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जनसत्ता संपादकीय पेज पर निर्मल रानी का लेख : हाले-दिल सुनाएं किसको

मुबारक बेगम ने अपने आखिरी दिन बेहद मुश्किल में गुजारे। उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे अपनी बीमारी का खर्च उठा पातीं।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 5:33 AM
इन्हीं स्थितियों के चलते देश के अनेक प्रतिभावान लोग, तकनीकी शिक्षा से जुड़े लोग देश से पलायन करने पर मजबूर होते हैं।

भारतीय सिने-जगत को अनेक यादगार गीतों और नगमों की सौगात देने वाली मशहूर गायिका मुबारक बेगम का पिछले दिनों अस्सी वर्ष की उम्र में मुंबई में निधन हो गया। उन्होंने ‘कभी तन्हाइयों में भी हमारी याद आएगी’, ‘नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले’, ‘मुझको अपने गले लगा लो’, ‘मेरे आंसुओं पे न मुस्करा’ और ‘सांवरिया तेरी याद में’ जैसे दर्जनों सुरीले गीत गाए। पर मुबारक बेगम अपने जीवन के आखिरी समय में जिस मुफलिसी से गुजरीं, उसे सुन कर सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि कला, संगीत, खेल-कूद और साहित्य जैसे क्षेत्रों में अपना लोहा मनवाने वाली प्रतिभाओं का इतना भयावह अंत क्यों होता है?

मुबारक बेगम ने अपने आखिरी दिन बेहद मुश्किल में गुजारे। उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे अपनी बीमारी का खर्च उठा पातीं। उनके बारे में जब महाराष्ट्र के शिक्षा और संस्कृति मंत्री विनोद तावड़े को बताया गया तो उन्होंने सरकार की ओर से उनकी सहायता का आश्वासन दिया, पर मुबारक बेगम इस दुनिया से रुख्सत हो गर्इं और उन तक कोई सरकारी मदद नहीं पहुंच सकी। हालांकि लता मंगेशकर के कार्यालय से मुबारक बेगम को कुछ समय तक आर्थिक सहायता भेजी जाती रही। अभिनेता सलमान खान की तरफ से हर महीने उनकी दवाइयों के लिए पैसे भी पहुंचते रहे।

मुबारक बेगम हमारे देश की ऐसी पहली प्रतिभावान शख्सियत नहीं थीं, जिन्होंने मुफलिसी में अपने जीवन की अंतिम सांस ली। हॉकी के जादूगार और पूरे विश्व में अपने कौशल का लोहा मनवाने वाले मेजर ध्यानचंद जैसे महान खिलाड़ी को भी अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में कुछ ऐसी ही आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। खेल जगत में ऐसा ही एक नाम है महिला कबड््डी खिलाड़ी शांति देवी का। बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाली शांति देवी ने पच्चीसवें राष्ट्रीय कबड््डी चैंपियनशिप में भाग लिया था। लगभग दस राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में बिहार का प्रतिनिधित्व किया। 1983-84 में वे भारतीय टीम की कप्तान भी रहीं। पर इस महान खिलाड़ी को जमशेदपुर के स्थानीय सब्जी बाजार में अपने सिर पर सब्जी की टोकरी रख कर सब्जी बेचते देखा गया। शांतिदेवी की आर्थिक तंगी के विषय में खबरें छपने पर राजनेताओं ने उन्हें सरकारी नौकरी और सहायता देने का आश्वासन दिया। पर वे महज आश्वासन साबित हुए।

महिला फुटबाल खिलाड़ी रश्मिता पात्रा ने 2008 में कुआलालंपुर में एशियन फुटबाल कॉन्फेडरेशन में भारतीय महिला फुटबाल टीम का प्रतिनिधित्व किया था। वे कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फुटबाल मैचों में अपनी शानदार प्रतिभा का परिचय देती रहीं। पर आज वे पान बेच कर अपना और अपने परिवार का खर्च चलाती हैं। एक सौ दस मीटर की बाधा दौड़ में 1954 के एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाले सरवन सिंह को अपने जीवन का अंतिम समय टैक्सी चला कर बिताना पड़ा। 2011 के एथेंस ओलंपिक के दो सौ मीटर और सोलह सौ मीटर की दौड़ में भारत के लिए तीसरा स्थान अर्जित करने वाली सीता साहू को मध्यप्रदेश के रीवां जिले में अपनी मां के साथ रेहड़ी पर गोलगप्पे बेचने को मजबूर होना पड़ा। देश के लिए कई पदक जीतने वाली मशहूर धाविका आशा राय को सब्जी बेच कर अपना जीवन बसर करना पड़ा। विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाओं के इसी प्रकार दम तोड़ने या आर्थिक तंगी से गुजरने के अनेक उदाहरण मौजूद हैं।

