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वक्‍त की नब्‍ज: घाटी के अनुत्तरित सवाल

अजित डोभाल ने कम से कम कोशिश तो की थी यह दिखाने की कि घाटी के आम लोग खुश हैं भारतीय सरकार की नई कश्मीरी नीति से। उनके बाद अगर कोई मंत्री गया है घाटी के आम लोगों से बात करने, उनका मन जानने, तो इतने चुपके से कि किसी को पता नहीं लगा है।

Article 370कश्‍मीर में धारा 370 हटाने के बाद तैनात सुरक्षा बल। फाइल फोटो।

बहुत दिनों बाद पिछले हफ्ते एक इतना गंभीर जिहादी हमला हुआ था कि जम्मू से कश्मीर जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग घंटों तक बंद रखना पड़ा। जम्मू से थोड़ी दूर बाहर एक टोल प्लाजा पर जब एक संदिग्ध ट्रक की चेकिंग करने का प्रयास किया सुरक्षा कर्मियों ने, तो ट्रक के अंदर से गोलियां चलने लगीं और चार जिहादी मारे गए। चारों उस ट्रक के अंदर छिपे हुए थे और जा रहे थे कश्मीर घाटी की तरफ। उस ट्रक की जब तलाशी ली गई, तो असलहा, बम और बंदूकें बरामद हुर्इं।

इस हादसे ने याद दिलाया है कि पाकिस्तान का इस देश पर दशकों से चल रहा अघोषित युद्ध अभी तक जारी है। याद यह भी दिलाया इस हादसे ने कि अभी तक कश्मीर घाटी में अशांति और अराजकता कम करने का गृहमंत्री का वादा पूरा नहीं हुआ है। याद कीजिए वह भाषण, जो मंत्रीजी ने दिया था पांच अगस्त के दिन पिछले वर्ष लोकसभा में, जब उन्होंने अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के लिए प्रस्ताव रखा था संसद में। उस भाषण में अमित शाह ने कहा- अनुच्छेद 370 को हटाना जरूरी हो गया है, ताकि कश्मीर घाटी में जिहादी आतंकवाद को रोका जा सके और विकास और प्रगति की गाड़ी भारत के इस इकलौते मुसलिम बहुल राज्य में तेजी से चलने लगे।

यहां मैं स्पष्ट करना चाहती हूं कि मेरी राय में अनुच्छेद 370 के खत्म होने का वैसे भी समय आ गया था। इसलिए कि इसकी शरण लेकर कश्मीरी राजनेताओं ने ‘आजादी’ की झूठी आशा को जिंदा रखने का काम किया है शुरू से। ये वे लोग भी करते थे, जिन्होंने अपने आप को भारत के हमदर्द के रूप में पेश किया है और ऊंचे पदों पर आसीन होने से पहले शपथ ली है भारतीय संविधान की। मगर चुपके से उनका साथ भी दिया है, जो कश्मीर घाटी में न सिर्फ आजादी मांग रहे हैं, बल्कि स्पष्ट यह भी कर रहे हैं कि कश्मीर घाटी में शरीअत नाफिस करना उनका असली लक्ष्य है।

ऐसा करके दूरियां बनाते हैं हिंदुओं और मुसलमानों के बीच। हिंदू-मुसलिम तनाव बढ़ाने का उदाहरण महबूबा मुफ्ती ने पिछले हफ्ते दिया यह कह कर कि कश्मीर में ‘बाहरी’ (यानी हिंदू) लोगों को लाने की कोशिश की जा रही है, ताकि घाटी की आबादी बदल जाए। जिहादी आतंकवादियों को उकसाना चाहती थीं अगर कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री, तो सफल रहीं। इस बयान के कुछ ही घंटों बाद नगरोटा के टोल प्लाजा पर वह मुठभेड़ हुई। कश्मीर घाटी के राजनेताओं ने कई बार इस तरह के भड़काऊ बयान दिए हैं। लेकिन मुश्किलें बढ़ती हैं जब देश के सबसे बड़े राजनेता भी भड़काऊ बयान देने लग जाते हैं।

