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तवलीन सिंह का कॉलम वक़्त की नब्ज़ : यह कैसा सेक्युलरवाद?

भारतीय सेक्युलरिज्म के उसूलों के तहत कुछ बातें ऐसी हैं, जिनको हम कह नहीं सकते, क्योंकि कहते ही सेक्युलर न होने का दाग लग जाता है चेहरे पर। सो, हिंदुत्ववादियों को आप कुछ..

Author नई दिल्ली | November 16, 2015 11:39 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर। (फाइल)

भारतीय सेक्युलरिज्म के उसूलों के तहत कुछ बातें ऐसी हैं, जिनको हम कह नहीं सकते, क्योंकि कहते ही सेक्युलर न होने का दाग लग जाता है चेहरे पर। सो, हिंदुत्ववादियों को आप कुछ भी कह सकते हैं, लेकिन जिहादी आतंकवादियों को अगर जिहादी आतंकवादी कहने की हिम्मत करें तो आप फौरन फिरकापरस्त माने जाएंगे। शायद यही वजह है कि इस देश के जो नागरिक विदेशी अखबार नहीं पढ़ते या जिनको यू-ट्यूब देख पाने की सुविधा नहीं है, वे जानते ही नहीं होंगे के इस्लामिक स्टेट (आइएस पूर्व आइएसआइएस) के रहनुमाओं और मुजाहिदों ने किस हद तक बर्बरता फैलाई है उस खिलाफत में, जो उन्होंने सीरिया और इराक से छीन कर कायम की है। इस नए इस्लामी देश में बाजार लगते हैं यजीदी लड़कियों के। यू-ट्यूब पर जाकर देख सकते हैं आप कि कैसे आइएस के मुजाहिद हंसी-मजाक करते बोलियां लगाते हैं लड़कियों के बाजारों में। यू-ट्यूब पर आप उन लड़कियों के बयान भी देख सकते हैं, जो जिहादियों के चंगुल से छुड़ा कर लाई गई हैं।

सच तो यह है कि एक बयान सुनने के बाद किसी की हिम्मत नहीं होती है कुछ और सुनने की। छोटी उम्र की लड़कियों के बयान मैंने खुद सुने हैं, जिनमें वे बताती हैं कि कैसे उनके खरीदार नमाज पढ़ने के बाद उनका बलात्कार किया करते थे, कैसे उनके दोस्त आते थे उनके बाद बार-बार ऐसा करने। पश्चिमी अखबारों से मालूम है हमें कि आइएस ने पत्रकारों का गला काटा है गर्व से और उनकी निर्मम हत्याओं के वीडियो बना कर यू-ट्यूब पर डाले हैं। पश्चिमी टीवी चैनलों ने दिखाई हैं इन हत्याओं की तस्वीरें और उस बदकिस्मत जॉर्डन के सिपाही की तस्वीरें, जिसमें उसको एक पिंजरे में कैद करके जिंदा जलाया गया था। लेकिन भारत का मीडिया इन चीजों को जैसे छिपाने की कोशिश करता रहा है। सो, अगर जिक्र भी आता है आइएस की बर्बरता का, उसके जालिम नेताओं की नफरत भरी तकरीरों का, तो दबी जबान आता है हमारे मीडिया में।

