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तींरदाज़ : समाजवाद का तिलिस्म अवतार

सैंडर्स का उदय अमेरिका के लिए जरूरी था। पूंजीवाद चरम पर होने के बावजूद चरमरा रहा है। आम आदमी, व्यापारी या नौकरीपेशा, हाशिये पर आ गया है। राष्ट्रपति ओबामा ने कुछ सर्वजन हिताय के बीज बोए। सैंडर्स नेहल-बैल लेकर खेती शुरू कर दी और अगर वे राष्ट्रपति नहीं भी बनते हैं तब भी बदलाव टल नहीं सकता।

मौसम बदल रहा है। दशकों से बर्फ में लगे विचार और लोग फिर से अंकुरित हो रहे हैं, मुखरित हो रहे हैं। काई साफ हो रही है और कहीं-कहीं लाल रंग फिर से दमकने लगा है। समाजवाद शायद तंद्रा से जाग रहा है- अपने पुराने घर रूस या चीन में नहीं बल्कि पूंजीवादी अमेरिका की गोद में। बर्नी सैंडर्स बोल रहा है।

सैंडर्स डेमोक्रेटिक पार्टी के हैं और वे अमेरिका के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी पाने के लिए अपनी पार्टी की पुरानी खिलाड़ी हिलेरी क्लिंटन से जूझ रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार कौन होगा यह तो अगले आने वाले कुछ महीने बताएंगे, पर पिछले छह-आठ महीनों में इतना जरूर तय हो गया है कि अमेरिका का अगला राष्ट्रपति अपने देश के वाम अंग से परहेज नहीं करेगा। इतना ही नहीं, सैंडर्स और अमेरिकी वाम की बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े पूंजीवादी देश की सोच और दिशा में मूलभूत परिवर्तन ला दिया है। उन्होंने तिरस्कार से उठ कर सम्मान तक का रास्ता तय कर लिया है।

वस्तुत: पूंजीवाद समाजवाद के प्रथम स्पर्श से सिहर उठा है। अभी और कंपन होगा। पर शुरुआती भावावेश से ही लगता है कि अमेरिका में बड़े बदलाव की संभावना बन गई है और इस बदलाव की रूपरेखा स्पष्ट होती जा रही है। सैंडर्स की वजह से अमेरिका बड़े पैमाने पर बदल रहा है, तेजी से बदल रहा है और इस देश की शक्ल, अक्ल और आत्मा अपने नए अवतार की तैयारी लगभग कर चुकी है। जिस अमेरिका को हम आज तक अच्छी तरह से जानते-पहचानते रहे हैं उससे हमें अब दोबारा मुलाकात करनी होगी। मेरा यह कहना कुछ लोगों को अतिशयोक्ति लग सकता है, पर जिस तरह से अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए प्रतिद्वंद्विता का अभियान चल रहा है उससे साफ जाहिर है कि आने वाले सालों में अमेरिका में सोशलिस्ट और वाम विचारधारा की बड़ी हिस्सेदारी होगी।

हां, दूसरी तरफ रिपब्लिकन पार्टी के मजबूत दावेदार डोनाल्ड ट्रम्प भी हैं। खूब समर्थन बटोर रहे हैं। वे राइट विंग हैं, दक्षिणपंथी हैं। पूंजीवाद के समर्थक हैं और नस्लवादी भी हैं। धार्मिक असहिष्णुता का आरोप भी उन पर है। पर वे भी अब पूंजीवाद को अमेरिका की पवित्र गाय (सेक्रेड काउ) नहीं मानते। सैंडर्स और सैंडर्स के साथ जुड़े जन-भाव ने उन्हें सामाजिक और आर्थिक असमानता की तरफ गौर से देखने के लिए मजबूर कर दिया है।

सैंडर्स डेमोक्रेटिक पार्टी में जरूर हैं, पर वे अपने को स्वतंत्र उम्मीदवार मानते हैं। पार्टी का तंत्र भी उन्हें अपना नहीं मानता। पुराने कॉकस या प्रभावी गुट की पसंद हिलेरी क्लिंटन हैं। सैंडर्स उसके लिए एक ‘बाहरी’ व्यक्ति हैं। वे संपन्न परिवार से नहीं हैं, उनके माता-पिता पोलैंड और रूस से थे। वे यहूदी भी हैं, रंगभेद-नस्लभेद के खिलाफ हैं और वॉल स्ट्रीट पर खेले जा रहे पूंजी के खेल के धुर विरोधी हैं। मतलब उनके हाथ में कोई भी तुरुप का पत्ता नहीं है। यानी उन्हें लूजर (परास्त ) वाली श्रेणी में होना चाहिए। पर ऐसा नहीं है। सैंडर्स ने खेल में अपनी सशक्त भागीदारी बना ली है- सिर्फ जन सहयोग के बल पर, अपनी समाजवादी विचारधारा के बल पर। उनका सबका साथ, सबका विकास तर्ज की सोच अमेरिका में लोगों को आकर्षित कर रही है।

सैंडर्स के जन-जुड़ाव का एक बड़ा उदाहरण उनका प्रचार फंड (कैंपेन फंड) आयोजित करने का तरीका है। सैंडर्स ने उद्योगपतियों और बड़ी कंपनियों से पैसा नहीं लिया। अमेरिका में इनसे पैसे लेने की पुरानी परंपरा है। यह चुनाव पद्धति का कानूनन हिस्सा भी है। ट्रम्प ने अपने पैसे लगाए, अपने को रईस साबित करने की हवस में।

