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वक्त की नब्जः अभियान और दिलेरी

असली भारतीय मीटू अभियान तब चलेगा जब उन महिलाओं का साथ हम देना शुरू करेंगे, जिनको आज तक यह भी अधिकार नहीं मिला है कि वे अपना वर खुद चुन सकें। अपने परिवार की नजरों में आज भी नब्बे फीसद महिलाओं की एक ही भूमिका है अपने देश में और वह है एक नौकर की।

Author October 14, 2018 2:58 AM
जो महिलाएं वास्तव में बेबस और बेजुबान हैं, उन पर अत्याचार इतना आम है अपने भारत महान में कि जिस तरह मीटू की महिलाओं के हाल पर टीवी पर चर्चाएं हुई हैं उन बेजुबान औरतों की आपबीती पर कभी नहीं होती हैं।

मीटू अभियान का विरोध करना खतरे से खाली नहीं है। पिछले हफ्ते मैंने सोशल मीडिया पर विरोध करने की कोशिश की, तो मेरे विचारों को छोड़ कर कई ‘दिलेर’ महिलाओं ने मेरे निजी जीवन पर भी हमला बोल दिया। इसके बावजूद अगर मैं इस लेख में आज फिर से इस अभियान का विरोध करने जा रही हूं, तो इसलिए कि मैं मानती हूं कि ऐसे अभियान भारत की आम महिलाओं का सशक्तीकरण करने के बजाय उनका नुकसान करते हैं। पहले भी ऐसा हुआ है। जब अमेरिका में साठ-सत्तर के दशक में ‘फेमिनिज्म’ अभियान के तहत वहां की औरतों ने अपनी ब्राजियर उतार कर उनको सरेआम जलाना शुरू कर दिया था, तो कुछ संपन्न घरों की अंग्रेजीभाषी भारतीय महिलाओं ने भी ऐसा किया। शिक्षित थीं ये महिलाएं, लेकिन इतना नहीं जानती थीं कि उनका देश इतना गरीब था उस समय कि नब्बे प्रतिशत से ज्यादा महिलाओं के पास इतने ब्राजियर खरीदने की क्षमता नहीं थी। फेमिनिज्म इस तरह की बेवकूफियों के कारण अपने आप गायब हो गया। भारत की औरतों के लिए बड़े मुद्दे उस समय थे- दूर-दराज जगहों से पानी लाना, चूल्हों के लिए लकड़ियां बटोरना और वे कभी इस फेमिनिज्म अभियान का हिस्सा नहीं बने। मैं मानती हूं कि मीटू भी गायब होने वाला है निकट भविष्य में। इस देश की असली महिलाओं की असली समस्याओं से यह अभियान कोई वास्ता नहीं रखता है।

जिस दिन कुछ ‘दिलेर’ महिला पत्रकारों ने खुल कर अपने पूर्व संपादक एमजे अकबर पर आरोप लगाया कि वे उनको अपने होटल के कमरे में बुला कर परेशान किया करते थे और कभी-कभी दफ्तर में ही उनके साथ गलत हरकतें करते थे, उस दिन बिहार के नवादा जिले में एक मुसलिम बच्ची को पेड़ के साथ बांध कर उसके परिजनों ने कोड़े मार-मार कर जान से मार डाला। इस अठारह साल की बच्ची का दोष यह था कि वह एक हिंदू लड़के के साथ भाग गई थी। उसके घरवालों ने उसको ढूंढ़ निकाला और अपने घर की ‘इज्जत’ बचाने के लिए उसकी जान ले ली। उसकी निर्मम हत्या का इन्होंने विडियो बनाया और सोशल मीडिया पर अपलोड किया। इसको देख कर अंतरराष्ट्रीय अखबारों में भारत की इस बेटी की दर्द भरी कहानी छपी, लेकिन भारतीय अखबारों में नहीं।

