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चर्चाः सीखना बनाम सिखाना – सीखने की प्रक्रिया और व्यक्तित्व विकास

पिछले डेढ़-दो दशक से लगातार इस समस्या का हल निकालने की कोशिश होती रही है कि बच्चों को किस तरह प्रभावी ढंग से सिखाया-पढ़ाया जाए। इसी क्रम में गतिविधि आधारित शिक्षा के कुछ तरीके ईजाद किए गए, जिनके जरिए बच्चों को आनंद के साथ पढ़ाई का माहौल देने की कोशिश की जाती है। मगर हकीकत यह है कि गतिविधि आधारित शिक्षा से बच्चे के सीखने की क्षमता में विकास का उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा। इसकी कई वजहें हैं, जिनमें एक यह भी मानी जाती है कि सिखाने की प्रक्रिया अपने पारंपरिक ढांचे से बाहर नहीं निकल पाई है। क्या अधिक अनुशासन और रोजगारपरक शिक्षण का उद्देश्य बच्चे के सीखने की स्वाभाविक प्रवृत्ति को बाधित करते हैं? इस बार की चर्चा इसी पर। - संपादक

Author May 20, 2018 04:22 am
विभिन्न शैक्षिक-मनोवैज्ञानिक शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि बच्चे हों या वयस्क, वे तभी अपनी उच्च क्षमताओं को प्रदर्शित कर पाते हैं, जब उन्हें कार्य करने या सीखने का ऐसा वातावरण उपलब्ध कराया जाता है, जिसमें वे मौलिक रूप से अपनी भावनाओं, इच्छाओं, विचारों आदि को प्रदर्शित कर पाते हैं।

स्वतंत्र रिछारिया

मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य का व्यवहार तर्क और भावना दोनों का सम्मिश्रण है। समाजीकरण और व्यक्तित्व विकास में सार्थक के साथ निरर्थक, उपयोगी के साथ अनुपयोगी, सभी प्रक्रियाओं गतिविधियों की आवश्यकता होती है। पांच वर्ष की आयुवर्ग तक बच्चों का अधिकतर समय गैर-तार्किक और अनुपयोगी कार्यों में व्यतीत होता है। बच्चों की यह गैर-तार्किक, असंगत, बेमतलब गतिविधियां ही उनके सीखने की प्रक्रिया को संचालित करती हैं। बच्चे की प्रारंभिक भाषा गैर-तार्किक और बेतुकी ध्वनियों और आवाजों से ही प्रारंभ होती है, जो आगे चल कर एक स्पष्ट भाषा का रूप ले लेती है। बच्चों की खेल गतिविधियां सफलता या किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए न होकर सिर्फ आनंदित होने के लिए होती हैं। बच्चों की इन गैर-तार्किक और बेतुकी बातों और गतिविधियों को तर्क और अनुशासन के आधार पर वयस्कों को समझ पाना अक्सर कठिन होता है।

निराशा, विफलता, अवसाद और तनाव तीव्र गति से दौड़ते आज के इस उत्तर-आधुनिक समाज के कुछ समान्य शब्द हैं। वैसे तो इन शब्दों से मानव अपने जीवन काल में कई बार आमना-सामना करता ही रहता है, पर आज के युवा खासकर बच्चे और किशोर तनाव का कुछ ज्यादा ही सामना कर रहे हैं। जब बच्चों और किशोरों में व्याप्त इस बैचेनी और तनाव का सूक्ष्म विश्लेषण करें, तब समाज की दो प्रमुख सामाजिक संस्थाएं इसके लिए उत्तरदायी समझ आती हैं। परिवार और स्कूल दो प्रमुख सामाजिक संस्थाएं हैं, जो बच्चों के समाजीकरण और ज्ञानात्मक विकास की प्रक्रिया को मुख्य रूप से संचालित करती हैं।

