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चर्चा: सपना और सच्चाई

यों तो रोजगार की समस्या अनेक विषयों के साथ हो सकती है, पर जिन कुछ विषयों के साथ अधिक है उनमें संस्कृत भी एक है। दिशाहीनता का अनुभव करते युवक निरुद्देश्य विश्वविद्यालय की डिग्री प्राप्त करने की कतार में लग जाते हैं और बेरोजगारों की पंक्ति लंबी होती जाती है।

Author Published on: March 29, 2020 3:37 AM
केंद्रीय राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान।

सुरेश पंत
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय विधेयक 2019 राज्यसभा से भी पारित हो गया है। इससे पहले इसे लोकसभा पास कर चुकी है। यों इस विधेयक में नया कुछ नहींं है, सिवा इसके कि इसके पारित हो जाने से दिल्ली स्थित राजकीय संस्कृत संस्थान, लाल बहादुर शास्त्री संस्कृत संस्थान तथा तिरुपति स्थित वेंकटेश्वर राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिल जाएगा। इससे एक लाभ तो यह है कि विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ती है। साथ ही बजट अनुदान आदि में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप कर्मचारियों के वेतन बढ़ जाते हैं। पर केंद्रीयकरण से शिक्षा और शिक्षण की गुणवत्ता पर भी बड़ा प्रभाव पड़ने की संभावना हो, यह कहना कठिन न सही, अभी जल्दबाजी लगती है।

अकादमिक क्षेत्र में प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए आधारभूत भौतिक संरचना के अतिरिक्त विशेषज्ञ शिक्षक, स्वस्थ खुला वातावरण और अनुसंधान आदि के लिए नवीनतम सुविधाएं होना भी आवश्यक होता है। कुछ महीने पहले ही मानव संसाधन और विकास मंत्री संसद में स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि संस्कृत विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के लगभग सोलह सौ में से आठ सौ से अधिक पद रिक्त हैं, यानी प्रति विश्वविद्यालय औसतन पचपन पद खाली पड़े हैं। स्पष्ट है कि शिक्षा और शोध पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसलिए अभी तो मुख्य उद्देश्य यह होना चाहिए था कि पहले इन पदों में सुयोग्य और समर्पित शिक्षक रखे जाएं, जिससे शिक्षण कार्य सुधरे और विश्विद्यालयों की गुणवत्ता बढ़े।

भाषा का मुद्दा हमारे देश में बहुत संवेदनशील रहा है। विशेषकर संस्कृत और हिंदी का नाम सुनते ही प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ जाती है। पिछले वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारूप जारी किए जाने पर इन दो भाषाओं को लेकर लाखों प्रतिक्रियाएं मंत्रालय को प्राप्त हुईं, जिसके परिणामस्वरूप शिक्षा नीति की आधिकारिक घोषणा अब तक नहींं हो पाई है। इस विधेयक पर राज्यसभा में बहस के दौरान भी कुछ संसद सदस्यों ने अजीब से तर्क दिए। यहां तक कि एक सदस्य ने संस्कृत को ‘मृत भाषा’ कह दिया। यह कहने का रिवाज-सा हो गया है कि संस्कृत एक मृत भाषा है, जबकि सच्चाई यह है कि कुछ हजार वर्षों के इतिहास में संस्कृत में निरंतरता बनी रही है और आज भी उसमें सृजन और सीमित व्यवहार हो रहा है।

इसलिए इस आरोप का खंडन करते हुए एक अन्य संसद सदस्य का जैसे-को-तैसा वाली भाषा में दिए गए उत्तर का संकेत पर्याप्त होगा। पर किसी भाषा की जीवंतता को निरंतर बनाए रखने के लिए उसका सीखना-सिखाना आवश्यक होगा और इसके लिए मात्र विश्वविद्यालय स्तर पर नहींं, स्कूल स्तर से ही पाठ्यक्रम और शिक्षण युक्तियों में तर्कसंगत परिवर्तन करने होंगे। उसे ग्राह्य और व्यापक बनाना होगा। इस आधारभूत कार्य में इन संस्कृत विश्वविद्यालयों या सरकार की भूमिका क्या हो, यह अधिक विचारणीय है। देखा तो यह भी जा रहा है कि विद्यालय स्तर पर ही संस्कृत का पठन-पाठन उपयुक्त नहींं है और आगे चल कर विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले स्तरीय विद्यार्थी नहींं मिल पाते।