अक्सर ऐसा होता है। जो महिलाएं वास्तव में बेबस और बेजुबान हैं, उन पर अत्याचार इतना आम है अपने भारत महान में कि जिस तरह मीटू की महिलाओं के हाल पर टीवी पर चर्चाएं हुई हैं उन बेजुबान औरतों की आपबीती पर कभी नहीं होती हैं। हम जानते हैं उनके हाल के बारे में, तो सिर्फ इसलिए कि ग्रामीण भारत में आजकल फोन पर विडियो बनाने का शौक फैल गया है और ज्यादा शौक से बनते हैं ये विडियो जब कोई गलत काम होते दिखता है।

सो, कुछ महीने पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुआ राजस्थान के बांसवाड़ा जिले की एक घटना का विडियो। इसमें लड़कों की एक भीड़ घेरे हुए है एक नंगे मर्द को, जिसने अपने कंधे पर अपनी नंगी बीवी को उठा रखा है। उस लड़की का चेहरा यह लिखते हुए भी मेरे सामने मंडरा रहा है, क्योंकि उस चेहरे को भुला नहीं पाई हूं। उस चेहरे से जैसे छिन गई थी जिंदा रहने की इच्छा। लड़की को जब जमीन पर पटक कर लड़कों ने उसका रेप करना शुरू किया तब भी उस चेहरे पर भावना की झलक तक नहीं नजर आई। मैं नहीं जानती यह लड़की अब कहां है और किस हाल में है, क्योंकि उसकी कहानी को किसी बड़े अखबार या टीवी चैनल ने आज तक नहीं दिखाया है। ऐसा होता आया है दशकों से।

मेरा अपना अनुभव सुनिए। बात है 1986 की। गुणता बहन नाम की एक आदिवासी औरत के साथ गुजरात के भरूच जिले में थाने के अंदर पुलिसवालों ने सामूहिक बलात्कार किया था और उसने जब एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की उनके खिलाफ, तो उसको मारपीट कर थाने से भगा दिया गया था। गुणता बहन की कहानी गुजरात के एक छोटे अखबार में छोटी-सी खबर बन कर छपी थी। मैंने जब पढ़ी तो इस महिला का साहस देख कर तय किया कि खुद उसके गांव जाऊंगी और उससे मिल कर आऊंगी। सो, गुजरात के उस छोटे, पहाड़ी गांव में पैदल गई दो-तीन घंटे, क्योंकि सड़क नहीं थी गांव तक। गुणता बहन से मिली, पुलिसवालों से मिली और वापस दिल्ली आने के बाद मैंने अपने संपादक को सारी कहानी सुनाई। उसके चेहरे से लगा मुझे कि उसको गुणता बहन की स्टोरी में दिलचस्पी नहीं थी। स्टोरी छप तो गई, लेकिन अखबार के एक ऐसे पन्ने पर, जहां तक ज्यादातर अखबार पढ़ने वाले पहुंचते नहीं हैं।

गुणता बहन जैसी औरतें वास्तव में दिलेर कहलाने का हक रखती हैं। ऐसी सैकड़ों औरतें हैं अपने देश में, लेकिन इनकी कहानियों को हम पत्रकार कभी वह अहमियत नहीं देते हैं, जितनी मीटू अभियान में शामिल होने वाली औरतों को पिछले हफ्ते मिली थी। अखबारों के पहले पन्नों पर छपी उनकी कहानियां, टीवी की चर्चाओं में उनके नाम आए, और बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारों ने उनके ‘साहस’ को दाद दिया। अच्छी बात है कि ऐसा हुआ, लेकिन असली भारतीय मीटू अभियान तब चलेगा जब उन महिलाओं का साथ हम देना शुरू करेंगे, जिनको आज तक यह भी अधिकार नहीं मिला है कि वे अपना वर खुद चुन सकें। अपने परिवार की नजरों में आज भी नब्बे फीसद महिलाओं की एक ही भूमिका है अपने देश में और वह है एक नौकर की। शादी होने के बाद भी अक्सर नौकरानी बन कर रहती हैं भारत की बेटियां, और बेटा नहीं पैदा करती हैं तो कूड़े के तरह बाहर फेंक दी जाती हैं। इस यथार्थ से मीटू का क्या वास्ता?

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