हिलेरी और अन्य प्रत्याशियों ने व्यापारियों से पैसे लिये। पर तीस अप्रैल 2015 को अपनी उम्मीदवारी घोषित करते हुए सैंडर्स ने कहा, ‘‘मैं नहीं मानता कि वे सब महिला और पुरुष जिन्होंने अमेरिकी लोकतंत्र के लिए लड़ा वे चाहते होंगे कि खरबपति हमारी राजनीतिक प्रक्रिया के मालिक बन जाएं।’’ सैंडर्स की बात का असर हुआ और चौबीस घंटों में ही आम लोगों ने पंद्रह लाख डॉलर उनकी झोली में डाल दिए। 2015 के अंत तक 7.3 करोड़ डॉलर उनके फंड में आ गए थे। जनवरी के महीने में ही उनको दो करोड़ डॉलर और मिले। लगभग साढ़े बयालीस लाख अमेरिकी नागरिकों ने उनको आर्थिक सहयोग दिया है। ओबामा की तरह सैंडर्स ने भी सोशल मीडिया का भरपूर उपयोग किया है। वे खुद फेसबुक, ट्विटर और रेड्डीट पर लिखते हैं और सवालों का जवाब देते हैं।

सैंडर्स अपने को एक आम आदमी मानते हैं। उनकी जीवन शैली भी आम आदमी की तरह ही है। वे सहज, सरल और मर्यादित हैं। रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनल्ड ट्रम्प की तरह वे अतिवादी नहीं हैं और न ही अपनी पार्टी में प्रत्याशी बनने की दावेदार हिलेरी क्लिंटन की तरह जटिल और चालाक हैं। हां, सिस्टम से जूझना जरूर उनका स्वभाव है। और इसी स्वभाव का चमत्कार है कि वे आज अमेरिका के सबसे बड़े चुनाव में एक मजबूत चुनौती बन कर उभरे हैं।

वास्तव में आज असली चुनौती धार्मिक, आर्थिक तथा रंग और नस्ल का कट्टरवाद है। ट्रम्प जैसे नेता इन प्रवृत्तियों के प्रतिनिधि हैं। दूसरी तरफ वर्ग-वाद के जरिये विशेषाधिकार प्राप्त कर राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक प्रक्रिया पर मालिकाना हक जताने की मानसिकता हिलेरी जैसे नेताओं को प्रेरित करती है। दोनों एक ही थैली क चट्टे-बट्टे हैं। सिर्फ मुखौटे अलग-अलग हैं।

सैंडर्स अमेरिकी चुनाव प्रक्रिया में नागरिक या आम आदमी का दृष्टिकोण लेकर आए हैं। वे रईस उद्योगपतियों के खिलाफ नहीं हैं और न ही वे पूंजीवाद की समाजवाद/मार्क्सवाद से गुत्थमगुत्थी कराना चाहते हैं। वे मौजूदा व्यवस्था में अस्त नहीं होना चाहते और न ही वे उसकी चूलें हिलाना चाहते हैं। सैंडर्स अमेरिका में लाल सलाम के प्रतीक जरूर हैं, पर माओवादी-लेनिनवादी नक्सल बिलकुल नहीं हैं। सैंडर्स अपने देश को समझते हैं। उसके इतिहास को स्वीकार करते हैं। ‘अमेरिकी सपना’ उन्हें भी प्रिय है और उसी से प्रेरित होते हैं, न कि सोवियत रूस की पौराणिक कथाओं से या चीन की विजय गाथा से। आम नागरिक के जीवन को कैसे बेहतर और सरल व उपयोगी बनाया जाए इसके लिए वे अमेरिकी तरीके से प्रयासरत हैं। इसीलिए वे डेमोक्रेटिक पार्टी में होने के बावजूद अपने को स्वतंत्र उम्मीदवार कहते हैं और पार्टी-लीक से हट कर काम कर रहे हैं। उनकी प्रतिबद्धता देश के नागरिकों से है, उनकी बेहतरी से है, न कि रूस में पली-बढ़ी मार्क्सवादी नारेबाजी से या पूंजीवादी मृगतृष्णा से।

सैंडर्स का उदय अमेरिका के लिए जरूरी था। पूंजीवाद चरम पर होने के बावजूद चरमरा रहा है। आम आदमी, व्यापारी या नौकरीपेशा, हाशिये पर आ गया है। राष्ट्रपति ओबामा ने कुछ सर्वजन हिताय के बीज बोए। सैंडर्स नेहल-बैल लेकर खेती शुरू कर दी और अगर वे राष्ट्रपति नहीं भी बनते हैं तब भी बदलाव टल नहीं सकता। उनकी वजह से समाजवादी सोच अमेरिका में घर कर गई है। यह अपने में ही एक ऐतिहासिक घटना है। यह सोच अपना प्रभाव दिखा रही है और आगे भी दिखाएगी। एक तरह से सैंडर्स सोच का चुनाव जीत चुके हैं। ट्रम्प और हिलेरी चाहे व्यवस्था में कितने भी प्रभावशाली क्यों न हों, हार चुके हैं। इसको हम ‘सैंडर्स इफेक्ट’ कह सकते हैं या फिर उदारवादी मार्क्सवाद, मानवीय पूंजीवाद और सैंडर्स व्यक्तित्व का अनूठा संगम। शायद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियां इसी संगम को तलाश रही थीं, पर अपने उथले पानी में ही गोते खाती रह गर्इं।

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