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‘स्मृतिशेष’ कॉलम में चंद्र त्रिखा का लेख : जिंदगी को रंदा लगाता कथा-शिल्पी

यह संभव नहीं लगता कि कोई कृतिकार अपनी एक ही कृति के माध्यम से महाभारत काल और पौराणिक युग के मिथकों, गुरवाणी और सूफीवाद के संदेश और नक्सली आंदोलन तथा आतंकवाद की पृष्ठभूमि की जीवंत प्रस्तुति देकर लेखन को एक विशिष्ट आयाम दे दे।

Author नई दिल्ली | August 21, 2016 7:40 AM
किसी भी क्षेत्रीय भाषा का लेखक अपनी कृतियों के आधार पर एक मुहावरा बन जाए, तो भारतीय साहित्य के विशाल कैनवस पर गर्व होता है।

यह संभव नहीं लगता कि कोई कृतिकार अपनी एक ही कृति के माध्यम से महाभारत काल और पौराणिक युग के मिथकों, गुरवाणी और सूफीवाद के संदेश और नक्सली आंदोलन तथा आतंकवाद की पृष्ठभूमि की जीवंत प्रस्तुति देकर लेखन को एक विशिष्ट आयाम दे दे। मगर गुरदयाल सिंह ने ‘परसा’ सरीखी कालजयी कृतियों के माध्यम से अपनी सृजन-क्षमता की अनूठी पहचान दी। नामवर सिंह जैसे कड़िल समीक्षकों ने उनकी कृति ‘मढ़ी दा दीवा’ की तुलना टालस्टाय के ‘वार ऐंड पीस’ से की। कमोबेश हर समीक्षक ने उनमें भारतीय अस्मिता और पंजाबीयत की अनूठी पहचान के दर्शन किए। किसी भी क्षेत्रीय भाषा का लेखक अपनी कृतियों के आधार पर एक मुहावरा बन जाए, तो भारतीय साहित्य के विशाल कैनवस पर गर्व होता है। गुरदयाल सिंह से मिल कर लगता था कि जैसे फणीश्वरनाथ रेणु से मुलाकात हो गई। कभी-कभी बांग्ला साहित्य के ताराशंकर बंद्योपाध्याय और शंकर याद आ जाते थे। और जब वे एक ही कृति में अनेक कालखंडों के मिथक और दर्शन सहज भाव से ले आते, तो कुर्रतुल ऐन हैदर का ‘आग का दरिया’ याद आ जाता। कभी-कभी ऐसा भी लगता कि टालस्टाय, चेखव, गोर्की, रवींद्रनाथ ठाकुर, पे्रमचंद और हेमिंग्वे से अपने कुछ पात्र और संवाद छूट गए थे। उन पात्रों और संवादों को एक पूरी तरह नए और मौलिक परिवेश में गुरदयाल सिंह की कृतियां बयान करती हैं।

10 जनवरी, 1933 को पंजाब के जिला बठिंडा के एक गांव में पैदा हुए इस महान लेखक ने अपनी जिंदगी मामूली बढ़ईगिरी से शुरू की थी। बाद में बैलगाड़ियों के पहिए बनाने लगे। एक बार वे बता रहे थे कि ‘तब मैं और बापू मिल कर बीस रुपए रोजाना कमा लेते थे। मगर महीने में कभी दो सौ-अढ़ाई सौ से ज्यादा का जुगाड़ नहीं हो पाता था, क्योंकि बापू मुझे जैतो के मिडिल स्कूल भी भेजते थे। कभी-कभी छुट््टी मार लेता, तो अच्छी दिहाड़ी हो जाती। स्कूल के हेडमास्टर मदनमोहन शर्मा कभी-कभी अलग से भी पढ़ा देते। मुझे पेंटिंग का भी शौक था। बढ़ईगिरी में भी पेंटिंग चलती थी। लेकिन इस शौक को इससे ज्यादा आगे बढ़ा नहीं पाया। चौदह बरस की उम्र में बलवंत कौर से शादी हो गई। शादी के बाद कोशिश होती कि दिहाड़ी भी करूं, लिखना-पढ़ना भी जारी रखूं। बापू और बलवंत कौर दोनों का ध्यान रखूं। मैट्रिक के बाद जैसे-तैसे नंदपुरा कोटरा गांव के एक स्कूल में साठ रुपए महीने की नौकरी मिल गई। मगर लगता रहा कि सिर उठा कर जीना है तो आगे पढ़ना होगा। जैसे-तैसे बीए कर ली। फिर 1967 में एमए की पढ़ाई भी पूरी हो गई।… उन दिनों तब बेहद अच्छा लगता, जब पाठ्यक्रमों में शामिल मुझे अपने ही साहित्य पर एक विद्यार्थी की दृष्टि से टीका-टिप्पणी करनी पड़ती।’

शुरुआती दौर में वे गुरदयाल सिंह ‘राही’ नाम से लेखन जगत में उतरे। 1957 में ‘पंज दरिया’ नामक पत्रिका में प्रकाशित उनकी कहानी ‘भागांवाले’ यानी ‘भाग्यशाली लोग’ छपी, तो उस पर भरपूर चर्चा हुई। ‘पंज दरिया’ को उस समय पंजाबी साहित्य में वही स्थान प्राप्त था, जो एक समय में हिंदी में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ पत्रिका को मिला था। हर रचना को कथ्य और शिल्प की दृष्टि से ठोंक-बजा कर ही छापा जाता। उन दिनों ‘पंज दरिया’ के संपादकमोहन सिंह थे। उसके बाद यह सिलसिला थमा नहीं। मगर तब तक लेखन से आजीविका नहीं चल पाती थी। इसलिए अपनी रचनाओं के अनुवाद वे खुद करते और दोस्तों से भी कराते। उनकी अनूदित रचनाएं अपने समय की चर्चित अंगरेजी पत्रिका ‘इंप्रिंट’ में भी छपीं। वहां से पारिश्रमिक अच्छा मिला और संपादक कुर्रतुल ऐन हैदर ने खुद प्रशंसा का पत्र भी लिखा।’

