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दूसरी नजर: जबर्दस्ती के संघवाद का प्रदर्शन

अध्यादेश के पीछे मकसद यही है कि सभी बड़े वित्तीय संस्थानों को केंद्र सरकार के नियंत्रण में ले लिया जाए और जो जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों और अरबन कोआपरेटिव बैंकों के प्रबंधन (निर्वाचित निदेशक) में है, वे केंद्र सरकार के इशारों पर चलें। यह अध्यादेश राज्य के अधिकारों पर खुला हमला है।

COVID-19, Coronavirus, Parliament, Monsoon Sessionसंसद भवन के बाहर का दृश्य। (फाइल फोटो)

संसद के दोनों सदनों का मानसून सत्र कल से शुरू होगा। यह केवल शारीरिक उपस्थिति दर्ज कराने का सत्र होगा। कुछ दिन पहले राज्यसभा के सभापति ने मेरे सुझाव को खारिज कर दिया था। मैंने शारीरिक रूप से सदन में उपस्थित होने में असमर्थ सदस्यों के लिए आभासी हाजिरी लगाने की इजाजत की बात कही थी। अगर उपस्थिति संतोषजनक रहती है, तब भी माहौल वास्तविकता लिए हुए नहीं होगा। मेरा मानना है कि ये सदन ऐसे संसदीय लोकतंत्र का रूप देखेंगे, जो भाव और आत्मा-विहीन होगा।

एक राष्ट्र, सब कुछ एक
अंतर-सत्र कार्यकाल में सदनों का असल काम लंबित पड़े विधेयकों और ग्यारह अध्यादेशों को निपटाना होगा। यह समझ से परे है कि जब देश कई तरह के संकटों का सामना कर रहा है- ढहती अर्थव्यवस्था, पैर पसारती महामारी और चीन से मिल रही चुनौती- तो ऐसे में सरकार प्रमुख क्षेत्रों में केंद्र-राज्य संबंधों में बदलाव की कपटपूर्ण कोशिश क्यों कर रही है।

अध्यादेश प्रधानमंत्री के उस पसंदीदा सिद्धांत का हिस्सा हैं कि एक देश में हर चीज एक होनी चाहिए। यह सिद्धांत राज्यों और केंद्र के बीच इस संवैधानिक समझौते के मूल पर प्रहार करता है कि भारत राज्यों का संघ होगा और संघवाद मूल सिद्धांत होगा, जिसमें विधायी और कार्यकारी शक्तियों के साझेदारी की व्यवस्था है। पिछले कुछ सालों में राज्यों ने अपने कई अधिकार केंद्र सरकार के हवाले कर दिए हैं।

सारे दलों ने भारत पर शासन किया है और सभी दलों को इसका दोष जाता है। नरेंद्र मोदी ने राज्यों के अधिकारों को जिस तरह से छीना है, वह अपने में नया कीर्तिमान है और कार्यकारी फैसलों और विधायिका के जरिए इस तरह के हमले जारी हैं। कुछ नए अध्यादेशों पर नजर डालें।

बैंकिंग (नियमन) अधिनियम
आज, बैंक, कुछ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) और सभी बड़े वित्तीय संस्थान बैंकिंग (नियमन) अधिनियम से संचालित होते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) नियामक है। यह पहले ही से भारी बोझ से दबा है। बतौर एक नियामक आरबीआइ का रिकार्ड मिलाजुला रहा है- इसकी निगरानी में ही भारी घोटाले हुए हैं। सिर्फ एक महत्त्वपूर्ण वित्तीय माध्यम है, जो राज्य सरकारों के नियंत्रण और निगरानी में है, वह है सहकारी बैंक। ज्यादातर राज्यों में जिला केंद्र्रीय सहकारी बैंक (डीसीसीबी) और अरबन कोआपरेटिव बैंक (यूसीबी) हैं। ये जिले के प्रमुख बैंक हैं, जो सदस्य सहकारी बैंकों को वित्त पोषण करते हैं।

कुछ डीसीसीबी और यूसीबी पुराने और जानेमाने हैं और उल्लेखनीय सेवाएं दी है, कुछ खराब भी हैं। अच्छी हों या बुरी, इन्हें संचालित करने के लिए राज्य सरकारों के पास पर्याप्त शक्तियां हैं। ऐसे में इनकी स्थिति में बदलाव क्यों किया जाना चाहिए? अध्यादेश के जरिए मोदी सरकार सारे जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों और अरबन कोआपरेटिव बैंकों को केंद्र के नियंत्रण और नियामक के रूप में आरबीआइ के तहत ले आई है। कोआपरेटिव बैंक के सदस्यता ढांचे और वित्तीय ढांचे में बदलाव के अधिकार ले लिए गए हैं, जिसका नतीजा इनके नियंत्रण और प्रबंधन का हस्तातंरण अजनबियों और लुटेरों के हाथ में जाने के रूप में सामने आ सकता है।

