ताज़ा खबर
 

मुद्दा: भूख का जटिल जाल

कोरोना संकट के दौरान चार करोड़ लोग भुखमरी के मुहाने की ओर जा चुके हैं। जो संख्या पहले आठ करोड़ थी, वह केवल छह महीने में बढ़ कर बारह करोड़ हो गई है। पिछले दशकों में जो आबादी गरीबी रेखा से बाहर, बिल्कुल करीब, अतिसंवेदनशील स्थितियों में गुजर बसर कर रही थी वह पुन: गरीबी के कुचक्र में प्रवेश कर चुकी है।

Author Updated: November 1, 2020 5:40 AM
दो वक्‍त की रोटी के लिए जद्दाेेजहद।

आशुतोष राय

आर्थिक और मानव क्षमताओं के विकास के उद्देश्यों और जरूरतों को लेकर अनेक विचार पिछले चार दशकों में दिखाई पड़े हैं। अधिकतर पूंजीवादी अर्थशास्त्री आर्थिक विकास के लिए संवृद्धि को सबसे महत्त्वपूर्ण कारक मानते हैं। समाजवादी झुकाव रखने वाले अर्थशास्त्री मानव क्षमताओं के विकास, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य आदि शामिल हैं, पर जोर देते हैं।

इस दृष्टि से अगर भारत में आर्थिक विकास की जांच की जाए तो भारी अंतर्विरोध मिलते हैं। पिछले तीन दशक में खासर 1991 के बाद से ही भारत ने सामान्यत: ऊंची विकास दरें हासिल की हैं। पिछले दो दशक में छह से सात प्रतिशत की औसत विकास दर हासिल की है, जो विकसित और विकासशील देशों में केवल चीन की विकास दर से कुछ कम रहा है। यह ऊंची विकास दर और आर्थिक संवृद्धि उदारवादी नीतियों की बदौलत निवेश में बढ़ोत्तरी के कारण अस्थायी रोजगार की स्थिति में सुधार होने, नई तकनीकों के इस्तेमाल और बाजार के स्वरूप में आमूल परिवर्तन की वजह से प्राप्त हुई। इसके चलते ही भारत बीस करोड़ से अधिक आबादी को अत्यंत गरीबी से बाहर निकालने में सफल हो पाया है।

पर अस्थायी और असमान विकास की इस दौड़ में मानव क्षमताओं के विकास की भारी अनदेखी हुई और शिक्षा, स्वास्थ्य, कुपोषण, भुखमरी जैसी अत्यंत गंभीर सम्याओं को नजरअंदाज करते हुए बड़े शहरों में अधिक से अधिक अवस्थापनाओं के विकास पर जोर दिया गया। नतीजतन, आज भारत इस स्थिति में है कि तीन अरब की अर्थव्यवस्था होने के बावजूद यहां चालीस करोड़ आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने को अभिशप्त है।

इसमें आठ करोड़ से अधिक आबादी भुखमरी की कगार पर है। आइएमएफ की ताजा रिपार्ट, जिसमें कोरोना संकट का देशों के आर्थिक हालात पर प्रभाव का अध्यन किया गया है, में कहा गया है कि भारत में ‘क्रोनिक पॉवर्टी’ की संख्या में पचास प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कोरोना संकट के दौरान चार करोड़ लोग भुखमरी के मुहाने की ओर जा चुके हैं। जो संख्या पहले आठ करोड़ थी, वह केवल छह महीने में बढ़ कर बारह करोड़ हो गई है। पिछले दशकों में जो आबादी गरीबी रेखा से बाहर, बिल्कुल करीब, अतिसंवेदनशील स्थितियों में गुजर-बसर कर रही थी वह पुन: गरीबी के कुचक्र में प्रवेश कर चुकी है।

भूख, कुपोषण और गरीबी से होने वाली मौतें केवल सरकार नहीं, समाज के लिए भी शर्म का विषय हैं। ऐसा नहीं कि भूख और बदहाली के हालात आज ही पैदा हुए हैं। इससे हमारी जंग बहुत पुरानी है। अपनी पुस्तक ‘एन अनसर्टेन ग्लोरी’ में अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज ने लिखा है कि औपनिवेशिक काल में ‘भारत की गरीबी, जो शायद इस देश की सर्वज्ञात बात थी, इतनी कि यूरोप और अमेरिका में माता-पिता अपने बच्चों को हिदायत देते थे कि भूखे मर रहे भारतीयों के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी की खातिर वे अपनी प्लेट में जूठन न छोड़ें।’

देश में कुपोषण और स्वास्थ्य के हालात को बताते हुए अर्थशास्त्री एंगस डीटन ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट स्केप हेल्थ वेल्थ एंड द ओरिजिन्स आॅफ इनइक्वालिटी’ में कहा है कि ‘यह संभव है कि सदी के मध्य के आसपास जन्मे भारतीयों का बचपन उतना ही अभावग्रस्त रहा हो, जितना इतिहास के नवप्रस्तर काल और उससे भी पहले आखेटकों के काल में, बड़े समूहों के बच्चों का था।’ ये उद्धरण बताते हैं कि आजाद भारत के सामने ‘भूख’ ही सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर खड़ी थी, जिसे आजादी के बाद के चालीस सालों के सतत, पर सुस्त आर्थिक विकास और 1990 के बाद के तीव्र आर्थिक विकास के दौर में खत्म करने की कई कोशिशें हुई हैं। उसके बावजूद समस्या आज भी गहरी और जटिल बनी हुई है।

