्री को चुप नहीं रहना चाहिए था। इतना भी अगर इशारा करते कि उनको इस हत्या से दुख हुआ है, तो शायद बीफ को लेकर यह पागलपन बहुत पहले बंद हो गया होता।

सो, अब जब साफ हो गया है कि मोहम्मद अखलाक के हत्यारों में ऐसे लोग थे, जिनके परिजन भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं, तो और भी ज्यादा जरूरी हो गया है कि मोदी इन लोगों को पार्टी से निकाल फेंकें। ऐसे लोगों की जगह किसी भी राजनीतिक दल में नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उनके होने से न सिर्फ बदनाम होता है वह राजनीतिक दल, बल्कि बदनाम होता है सारा देश। बिल्कुल ऐसा हुआ है पिछले कुछ महीनों में, लेकिन भारत की बदनामी से ज्यादा बदनामी हुई है नरेंद्र मोदी की। इस बदनामी को मिटाना होगा मोदी को, अगर वे चाहते हैं कि दुनिया उनको एक आधुनिक, प्रगतिशील राजनेता के रूप में देखे।

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