जब भी संस्कृत की बात उठाई जाती है, तो एक प्रतिक्रिया आमतौर पर सुनाई पड़ती है कि यह कदम एक निहित एजेंडे के अंतर्गत उठाया जा रहा है। कथित ‘एजेंडा’ शब्द को परिभाषित करना तो कठिन है, पर संकेत साफ समझ आ जाता है- हिंदुत्व को बढ़ावा देना। दुर्भाग्य से हमारे देश में कुछ भाषाओं को विदेशी या गुलामी का अवशेष कह कर तिरस्कृत कर दिया जाता है और कुछ को किसी जाति, वर्ग या संप्रदाय से जोड़ दिया जाता है। इससे ऊपर उठ कर हम सोच नहींं पाते। परिणामस्वरूप भाषाओं के अनुसार भी ध्रुवीकरण होने लगता है। ऐसा भी नहींं है कि सरकार के इस कदम में कोई राजनीतिक निहितार्थ नहींं हो सकता, पर अगर हो भी तो किसी भाषा या उसके विविध साहित्य को सीखने-पढ़ने या उसके लिए उपयुक्त व्यवस्था करने में क्या बुराई हो सकती है? खुले दिमाग से भाषा विशेष का अध्ययन करने पर ही तो सच्चाई का पता चलेगा।

संस्कृत की आवश्यकता इसलिए नहीं है कि वह विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में एक है। इसलिए भी नहींं है कि उसमें वेद हैं और सारा ज्ञान वेदों में ही संचित है, न इसलिए कि वह देव भाषा या पवित्र भाषा है। ये दावे तो किसी भी प्राचीन भाषा के लिए किए जा सकते हैं। वस्तुत: किए भी जा रहे हैं, जैसे तमिल को लेकर। हमारे विचार से दो पक्ष बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, जो संस्कृत के पक्ष में जाते हैं। एक, संस्कृत में सृजनशील कलाओं से संबंधित श्रेष्ठ कोटि की अनेक साहित्यिक रचनाएं, नाटक, नृत्य, गीत-संगीत आदि से संबंधित अनेक महत्त्वपूर्ण कालजयी कृतियां उपलब्ध हैं।

इस महत्त्वपूर्ण धरोहर का बना रहना अपनी अस्मिता को बचाए रखने के लिए भी जरूरी है। दूसरा यह है कि साहित्यिक/ कलात्मक कृतियों के अतिरिक्त विज्ञान की विविध शाखाओं- रसायन, शरीर विज्ञान, चिकित्सा (औषधीय, प्राकृतिक, शल्य क्रिया आदि) भूगर्भ, ज्योतिर्विज्ञान, गणित, कृषि विज्ञान, पादप विज्ञान आदि पर महत्त्वपूर्ण कृतियां हैं। जहां तक साहित्यिक रसास्वादन का प्रश्न है, ऐसी कृतियां सर्व सुलभ हैं और उन पर हुए अनुसंधान कार्य उन्हें ग्राह्य और स्वीकार्य बना रहे हैं, पर वैज्ञानिक स्थापनाओं में अनेक ऐसी हैं, जिनको केवल इस तर्क पर नहींं स्वीकार किया जा सकता कि अमुक वैज्ञानिक सिद्धांत या आविष्कार का उल्लेख हमारे अमुक ग्रंथ में है इसलिए वह सत्य है। आज के वैज्ञानिक मानदंडों पर नए सिरे से प्रमाणित किए बिना उन्हें कोई नहींं मानेगा।