इन दोनों संस्थाओं की प्रक्रियाओं और गतिविधियों को देखें तो हम जान सकते हैं कि आज स्कूल और परिवार दोनों ने अपने आप को इस प्रकार संरचित कर लिया है, जिसमें बच्चों/ किशोरों के लिए व्यक्तिगत रुचि, स्वतंत्रता, और मनोगत रचनात्मकता के अवसर बहुत कम मिल पाते हैं। स्कूल के पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम और नियमों द्वारा बच्चे छह-सात घंटे रोज व्यतीत करते हैं। स्कूल में होने वाली प्रार्थना से लेकर अंतिम घंटे तक बच्चे शिक्षक या स्कूल के निर्देशों का पालन कर रहे होते हैं। स्कूल के इन घंटों में मौलिक अभिव्यक्ति, सहभागिता बमुश्किल बच्चों को मिल पाती है।
कुछ समय पहले तक बच्चे घर आकर स्कूल के अति-अनुशासन और तनाव के माहौल को भूल जाते थे, क्योंकि घर में वे अपने मन का वह सब कर सकते थे, जो उन्हें आनंदित करे, ऊर्जावान करे। पर प्रतियोगिता आधारित इस समय में जहां आर्थिक रूप से सफल होना ही अंतिम लक्ष्य है, घर भी स्कूल/ कॉलेज के उप-केंद्र बन गए हैं।

अभिभावकों की अंतहीन अपेक्षाएं बच्चे की मौलिक अभिव्यक्ति की संभावनाएं समाप्त कर देती हैं। घरों में भी बच्चों को अनुशासित रहते हुए वही सब करने का आदेश दिया जाता है, जो आने वाले समय में उसे आर्थिक रूप से सफल बना सके। इस तरह स्कूल और घर की प्रक्रियाओं में एक बड़ी समानता दिखती है- सिर्फ सार्थक कार्यों का आग्रह। स्कूल और अभिभावक आज बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि बच्चे सिर्फ ऐसे सार्थक कार्यों और बातों में संलग्न रहें, जिनसे उन्हें भविष्य में सफलता प्राप्त हो सके। स्कूल और घर दोनों ने बच्चों के अपने मन के कार्यों और खेल गतिविधियों को समाप्त करने पर तुले हुए हैं। बड़ों को लगता है कि यह सब, जो बच्चे कर रहे हैं वह सब अनुपयोगी है और बच्चे समय खराब कर रहे हैं।

अब बच्चे सिर्फ वयस्कों द्वारा निर्धारित नियमों, मूल्यों अपेक्षाओं के अनुरूप ही व्यवहार करने को मजबूर हैं। बच्चे क्या चाहते हैं? उनकी मौलिक अभिव्यक्ति और उनका स्वतंत्र रूप से व्यवहार करना क्यों आवश्यक है? इन महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की चिंता न तो स्कूल को है, और न ही अभिभावकों को।
बच्चे क्या, अगर वयस्क भी अपने व्यवहार पर ध्यान दें, तो जान सकते हैं कि वे भी अपने दैनिक व्यवहार और गतिविधियों में कई गैर-तार्किक और अनुपयोगी कार्य करते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार मानसिक संतुलन और व्यक्तित्व स्थायित्व हेतु तर्क और अनुशासन के साथ-साथ गैर-तार्किक, अनुपयोगी कार्यों का भी अपना महत्त्व है।

बच्चों के सीखने की प्रक्रिया को संचालित करते समय स्कूल, अभिभावक, समाज यह भूल जाते हैं कि अति अनुशासन और अतिसंरचित नियम तथा गतिविधियां नकारात्मक रूप से व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार के वातावरण में बच्चे अपनी मौलिक अभिव्यक्ति खो देते हैं और उनकी प्रश्न करने, जिज्ञासा करने की प्रवृत्ति क्षीण होने लगती है। कुछ दशक पूर्व स्कूलों और अभिभावकों ने बच्चों को स्वाभाविक खेल-कूद और आनंदित होने के अवसर से दूर करने के लिए गतिविधि संबंधी कक्षा के रूप में एक नई अवधारणा को जन्म दिया। इसमें व्यक्तित्व विकास के नाम पर खेल, संगीत, गायन, नृत्य, चित्रकारी, घुड़सवारी, तैराकी आदि गतिविधियों को संचालित किया जाता है। वयस्कों को लगता है कि इन गतिविधियों से बच्चों का मनोरंजन होता है और वे नया कौशल सीख रहे हैं, जिनसे उनके व्यक्तित्व में निखार आएगा। ज्यादातर समय बच्चों ने इस तरह की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेते हैं, क्योंकि वे उनके लिए वास्तविक आनंद प्रदान करने में असमर्थ होती हैं।