इस अध्यादेश के पीछे मकसद यही है कि सभी बड़े वित्तीय संस्थानों को केंद्र सरकार के नियंत्रण में ले लिया जाए और जो जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों और अरबन कोआपरेटिव बैंकों के प्रबंधन (निर्वाचित निदेशक) में है, वे केंद्र सरकार के इशारों पर चलें। यह अध्यादेश राज्य के अधिकारों पर खुला हमला है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम
मेरा मानना है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम कमियों और नियंत्रण के जमाने का है। जब भारत में अतिरिक्त खाद्यान्न है और मांग के अनुरूप आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन की क्षमता है तो इस अधिनियम का कोई स्थान नहीं रह जाता है। फिर भी, इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि मौसमी कमियों या बाढ़ या सूखे की स्थिति में जमाखोर और कालाबाजारिए इसका जम कर फायदा उठाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि आवश्यक वस्तु अधिनियम अभी भी कानूनी किताब में बना हुआ है और कारोबार को नियंत्रित करने के लिए राज्यों को पर्याप्त अधिकार प्रदान करता है, जिसमें स्टॉक सीमा लागू करने का अधिकार भी शामिल है।

अगर केंद्र सरकार इस कानून को और उदार बनाने की इच्छुक है तो यह नीतिगत पत्र जारी कर सकती है या मॉडल कानून लागू कर सकती है और राज्यों को सौंप सकती है। इस तरह का कोई कदम मोदी सरकार को बेलगाम पहुंच नहीं देगा। अध्यादेश के जरिए संचालन की राज्य सरकारों की शक्ति को सीमित कर दिया गया है और स्टॉक सीमा निर्धारण के अधिकार को एक तरह का भ्रम बना दिया गया है। प्रावधान और स्पष्टीकरण के जरिए अध्यादेश को स्टॉक सीमा निर्धारण के मामले में निरर्थक बना दिया गया है। अगर यह अध्यादेश कानून बन गया तो जमाखोर जश्न मनाएंगे।

एपीएमसी अधिनियम और अनुबंध की आजादी
मेरा मानना रहा है कि कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियमों में समय-समय पर बदलाव होते रहना चाहिए और कृषि उत्पादों के विपणन को धीरे-धारे उदार बना दिया जाना चाहिए। इस लक्ष्य को हासिल करने का तरीका मॉडल कानूनों को लागू करना और उनके प्रति भरोसा बनाना है, न कि विधायी आदेश। अध्यादेश के जरिए केंद्र सरकार ने राज्यों के एपीएमसी कानूनों को कुचल दिया है। सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और वे दूसरे राज्य हैं, जिन्होंने सरकारी खरीद में भारी निवेश किया और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का भरोसा दिलाया।

डर इस बात का है कि मोदी सरकार शांता कुमार समिति की विवादास्पद सिफारिशों को लागू करने की कोशिश कर रही है, जिससे सरकारी खरीद, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, एमएसपी का सिद्धांत और खाद्य सुरक्षा का कानून कमजोर हो जाएगा। अनुंबध की आजादी से जुड़ा साथ का अध्यादेश खरीदार को फसल का एमएसपी से कम दाम देने को बाध्य नहीं करता, इससे यह संदेह और गहरा जाता है कि एमएसपी इसी के साथ खत्म हो जाएगा। इन अध्यादेशों के खिलाफ पंजाब के किसान सड़कों पर हैं और पंजाब विधानसभा ने आमराय से इन दोनों अध्यादेशों को खारिज कर दिया है। अकाली दल ने प्रस्ताव के लिए वोट किया।

छत्तीसगढ़ ने अध्यादेशों को वापस लेने की मांग की है। हरियाणा और मध्यप्रदेश ने चुप्पी साधी हुई है। साफ है कि मोदी सरकार अपने भारी-भरकम बहुमत से संशोधनों को पास करा ले जाएगी और ऐसे में राज्य दरकिनार हो जाएंगे और संघवाद को एक और झटका लगेगा। एक राष्ट्र, सब कुछ एक, अंतत: एक राष्ट्र को तबाह कर देगा।

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