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पहल की जरूरत

टीवी शो में बच्चे जल्दी बड़े होने के फिराक में और बॉलीवुड में ‘पचास साल’ के युवा बीस साल के ‘तरुण’ बनने की जुगत में नजर आते हैं। यह मूल्यों को ह्रास है।
Author March 26, 2017 07:08 am
प्रतीकात्मक चित्र

प्रचंड पवीर

साहित्य का नोबेल पुरस्कार विजेता ‘गैब्रिएला मिस्ट्राल’ का कथन है कि ‘हम सभी बहुत-सी गलतियों और बहुत से दोषों के लिए जिम्मेदार हैं, पर हमारा सबसे बुरा अपराध बच्चों को बेसहारा छोड़ देना, जीवन के झरने को अनदेखा करना है। बहुत-सी चीजें जो हमें चाहिए, इंतजार कर सकती हैं; पर बच्चा इंतजार नहीं कर सकता। अभी ऐसा समय है, जब उसकी हड्डियां बन रही हैं, उसका रक्त बन रहा है, और उसकी इंद्रियां विकसित हो रही हैं। उसे हम ‘कल’ के नाम पर टाल नहीं सकते, जिसका नाम आज है।’ बच्चों के लिए फिल्में एक संवेदनशील और लगभग भुला दिया गया विषय है। जैसा हमने हिंदी साहित्य के साथ किया, जहां बाल साहित्य विमर्श से बाहर है; कमोबेश भारतीय सिनेमा में भी बच्चों के लिए फिल्में नदारद हैं।

सबसे पहले हमें यह तय करना चाहिए कि बच्चों के लिए कैसी फिल्में उपयुक्त हैं या उपयुक्त समझी जानी चाहिए। बच्चों के लिए फिल्मों का मतलब केवल यह नहीं कि उनके प्रमुख पात्र बच्चें हों। जापानी निर्देशक हायाओ मियाजाकी और उनकी चर्चित ‘स्टूडियो घिबली’ ने महान ऐनीमेशन फिल्में बनार्इं, जिनमें से अधिकतर बच्चों के लिए थीं। भारत में सत्येन बोस ने ‘जागृति’ (1954), ‘दोस्ती’ (1964) और ‘कायाकल्प’ (1983) जैसी फिल्में बनार्इं, जो आज भारतीय सिनेमा की धरोहर हैं, जो बिना किसी दुविधा के बच्चों को दिखाई जा सकती हैं। इसी तरह सत्यजित राय की ‘सोनार केल्ला’ (1974), विशाल भारद्वाज की ‘मकड़ी’ (2002) और ‘द ब्लू अम्ब्रेला’ (2005) अच्छी भारतीय फिल्में हैं। इनका कथानक बच्चों की दुनिया है और उनमें उसका विमर्श है। बच्चों को मुख्य भूमिका में लेकर कुछ बहुत ही अच्छी ईरानी फिल्में बनीं हैं, जिनमें अब्बास किआरोस्तामी की ‘वेयर इज द फ्रेंड्स होम’ या खाना-ए-दोस्त कोद्जस्त (1987) उल्लेखनीय है।

अवयस्क पात्रों की मुख्य भूमिका में महान इतालवी निर्देशक विट््टोरियो डे सिका की यथार्थवादी फिल्में ‘शू शाइन’ (1946) और ‘बाइसिकिल थीव्स’ (1948), या लुईस बुनएल की ‘लॉस अल्वादिदोस’ (1950) हृदय विदारक फिल्में हैं, जो समाज के बड़े तबके को उनकी समस्याओं से रूबरू कराती हैं। इसी क्रम में आंद्रेई तारकोवस्की की इवान्स चाइल्डहुड (1962) भी है, जो युद्ध की विभीषिका याद दिलाती है।
हमें नहीं लगता कि पिछले दो सौ सालों में बच्चों के लिए दुनिया में किसी ने भी महान डेनिश लेखक ‘हैंस क्रिश्चियन एंडरसन’ से ज्यादा प्रभावशाली काम किया या प्रशंसा पाई है। एंडरसन अपनी परीकथाओं में भी दुख का समावेश करते थे और जीवन की जटिलता दिखाया करते थे। उनकी कहानियों में दर्शन भी था और नैतिक मूल्य भी थे। इसी तरह हम बच्चों को केवल कुछ कथानकों तक सीमित नहीं कर सकते। हमें उन्हें हर तरह की उत्कृष्ट फिल्मों से परिचित कराना होगा।

