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मुद्दा: धारणाएं और भेदभाव

एक स्कूल विविधताओं से भरा होता है, जहां विभिन्न संस्कृतियों और पृष्ठभूमि से बच्चे आते हैं। ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि स्कूल में बच्चों के साथ रंग, जाति, धर्म आदि के आधार पर भोदभाव करना कहां तक उचित है? इससे बचने की जरूरत है।

Author August 5, 2018 4:08 AM
हम किसी व्यक्ति को उसके रंग-रूप, व्यवहार, पहनावा, चाल-चलन, जाति, धर्म और प्रांत आदि के आधार पर ‘तौलना’ या कि ‘धारणा’ बनाना शुरू कर देते हैं।

कालू राम शर्मा

हम किसी व्यक्ति को उसके रंग-रूप, व्यवहार, पहनावा, चाल-चलन, जाति, धर्म और प्रांत आदि के आधार पर ‘तौलना’ या कि ‘धारणा’ बनाना शुरू कर देते हैं। सच पूछें तो यही चीजें समानता और समता को स्थापित करने में बाधक बनती हैं। कई बार हमारे तौलने का आधार महज सुनी-सुनाई बातें भी बन जाती हैं। ये धारणाएं दिलो-दिमाग में कुछ इस तरह घर कर जाती हैं कि हम अपने विवेक और तर्क का इस्तेमाल नहीं कर पाते। यह सब व्यापक तौर पर घर, परिवार, दफ्तर, समाज में चलता रहता है। अमेरिका की तीसरी कक्षा को पढ़ाने वाली नस्लवाद विरोधी, नारीवादी और एलजीबीटी कार्यकर्ता जेन इलियट ‘नीली आंखें, भूरी आंखें’ नामक प्रयोग के लिए पहचानी जाती हैं। यह प्रयोग जेन ने बच्चों के साथ नस्लभेद की समस्या को समझाने के लिए किया था।

जेन इलियट ने एक दिन अपनी कक्षा के बच्चों के साथ नस्लवाद पर सामान्य बातचीत की। वे बताना चाहती थीं कि रंग के आधार पर भेद करना उपयुक्त नहीं है। पर उन्होंने अनुभव किया कि बच्चे नस्लभेद को लेकर कुछ भी आत्मसात नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल, वे बच्चे भी वैसा ही सोचते थे जैसा श्वेत लोग सोचते थे। जब श्वेत लोग नस्लवाद पर बात करते हैं, तो अश्वेतों के बारे में कुछ भी बोलते रहते हैं। उनकी कक्षा के अधिकतर बच्चे एक छोटे शहर में रहते थे, जो अश्वेतों के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। मगर फिर भी उनके बारे में उनका रवैया नकारात्मक ही था। इलियट ने महसूस किया कि ये सभी श्वेत बच्चे नस्लभेद को समझ नहीं पाएंगे। इसलिए उन्होंने एक सरल-सा प्रयोग करने की ठानी। इलियट ने बच्चों को रंगभेद का अनुभव कराने के लिए त्वचा के रंग के बजाय आंखों के रंग के आधार पर नस्लीय अलगाव करने का प्रयोग किया।

दरअसल, ऐसा ही कुछ हम अपनी कक्षाओं में करने लगते हैं। इसलिए हमारे यहां भी इलियट के उस प्रयोग को शिक्षकों के बीच भेदभाव को समझने के लिए किया जाता है। इलियट का प्रयोग एक विडियो के रूप में है। इसमें एक शिक्षिका अपनी कक्षा के बच्चों को समझाने का प्रयास करती है। कक्षा के ‘नीली आंखों’ और ‘भूरी आंखों’ वाले बच्चों के आधार पर शिक्षिका बातचीत करती है। पहली बार में वह नीली आंखों वाले बच्चों को समझदार बताती है। वह उन बच्चों को ज्यादा महत्त्व देती है। इस वजह से भूरी आंखों वाले बच्चे निराश होते हैं। अगले ही दिन शिक्षिका इसका उलट करती है। वह कहती है कि भूरी आंखों वाले बच्चे ज्यादा होशियार होते हैं। ऐसे में नीली आंखों वाले बच्चे वैसे ही निराश होते हैं जैसे पहले दिन भूरी आंखों वाले बच्चे हुए थे।