वयस्क बालमन से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण बात भूल जाते हैं। बच्चे उन्हीं गतिविधियों को करते हुए आनंदित महसूस करते हैं, जिनका चयन वे खुद करते हैं। स्कूल द्वारा दी गई गतिविधि बच्चों को एक पाठ्य कक्षा की भांति लगती है। बिना मन के तैराकी, संगीत या खेल गतिविधि उन्हें गणित या विज्ञान की कक्षा की तरह अरुचिकर ही लगती है। सीखने के प्रारंभिक पांच-सात वर्षों में बच्चे केवल उन्हीं गतिविधियों में पूरी तरह सहभागी हो पाते हैं, जिनमें उन्हें आनंद प्राप्त होता है। वे किसी भी कार्य को उपयोगिता के आधार पर नहीं करते, बल्कि उसे चुनने का एकमात्र आधार उससे प्राप्त होने वाला आनंद होता है। अगर बच्चों को अनुशासन, भय से किसी भी प्रकार की गतिविधि में बिना उनकी इच्छा के सम्मिलित किया जाता है, तो न सिर्फ उनके सीखने की प्रक्रिया बाधित होती है, बल्कि उनके व्यक्तित्व पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अगर अभिभावक और स्कूल बिना तनाव, अवसाद या दमन के समाजीकरण और ज्ञान अर्जित करने की प्रक्रिया को संचालित करना चाहते हैं, तो उन्हें घर और स्कूल में इस अति-संरचित, अति-अनुशासित, अति-सार्थक आग्रही व्यवस्था को बदलना होगा। बच्चों को स्कूल की शिक्षण प्रक्रिया और घर में ऐसे अवसर उपलब्ध कराने होंगे, जिनमें बच्चे अपनी भावनाओं, इच्छाओं को मौलिक रूप से अभिव्यक्त कर सकें। विभिन्न शैक्षिक/ मनोवैज्ञानिक शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि बच्चे हों या वयस्क, वे तभी अपनी उच्च क्षमताओं को प्रदर्शित कर पाते हैं, जब उन्हें कार्य करने या सीखने का ऐसा वातावरण उपलब्ध कराया जाता है, जिसमें वे मौलिक रूप से अपनी भावनाओं, इच्छाओं, विचारों आदि को प्रदर्शित कर पाते हैं।

स्कूल की पाठ्यचर्या बनाते समय विभिन्न विषयों की कक्षाओं के साथ-साथ बच्चों की मौलिक अभिव्यक्ति के लिए अनिवार्य रूप में विशेष समय उपलब्ध कराना होगा। जिस प्रकार संसद की कार्यवाही में एक शून्य-काल होता है, जिसमें किसी भी प्रश्न को संबंधित उत्तरदायी व्यक्ति से पूछा जा सकता है। उसी प्रकार स्कूल के दिन भर की समय-सारिणी में एक कक्षा शून्य कक्षा घोषित की जानी चाहिए, जिसमें बच्चे अपने उन सभी बेतुके, बेमतलब मौलिक प्रश्न पूछ पाएं, अपनी अंतहीन जिज्ञासाएं पूरी कर पाएं। स्कूल की इस शून्य-कक्षा में बच्चों को चिल्लाने, बोलने, नाचने सहित वे सभी अतार्किक बातें करने की छूट होनी चाहिए, जिन्हें वह समान्य विषयगत कक्षाओं और स्कूल की दिनचर्या में नहीं कर पाते हैं। अभिभावकों को भी घर में ऐसे अवसर उपलब्ध कराने होंगे, जिनमें बच्चे अपनी मौलिक अभिव्यक्ति का प्रदर्शन कर सकें। बच्चों के कल्याण के लिए तर्क और भावना के बीच उचित संतुलन आवश्यक है। तभी हम बच्चों का वास्तविक सर्वांगीण विकास सुनिश्चित कर पाएंगे।

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