‘मढ़ी दा दीवा’ उपन्यास ने उनको विशिष्ट पहचान दी। वे खुद बताते कि ‘मैंने चार बार अलग-अलग कोण से इस उपन्यास को लिखा। अंगरेजी में इसे साहित्य अकादेमी ने ‘दी लास्ट फ्लिकर’ नाम से छापा। देश की लगभग सभी भाषाओं में इसके अनुवाद छपे।’ उनसे कई बार मुलाकातें हुर्इं। मुझे उनका उदारपंथी प्रगतिवाद बेहद भाता। वे प्रगतिशील होते हुए भी लाल झंडे वाले वामपंथी नहीं थे, हालांकि उनकी अंतिम यात्रा में उन्हें सलामी देने वालों में लेखकों के विशाल वर्ग और साहित्य-जगत के विशिष्ट हस्ताक्षरों के अलावा वामपंथी ट्रेड यूनियनों के नेता और पुराने नक्सलपंथी भी शामिल थे। उनकी बहुचर्चित कृतियों में ‘अनहोए’ (1966), ‘अधचांदनी रात’ (1972), ‘अन्हे घोड़े दा दान’ (1976) और ‘परसा’ (1991) नामक उपन्यास और ‘बेगाना पिंड’, ‘कुत्ता ते आदमी’, ‘कुरीर दी ढींगरी’ आदि कहानी संकलन चर्चा में बने रहे। सोवियतलैंड-नेहरू पुरस्कार, फिर साहित्य अकादेमी पुरस्कार, पंजाब का ‘शिरोमणि साहित्यकार अवार्ड’, 1998 में पद्मश्री, 1999 में ज्ञानपीठ आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मान के बावजूद गुरदयाल सिंह ने कभी ‘सेलीब्रिटी’ का आवरण नहीं ओढ़ा। वे किसी महानगर में जाकर नहीं बसे। जड़ों से जुड़े रहे।

‘मढ़ी दा दीवा’ पर बनी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और ‘अन्हे घोड़े दा दान’ पर बनी फिल्म ‘आस्कर अवार्ड’ के लिए भारतीय प्रविष्टियों में शामिल थी। 1995 तक पंजाबी यूनिवर्सिटी में पढ़ाते रहे। तब भी उनकी स्थिति बेहद विकट हो जाती थी, जब उन्हें एक समीक्षक और प्राध्यापक होने के नाते अपनी ही कृतियों पर लिखना-बोलना पड़ता था। उनकी कृतियां प्राय: पंजाबी के सभी विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों में शामिल रहती थीं। एक बार मैंने उनसे पूछा था कि आपकी प्रिय रचनाएं कौन-सी हैं, तो वे बोले- ‘टालस्टाय की अन्ना कैरेनिना’, जॉन स्टीनबैक की ‘दी ग्रेप्स आॅफ रैथ’, इर्विंग स्टान की ‘लस्ट फार लाइफ’, फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मैला आंचल’, पे्रमचंद का ‘गोदान’ और यशपाल का ‘दिव्या’ ऐसी कृतियां हैं, जिन्हें मैं कई बार पढ़ चुका हूं। अब जबकि लेखक वर्ग शिविरों में बंटा है, गुरदयाल सिंह की कमी ज्यादा अखरेगी, क्योंकि ऐसे कम ही लेखक बचे हैं, जो सभी शिविरों में स्वीकार्य हों। उनकी कृतियों पर स्वतंत्र रूप से और उनके समग्र लेखन पर लिखे गए शोध प्रबंधों की संख्या तो कब की सैकड़ा पार कर चुकी है।

उनके लेखन का ब्योरा देखें तो उन्होंने कुल दस उपन्यास, ग्यारह कहानी संग्रह, तीन नाटक, तीन गद्य कृतियां, दस बाल साहित्य कृतियां, दो खंडों में आत्मकथा और अन्य अनेक फुटकर संकलन, साहित्य को दिए। नामवर सिंह ने उनके उपन्यास ‘मढ़ी दा दीवा’ की तुलना टालस्टाय के उपन्यास ‘युद्ध और शांति’ से करते हुए लिखा कि ‘‘उन्नीसवीं शताब्दी में जब यूरोप में उपन्यास पतन की ओर जाने लगा, तभी एक पिछड़े देश और पिछड़ी कही जाती भाषा के एक उपन्यास ने इसे चढ़त की ओर मोड़ दिया। वह उपन्यास था टालस्टाय की रचना ‘युद्ध और शांति’ और भाषा थी रूसी। ऐसा ही कुछ भारतीय साहित्य के गद्य क्षेत्र में घटा, जब भारतीय उपन्यास अपने शिखर से पतन की ओर जाने लगा, तो बीसवीं सदी के छठे दशक में एक पिछड़ी कही जाने वाली भाषा ने इसे चढ़त की ओर मोड़ दिया। वह उपन्यास था ‘मढ़ी का दीवा’ और उसकी भाषा थी पंजाबी। रूसी में भी इसका अनुवाद हुआ और लगभग दस लाख प्रतियां छपीं।’’ ऐसी महान सृजन प्रतिभा के जाने से भारतीय साहित्य में एक युग का अंत हो गया है।

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