प्रयोग के पहले दिन इलियट ने नीली आंखों वाले बच्चों को बेहतर समूह के रूप में नामित किया। उन्होंने नीले रंग के वस्त्र की एक-एक कॉलर नीली आंखों वाले बच्चों को देकर उनसे उसे गले में बांधने को कहा, ताकि वे आसानी से अल्पसंख्यक समूह के रूप में पहचाने जा सकें। उन्होंने नीली आंखों वाले बच्चों को विशेष अधिकार और प्यार दिया, मसलन दोपहर के भोजन के वक्त उनकी मदद करना और अवकाश में पांच मिनट अतिरिक्त देना। नीली आंखों वाले बच्चों को कक्षा के आगे बिठाया गया और भूरी आंखों वाले बच्चों को कक्षा की सबसे आखिरी पंक्ति में। नीली आंखों वाले बच्चों को प्रोत्साहित किया गया कि वे केवल नीली आंखों वाले बच्चों के साथ ही खेलें और भूरी आंखों वाले बच्चों को अनदेखा करें। इलियट ने भूरी आंखों बच्चों को वह पानी भी नहीं पीने दिया, जो नीली आंखों वाले बच्चे पी रहे थे। भूरी आंखों वाले बच्चों को किसी नियम के पालन न कर पाने पर या कोई गलती न करने के बावजूद दंडित किया गया। इलियट अक्सर दोनों समूहों के बीच मतभेद के उदाहरण देतीं और भूरी आंखों वाले बच्चों के प्रति नकारात्मक रवैया किसी न किसी बात को लेकर रखतीं।

अल्पसंख्यक समूह (भूरी आंखों) के छात्रों में नीली आंखों वाले बच्चों को लेकर प्रतिरोध था कि ये बेहतर कैसे हैं। इसका सामना करने के लिए इलियट ने बच्चों से झूठ बोला कि आंखों का रंग उनकी उच्च बुद्धि और सीखने की क्षमता से जुड़ा हुआ था। इसके तुरंत बाद, उनका यह प्रारंभिक प्रतिरोध गिर गया। जो बच्चे ‘श्रेष्ठ’ समझे जाते थे वे अपने निचले सहपाठियों के लिए उग्र, घमंडी और अप्रिय हो गए। नीली आंखों वाले बच्चे सरल परीक्षणों में बेहतर ग्रेड पाने लगे। उन्होंने गणितीय और पढ़ाई संबंधी कार्यों को बेहतरी से किया, जो पहले उनकी क्षमता से बाहर थे। अल्पसंख्यक या कि ‘कनिष्ठ’ सहपाठियों में भी बदलाव आया। उनके प्रदर्शन खराब रहे और स्कूल में अवकाश के दौरान उन बच्चों ने भी, जो पहले प्रभावशाली थे, अपने आप को अन्य बच्चों से अलग कर लिया। इन बच्चों का सरल कार्यों में भी अकादमिक प्रदर्शन बुरी तरह प्रभावित हुआ।

अगले सोमवार को इलियट ने इस प्रयोग को बदल दिया। अब भूरी आंखों वाले बच्चों को बेहतर बना दिया। भूरी आंखों वाले बच्चे अब नीली आंखों वाले बच्चों का उपहास उसी तरह से उड़ाने लगे जैसे नीली आंखों वालों ने उनका मखौल उड़ाया था। इलियट ने पाया कि यह प्रतिक्रिया काफी कम तीव्र थी। उस बुधवार को ढाई बजे इलियट ने नीली आंखों वाले बच्चों को अपना कॉलर लेने के लिए कहा। इस अनुभव को बच्चों से लिखने को कहा। क्या ऐसा ही कुछ हम अपने बच्चों के साथ करते हैं? अगर ऐसा करते हैं तो बच्चों की दशा क्या होती होगी? जब हम किसी से घृणा करते हैं, तो उसे इंसान भी नहीं मानते। कुछ शिक्षकों का कहना है कि ऐसा तो हमारे साथ भी होता है। हमें भी कई मामलों में इसी तरह से नीचा दिखाया जाता है। वे मानते हैं कि ऐसा हम बिना सोचे-समझे, बिना विवेक का इस्तेमाल किए करते हैं। स्कूलों में जाति के आधार पर आज भी बच्चों में फर्क किया जाता है।

इस विडियो के जरिए शिक्षकों को सोचने को प्रेरित किया गया। स्कूलों में ऐसे क्या मुद्दे हैं, जिनके आधार पर बच्चे दूसरे बच्चों के प्रति इस प्रकार की धारणा बनाने लगते हैं। और ऐसा नहीं कि उन अल्पसंख्यक बच्चों को इसका आभास नहीं होता। बच्चे समझते हैं कि उनके प्रति अन्य बच्चों का क्या रवैया है। बच्चों के प्रति शिक्षक के रवैये को भी वंचित समुदाय के बच्चे भांप लेते हैं। एक स्कूल विविधताओं से भरा होता है, जहां विभिन्न संस्कृतियों और पृष्ठभूमि से बच्चे आते हैं। ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि स्कूल में बच्चों के साथ रंग, जाति, धर्म आदि के आधार पर भोदभाव करना कहां तक उचित है? इससे बचने की जरूरत है

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