यही वह कमजोरी है, जो पिछले कुछ वर्षों से दिखाई पड़ रही है। ‘सारे वैज्ञानिक आविष्कार, सब रोगों की अचूक दवाएं, सारे वैज्ञानिक सिद्धांत हमने पहले ही खोज लिए थे’ आदि बयान कोई राजनैतिक नेता दे तो चुप लगाई जा सकती है। पर जब वैज्ञानिक गोष्ठियों में, अंतराष्ट्रीय विज्ञान सम्मेलनों में या ऐसे ही प्रतिष्ठित मंचों पर इस प्रकार के दावे किए जाते हैं तो स्थिति हास्यापद हो जाती है। एक ओर अंतरिक्ष विज्ञान, प्रोद्योगिकी आदि में हमने आश्चर्यजनक और विश्वस्तरीय उपलब्धियां प्राप्त की हैं और दूसरी ओर ऐसे हवाई दावे, जिनका कम से कम अभी कोई वैज्ञानिक आधार नहींं है। तो क्या ये संस्कृत विश्वविद्यालय इस विरोधाभास को दूर करने में समर्थ हो पाएंगे? अभी तो ऐसा लगता नहींं है और ऐसा न लगने के कुछ कारण हैं।

संस्कृत जगत में अधिकतर विद्वान प्राय: इस पारंपरिक पूर्व धारणा को लेकर चलते हैं- चूंकि प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है इसलिए मान लिया जाना चाहिए। ऐसी धारणाओं के तर्कसंगत उत्तर के लिए पृथक विश्वविद्यालय बना कर सीमाबद्ध करने की अपेक्षा अच्छा यह होता कि संस्कृत जैसी समर्थ और संपन्न भाषा में शोध और अनुसंधान के लिए इन विश्वविद्यालयों को अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और तकनीकी शिक्षा संस्थानों से जोड़ा जाता और उनमें अंतर-संकाय समन्वित शोध की व्यवस्था होती। भारतीय तकनीकी संस्थानों में संस्कृत का अभी जो पाठ्यक्रम रखा गया है वह बहुत ही प्रारंभिक स्तर का है, जिससे संस्कृत भाषा से परिचय मात्र हो सकता है। इनमें उन निराधार से लगने वाले दावों पर समन्वित शोध होना चाहिए और पुष्टि होने पर स्वत: ही विज्ञान जगत उन्हें स्वीकार करने को विवश होगा।

अंत में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न रोजी-रोटी का। शिक्षा का उद्देश्य मात्र ज्ञानार्जन नहींं है। उसे पेट से भी जोड़ना होता है। संस्कृत में ही एक सूक्ति है, विद्या को ‘अर्थकरी’ होना चाहिए। इस कसौटी पर ये केंद्रीय विश्वविद्यालय कितने सफल हो पाएंगे? यों तो रोजगार की समस्या अनेक विषयों के साथ हो सकती है, पर जिन कुछ विषयों के साथ अधिक है उनमें संस्कृत भी एक है। दिशाहीनता का अनुभव करते युवक निरुद्देश्य विश्वविद्यालय की डिग्री प्राप्त करने की कतार में लग जाते हैं और बेरोजगारों की पंक्ति लंबी होती जाती है।

मानव संसाधन और विकास मंत्री ने विधेयक पर बहस के दौरान यह तो कहा कि यह कदम इन विश्वविद्यालयों के दर्जे को बढ़ाएगा और डॉक्टरल, पोस्ट-डॉक्टरल शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देगा, भारतीय दर्शन, योग, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के क्षेत्र में शिक्षण प्रदान करने के अवसरों को बढ़ाएगा, पर डिग्रीधारियों को रोजगार मिलने के कितने अवसर प्राप्त हो सकेंगे, इसका संकेत नहींं किया गया। आदर्श और व्यावहारिक स्थिति में स्वप्न और सत्य का सा अंतर होना आवश्यक नहींं है।

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