उन्हें वैसी फिल्में भी दिखानी होंगी, जिसमें वयस्क प्रमुख पात्र हैं, और वैसी फिल्में भी दिखानी होंगी, जिसमें संसार दुखमय प्रतीत होता है। पर इसकी योजना कठिन है। इसमें हम पीछे हैं। हमारे पिछड़ेपन के कई कारण हैं। एक है, अच्छी फिल्मों या अच्छे साहित्य का ज्ञान न होना। अक्सर अभिभावकों या बच्चों को पता नहीं होता कि कौन-सी फिल्में अच्छी हैं। इसके लिए जागरूकता के सिवा कोई विकल्प नहीं है।
दूसरा है, उपलब्धि की समस्या। बहुधा फिल्में सहजता से उपलब्ध नहीं होतीं। पर इंटरनेट और नेटफ्लिक्स से बहुत सारी अच्छी फिल्में सहजता से उपलब्ध हो रही हैं। तीसरा है, भाषा की समस्या। भारतीय भाषाओं में सबटाइटल्स नहीं मिलते। इसके लिए हमें प्रयत्न करना होगा। चौथा है, विचारधारा की समस्या। हम बच्चों के लिए अनुकूल साहित्य और समस्या को अपनी मातृभाषा की तरह ही दरकिनार कर दे रहे हैं। यह ठीक नहीं है। हम जापानी या चीनी धारावाहिकों का अनुवाद अपने बच्चों को दिखाते या फिर उनकी ही नकल करते हैं।

एक विचार यह है कि भारतीय भाषाएं नकारा हैं और चूंकि यह आगे चल कर जीविकोपार्जन का साधन नहीं बनेंगी, इसलिए इन्हें भुला दिया जाए।बच्चों के लिए मुम्बई में बनीं बहुत-सी फिल्मों में न सिनेमेटोग्राफी अच्छी होती है, न कथानक। कई फिल्मों में बच्चे बड़ों का अनुकरण करते दिखाई देते हैं। टीवी शो में बच्चे जल्दी बड़े होने के फिराक में और बॉलीवुड में ‘पचास साल’ के युवा बीस साल के ‘तरुण’ बनने की जुगत में नजर आते हैं। यह मूल्यों को ह्रास है। सिनेमा अगर काव्य है, तो हम हिंदी सिनेमा में संकल्पना, अंतर्निहित विचार और नैतिक मूल्य के चिंतन से पिछड़े या स्पष्ट तौर पर विमुख नजर आते हैं। जिस तरह मल्टीप्लेक्स आम दर्शकों की पहुंच से दूर होता जा रहा है, सिनेमा का पैमाना दो-तीन करोड़ रुपए बॉक्स आॅफिस का कलेक्शन का बनता जा रहा है, वह दिन दूर नहीं जब सिनेमा थियेटर बंद हो जाएंगे। पर सिनेमा के संबंध में इसकी आसन्न मौत घोषित करना जल्दबाजी होगी।

सिनेमा इंटरनेट पर, या किसी और सस्ते साधनों तक बहुत ही सहजता से और अपनी भाषा में उपलब्ध होता जाएगा। भविष्य की ओर देखें तो हमारी जिम्मेदारी बच्चों के लिए अच्छी फिल्में उपलब्ध कराने की होगी। यहां ‘अच्छा’ होने का चिंतन बहुत व्यापक है। अच्छा हम क्यों न हॉलीवुड की तेज-तर्रार फिल्मों को मानें, क्यों न हम विदेशी टीवी सीरियल की फूहड़ नकल को ही श्रेष्ठ मानें और बच्चों को दिखाएं? हकीकत यह भी है कि कई परिवारों में ‘बिग बॉस’ बड़े चाव से देखा जाता है। इस पर लंबी बहस चल सकती है। बहरहाल, अगर हम यह मान लें कि ‘स्टूडियो घिबली’ या ‘सत्यजित राय’ जैसी प्रतिभा नहीं रखते, तो भी हमारे पास साहित्य का विपुल भंडार है, जिससे कई अच्छी और कम बजट की फिल्में बनाई जा सकती हैं। हां, इनको मल्टीप्लेक्स न मिले, पर शायद यू-ट्यूब में जगह मिलनी शुरू हो जाएगी। कमसे कम ऐसी कोशिश ‘द वायरल फीवर’ जैसे भोंडे कार्यक्रमों से अच्छा हो ही सकता है।

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