पिछले सप्ताह जिहादी हमले के कुछ ही दिन पूर्व अमित शाह ने ट्वीट करके कश्मीरी राजनीतिक दलों के गठबंधन को ‘गुपकार गैंग’ कहा और आरोप लगाया कि ये लोग विदेशी ताकतों का सहारा लेकर अशांति फैलाना चाहते हैं घाटी में। सवाल उठता है गृहमंत्रीजी कि अभी तक आप शांति क्यों नहीं ला पाए हैं कश्मीर में? एक पूरा साल गुजर गया है, जिसमें घाटी को आपने पूरी तरह कर्फ्यू में रखा है और इंटरनेट भी बंद रहा है। सैकड़ों सुरक्षाकर्मी तैनात हैं घाटी के शहरों में और सीमाओं पर सेना पहरा दे रही है, तो शांति क्यों नहीं आई है अभी तक?

क्या इसलिए कि नरेंद्र मोदी ने अपने सात वर्षों के कार्यकाल में दिखाया है बार-बार कि पहला कदम उठाने में माहिर हैं, लेकिन उठाते हैं दूसरे कदम के बारे में सोचे बिना। सो, क्या ऐसा कहना गलत न होगा की कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने के बाद मोदी सरकार ने अपने अगले कदम के बारे में सोचा ही नहीं है? पिछले दिनों मैंने अपने कुछ कश्मीरी दोस्तों से बात की और मालूम हुआ कि उनकी सबसे बड़ी समस्या यही है कि कमाई के तमाम साधन बंद हो गए हैं। घाटी की अर्थव्यवस्था काफी हद तक पर्यटन पर निर्भर है और जबसे अनुच्छेद 370 हटाया गया है, पर्यटक कश्मीर जाने से डरते हैं।

मोदी सरकार का वादा था विकास लाने का युद्ध स्तर पर। वादा था निवेशकों को आकर्षित करना, लेकिन सच यह है कि न सरकार की तरफ से निवेश हुआ है विकास में और न ही निजी निवेशक आए हैं। ऊपर से भारत के लिए नफरत बनी है कश्मीर घाटी के अंदर। अनुच्छेद 370 के बाद अगले कदम के बारे में सोचा होता प्रधानमंत्री ने तो शायद यह हाल न होता। अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजित डोभाल को श्रीनगर भेजा गया, जहां उन्होंने एक सूनी सड़क पर दो-तीन कश्मीरी बुजर्गों के साथ बिरयानी खाते हुए अपनी तस्वीरें खिंचवाई। ऐसा करके क्या साबित करना चाहते थे, समझना मुश्किल है।

लोग न तो इतने बेवकूफ हैं और न इतने अंधे कि हकीकत और सरकारी प्रचार का फर्क नहीं देख सकते हैं। लेकिन अजित डोभाल ने कम से कम कोशिश तो की थी यह दिखाने की कि घाटी के आम लोग खुश हैं भारतीय सरकार की नई कश्मीरी नीति से। उनके बाद अगर कोई मंत्री गया है घाटी के आम लोगों से बात करने, उनका मन जानने, तो इतने चुपके से कि किसी को पता नहीं लगा है।

अगर यह सोची-समझी रणनीति है, तो जरूरी है कि मोदी सरकार हमको बताए कि आम कश्मीरियों का दिल जीतने के लिए कौन-से कदम उठाए जा रहे हैं। ऐसा किए बिना जिहादी आतंकवाद को रोकना तकरीबन नामुमकिन है, क्योंकि इन जिहादियों को शरण मिलती है कश्मीर के आम लोगों से। जिहादी आतंकवाद नहीं रुकता है, तो कौन जाएगा कश्मीर में निवेश करने? इस बात को पाकिस्तान के सैनिक शासक अच्छी तरह समझते हैं, तो जिहादी हमले जारी रहेंगे। हमारी रणनीति क्या है?

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