हाल ही में प्रकाशित ग्लोबल हंगर रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष वैश्विक भूख सूचकांक में भारत कुल एक सौ सात देशों की सूची में चौरानबेवें स्थान पर रहा है। पर सही आकलन के लिए कुछ तकनीकी बातों को जानना जरूरी है। पहला, इस वर्ष जारी किए गए आंकड़ों में कोरोना संकट के प्रभाव को सम्मिलित नहीं किया गया है। आंकड़ों में 2019 तक का डाटा ही इस्तेमाल किया गया है।

दूसरा, इन आंकड़ों में जिन एक सौ सात देशों को शामिल किया गया, उनमें एशिया, अफ्रीका और साउथ अमेरिका के गरीब देश ही मुख्यत: शामिल हैं, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका आदि के समृद्ध देश इस सूची में नहीं हैं। तीसरा, इस वर्ष भारत को सूचकांक में 27.2 अंक प्राप्त हुए। जब इसकी पूर्ववर्ती आंकड़ों से तुलना करेंगे तो पाएंगे कि वर्ष 2000 में भारत को 38 अंक मिले थे, जबकि वर्ष 2012 में 29 अंक मिले थे।

इससे पता चलता है कि पिछले दशक के (2000-12) सूचकांक में नौ अंकों की कमी हुई थी, जबकि इस दशक में (2012-20) यह कमी मात्र दो अंकों की हुई है, जो इस दशक में भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन के प्रति गंभीर गैरजिम्मेदारियों को दर्शाती है। यह स्वास्थ्य सेवाओं पर किए जाने वाले सार्वजनिक व्यय में हुई कटौतियों का सीधा परिणाम है। अगर अन्य देशों की तुलना में देखा जाए तो अत्यंत गरीब अफ्रीकी देशों और बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान आदि पड़ोसियों ने भी भारत को पीछे छोड़ दिया है, जबकि इसमें से अधिकतर देश प्रति व्यक्ति आय के संदर्भ में भारत से कहीं पीछे हैं।

हालांकि देश में कई राज्य ऐसे भी हैं, जिन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य पर बेहतर ध्यान देकर बाकी राज्यों से अलग पहचान बनाई है, जिनमें तमिलनाडु और केरल शामिल हैं, जिनकी तुलना चीन जैसे देशों से की जा सकती है। इसके विपरीत बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश जैसे राज्य अपनी भ्रष्ट और खस्ताहाल राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के चलते भुखमरी और कुपोषण के जाल में उलझे हुए हैं। तमाम आंकड़े बताते हैं कि भारत में भूख और कुपोषण का संकट कोरोना के कारण और गहरा हो गया है।

ऐसा नहीं कि देश में इस समस्या से निजात पाने के लिए आर्थिक नीतियों और योजनाओं की कोई कमी रही हैैं, पर इनके क्रियान्वयन के लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक जवाबदेही की जरूरत है, उसका नितांत अभाव रहा है।

गरीबी के कारण भुखमरी और कुपोषण के खात्मे के कई सुझाव सामने हैं, जिनमें एक सीमा तक कारगर और सबसे नया सुझाव नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो का है। उन्होंने अपनी किताब ‘पुअर इकोनॉमिक्स’ में सुझाया है कि गरीब लोगों और उनके समूहों और उनके बर्ताव का प्रयोगात्मक अध्यन कर, उनकी जरूरतों के अनुरूप नीतियां बना कर और ‘डिलिवरी मैकेनिज्म’ तैयार कर गरीबी को कुछ लंबे अंतराल में ही सही, पर दूर किया जा सकता है

। इसके लिए अच्छी नीयत वाले राजनेताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, एनजीओ, अकादमिक बुद्धिजीवियों तथा उद्यमियों को एक होकर काम करने की जरूरत है। मगर भारत में जहां राजनेता सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च को लगातार कम करते जा रहे हैं और बहुतेरे प्रशासनिक अधिकारी अक्सर गरीबों के हित में काम करते नजर नहीं आते, ऐसे में केवल ‘अच्छी नीयत’ की उम्मीद के सहारे रहना एक भ्रामक स्थिति में लेकर जाता है। गरीबी, खासकर भूख और कुपोषण के खात्मे के लिए सबसे जरूरी शर्त है कि प्रशासनिक तंत्र में बदलाव किए जाएं।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 वक्‍त की नब्‍ज : तवलीन सिंह
2 बाखबर: बिहार में ई बा
3 वक्‍त की नब्‍ज: बुनियादी उसूल और उसूलों की बुनियाद
ये पढ़ा क्या?
X