क्या यही वजह है कि इरफान हबीब जैसे अति-प्रसिद्ध, जाने-माने इतिहासकार ने आइएस की तुलना आरएसएस से की? इत्तेफाक से उनका यह बयान उसी दिन आया जब मूडी नाम की अंतरराष्ट्रीय संस्था के एक मुसलिम विशेषज्ञ ने एलान किया कि भारत की छवि निवेशकों की नजरों में बदतर हुई है ‘बढ़ती असहिष्णुता’ के कारण। ट्विटर पर जब किसी ने मुझसे पूछा कि क्या यह बात सही है कि ये विशेषज्ञ इरफान हबीब के दामाद हैं, तो मैंने वापस ट्वीट करके ‘शायद’ कहा। इस पर ऐसा बवाल मचा कि क्या बताऊं, ढेर सारे ट्वीट आए मेरे पास, जिनमें मुझे माफी मांगने को कहा गया। ढेर सारे ऐसे आए, जिन्होंने मेरे चरित्र पर अंगुलियां उठार्इं। लेकिन ताज्जुब हुआ मुझे देख कर कि हबीब साहब से माफी मांगने को किसी ने नहीं कहा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मैं बिल्कुल फैन नहीं हूं। मुझे इस हिंदुत्ववादी संस्था से कई शिकायतें हैं, जिनमें सबसे बड़ी शिकायत यह है कि इन स्वयंसेवकों ने प्राचीन भारत की महान विरासत को धर्म-मजहब के झगड़ों तक सीमित रखा है। अक्सर मुझे स्वयंसेवक ऐसे मिले हैं, जिनको मालूम ही नहीं है कि संस्कृत में साहित्य का कितना बड़ा भंडार है, जिसका आधुनिक भाषाओं में अनुवाद अभी नहीं हुआ है। अक्सर इन हिंदुत्ववादी महारथियों को यह भी नहीं मालूम है कि इस विरासत में कितना कुछ और है। रट लिए हैं इन लोगों ने आर्यभट्ट जैसे एक-दो नाम, लेकिन इससे आगे कम ही जानते हैं। नफरत घोल देते हैं इस विरासत में, ताकि मुसलमानों को हमेशा लगे कि इस विरासत में उनका कोई हिस्सा नहीं है। यह भी सच है कि आरएसएस की छत्रछाया में कई गलत किस्म के साधु-साध्वी हैं, जो सिर्फ नफरत की बातें करते हैं देशप्रेम के बहाने। यह गलत है, बहुत गलत, लेकिन उससे कहीं ज्यादा गलत है आरएसएस की तुलना आइएस से करना, क्योंकि जब इरफान हबीब जैसा प्रसिद्ध इतिहासकार ऐसी बात कहता है उस समय जब भारत के प्रधानमंत्री खुद आरएसएस से आए हों, तो ऐसा लगता है अनजान विदेशियों को कि भारत तो आइएस की खिलाफत से भी ज्यादा खतरनाक देश है।

जब आरएसएस की तुलना आइएस से होती है उस माहौल में जो खराब हुआ है वैसे भी बुद्धिजीवियों के पुरस्कार वापसी अभियान के कारण, तो अनुमान कीजिए कितना बदनाम हुआ है भारत देश? ये बुद्धिजीवी बुजुर्ग हैं, सो देखे हैं इन्होंने ऐसे दौर, जिनमें लगता था कि देश टूट जाएगा। वे जीवित थे, जब 1984 में दिल्ली की सड़कों पर सिखों की लाशें पड़ी थीं, जीवित थे, जब लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को लेकर दंगे हुए थे देश भर में। जीवित थे, जब बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद नफरत की ऐसी लहर फैली देश में कि मुंबई जैसे शहर में मुसलमानों को हिंदुत्व के सिपाहियों ने बेरहमी से मारा और वे जीवित थे उसके बाद भी, जब टाइगर मेमन के मुजाहिदों ने शृंखलाबद्ध धमाकों में ढाई सौ से ज्यादा बेगुनाह नागरिकों को मारा।

लेकिन इनको देश के टूटने की चिंता सिर्फ तब होने लगी, जब मोदी प्रधानमंत्री बने। मेरा मानना है कि मोदी को दादरी जाकर मोहम्मद अखलाक के परिजनों से अफसोस जतानी चाहिए थी। ऐसा करते तो शायद तीन बेगुनाह मुसलिम नौजवानों को उसके बाद न मारा जाता बीफ को लेकर। लेकिन मेरा यह भी मानना है कि मोदी के सिर लगाने की कोशिश शुरू से की है इन बुद्धिजीवियों ने उनको सेक्युलरिज्म के दुश्मन साबित करने की।

उनके प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही दिन बाद किसी अनजान हिंदू संस्था ने पुणे में मोहसिन सादिक शेख को मारा था। तब महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार थी, लेकिन इस हत्या का दोष मोदी पर लगा। तबसे चल रहा है भारत को बदनाम करने का यह आंदोलन, लेकिन इरफान हबीब ने हद ही कर दी है।

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