ऐसे विचलित कर देने वाले समाचार उस समय और तकलीफ पहुंचाते हैं जब संसद से लेकर विधानसभाओं तक में राजनेता अपने वेतन-भत्ते अपनी मनमर्जी से बढ़ाते और अपनी पेंशन भी खुद तय कर लेते हैं। अनेक लेखकों-पत्रकारों को भी मुफलिसी में दम तोड़ते देखा गया है। अफसोस कि मुबारक बेगम जैसी प्रतिभाओं के मरणोपरांत नेता, बुद्धिजीवी और कला-संगीत, खेल, साहित्य आदि क्षेत्रों के लोग उन्हें श्रद्धांजलि देकर अपना फर्ज पूरा समझ लेते हैं। इसी तस्वीर का एक दूसरा पहलू यह भी है कि आज केवल क्रिकेट को विभिन्न आर्थिक आयामों से जोड़ने के बाद इतना अधिक बढ़ावा दिया गया है कि दूसरे खेलों और उनसे जुड़े खिलाड़ियों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने का अवसर ही नहीं मिल पाता।

पिछले दिनों राजस्थान से एक पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि किस प्रकार भारतीय पारंपरिक और प्राचीन कला का एक बेहतरीन नमूना समझी जाने वाली कठपुतली कला अब अपना अस्तित्व खो रही है। आखिर इसका कारण क्या है। जब सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त खेलों के प्रतिभाशाली खिलाड़ी, दुनिया को अपनी मधुर आवाज और गीत-संगीत देने वाले कलाकार, प्रतिष्ठित लेखक देश-दुनिया में नाम ऊंचा करने के बाद खुद को आर्थिक रूप से सुरक्षित नहीं कर सके, तो कठपुतली जैसा खेल दिखा कर लोगों को ठहाके मारने पर मजबूर करने वाले कलाकार अपने भविष्य को कैसे सुरक्षित कर सकते हैं! और जब कलाकार खुद अपने भविष्य को लेकर आशान्वित नहीं हैं, तो यह समाज अपने बच्चों को वह हुनर क्यों सिखाने लगा? इस प्रकार के अनेक मनोरंजक खेल और कलाएं हैं, जो समय के साथ-साथ केवल इसलिए समाप्त होती जा रही हैं कि इससे जुड़े लोग अपने भविष्य को सुरक्षित नहीं समझते।

इन्हीं स्थितियों के चलते देश के अनेक प्रतिभावान लोग, तकनीकी शिक्षा से जुड़े लोग देश से पलायन करने पर मजबूर होते हैं। विभिन्न क्षेत्रों की अनेक प्रतिभाएं आज विदेशों में जाकर न केवल नाम और धन कमा रही हैं, बल्कि खुद को आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस करते हुए वहीं की होकर रह गई हैं, जबकि हमारे देश में उनकी कितनी कद्र है। इस प्रकार के समाचार हमारे देश का भविष्य समझी जाने वाली प्रतिभाओं पर बुरा असर डालते हैं। ऐसे में सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे सभी क्षेत्रों की ऐसी प्रतिभाओं के लिए कोई न कोई ऐसी व्यवस्था करें, जो उनके जीवन को सुरक्षित रख सके और उन्हें अपने अंतिम समय में दवा-इलाज या दो वक्त की रोटी के लिए किसी का मोहताज न होना पड़े। जो सरकारें आपातकाल के दौरान जेल में भेजे गए मीसा बंदियों की पेंशन के लिए सिर्फ इसलिए चिंतित दिखाई देती हैं कि उसकी नेता बिरादरी इमरजेंसी में प्रभावित हुई थी, वही लोग आखिर देश की उन प्रतिभाओं की परवाह क्यों नहीं करते या उनके लिए पेंशन, आर्थिक सहायता या निश्शुल्क दवा-इलाज जैसी व्यवस्था क्यों नहीं करते?

हमारे देश के नेताओं को ऐसी प्रतिभाओं के मरणोपरांत उनकी शान में कसीदा पढ़ने, छाती पीटने या उनकी स्मृति में कोई आयोजन कर वोटों की राजनीति करने के बजाय इनके सुरक्षित भविष्य के लिए कुछ ऐसे व्यावहारिक उपाय करने चाहिए, ताकि इन्हें मोहताजगी या अपमानजनक जीवन बिताने पर मजबूर न होना पड़े। कल का स्वर्ण पदक विजेता या मुबारक बेगम की तरह अपने सुर-संगीत से आम लोगों के दिलों पर राज करने वाली कोई शख्सियत अगर फुटपाथ पर सब्जी, गोलगप्पा बेचते या इलाज के अभाव में दम तोड़ती दिखाई दे तो यह उन प्रतिभाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए अपमान का विषय है।

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