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दूसरी नजर: अर्थव्यवस्था के लिए मनमोहन नुस्खा

सरकार ने जिस तरीके से मुक्त व्यापार को खत्म कर डाला है, उससे दुनिया भर में एक गहरा संदेह पैदा हो गया है। भारत खुल कर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों को तोड़ने की बात कहता रहा है और बहुपक्षीय व द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के खिलाफ मोर्चा तान दिया है। आयात किए जाने वाले सामान का यहां निर्माण करना खुशहाली का नया (पुराना?) रास्ता है। मात्रात्मक प्रतिबंध, उच्च शुल्क और गैर शुल्क बाधाओं की वापसी हो रही है। मैं इसे ट्रंप का असर कहता हूं, सरकार इसे आत्मनिर्भर कहती है, जो 1960 से 1990 के बीच अपनाई गई तानाशाही नीतियों से कहीं अलग नहीं है।

पूर्व प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मनमोहन सिंह। फाइल फोटो-इंडियन एक्सप्रेस।

कुछ दिन पहले डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रवीण चक्रवर्ती के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने के बारे में एक लेख (द हिंदू, 3 अगस्त 2020) लिखा था। इसमें आसान से तीन लक्ष्य बताए गए हैं- लोगों के बीच विश्वास बहाली, बैंकरों के बीच विश्वास बहाली, और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बीच विश्वास बहाल करना। इसमें हरेक में विस्तार से उपाय बताए गए हैं, जो एक जिम्मेदार और सक्षम सरकार की समझ और क्षमताओं से परे नहीं हैं।
जैसा कि अंदाजा था, इस लेख पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई। जाहिर है, कोई भी पूछ सकता है कि क्या हर लेख पर सरकार को प्रतिक्रिया देनी चाहिए? जवाब है, नहीं। लेकिन यह कोई साधारण लेख नहीं है। डॉ. सिंह जिन्होंने भारत में आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जो पांच वर्ष वित्त मंत्री रहे और दस साल प्रधानमंत्री, इसके सह-लेखक हैं।

खैर जो हो, क्या सिंह-चक्रवर्ती के ये उपाय ठोस और तर्कसंगत हैं? आप में से हर एक इन विचारों को उस हकीकत से जोड़ कर देख सकता है जो आप अपने चारों ओर देख रहे हैं। मैंने अपने पैतृक जिले शिवगंगा और तमिलनाडु के पड़ोसी जिलों में इस बारे में हकीकत जानने की कोशिश की है। लोग क्या सोचते हैं, देखिए।

लोगों के बीच
लोगों के बीच खर्च करने को लेकर खौफ बना हुआ है। उनके पास पर्याप्त पैसा नहीं है, कइयों का रोजगार चला गया है, या रोजगार जाने का डर है, और अगर कोई बीमार पड़ जाए और अस्पताल में भर्ती होना पड़े तो क्या हो? लोगों के पास जो थोड़ा-सा पैसा है भी, तो वे निकाल नहीं रहे, जमा करके रख रहे हैं। अगर किसी के पास ज्यादा पैसा है तो वह सोने में निवेश कर रहा है (सोने की खरीद अनिश्चितता को बता रही है)। 31 जुलाई को लोगों के बीच 26,72, 446 करोड़ रुपए की मुद्रा थी। पिछले बारह महीनों में मांग बारह फीसद और सावधि जमाएं साढ़े दस फीसद की दर से बढ़ी हैं। लोग सिर्फ किराने की दुकानों, फल, सब्जी और दवा की दुकानों पर ही पैसा निकाल रहे हैं। नतीजतन, खरीद के ज्यादातर ठिकाने जैसे कपड़ा, जूते, फर्नीचर, खिलौने, इलैक्ट्रॉनिक सामान की दुकानें और रेस्तरां खाली पड़े हैं।

संक्रमण का खौफ इस कदर फैल गया है कि कई लोग तो चिकित्सक के पास या अस्पताल जाने तक से बच रहे हैं। कई सामान्य चिकित्सकों ने तो अपने क्लीनिक ही बंद कर दिए हैं। स्थानीय वैद्यों की मांग बढ़ निकली है। आयुष की भी वापसी हो रही है।

इन हालात में मांग कैसे निकलेगी? इसलिए डा. सिंह ने लोगों के हाथ में नगदी पहुंचाने की जरूरत को दोहराया है। शायद भारत ही सिर्फ एक ऐसा बड़ा देश है जो नगदी हस्तातंरण से बच निकला है, इस डर के बावजूद कि गरीबी रेखा से जरा ही ऊपर के लोग फिर से गरीबी में जा सकते हैं।

बैंकरों के बीच (और कर्जदारों)
वित्तमंत्री के उपदेशों को जरा भी अहमियत देते हुए मैंने अब तक किसी को नहीं सुना। बैंकरों ने आरबीआइ की बात को सुना, जिसमें उसने मार्च 2021 तक एनपीए 14.7 फीसद तक पहुंच जाने की चेतावनी दी है। कर्जदारों की मौजूदा बैलेंस शीटों की हालत देख कर कोई बैंकर उधार नहीं देगा।

धूमधड़ाके के साथ घोषित की गई तीन लाख करोड़ रुपए वाली क्रेडिट गारंटी योजना की नियति पर जरा गौर करें। हमें यह भरोसा दिलाया गया था कि कर्ज डूबने की सूरत में सरकार बैंकों को तीन लाख करोड़ रुपए तक की गारंटी देगी। हमें लगा था कि कुल उधारी तीस लाख करोड़ (अगर एनपीए दस फीसद मान कर चला जाए) तक जा सकती है। स्पष्ट है कि हम गलत थे। सरकार ने अब संकेत दिया है कि उसने सिर्फ कुल तीन लाख करोड़ रुपए के कर्ज का वादा किया था, जिसमें से एक लाख छत्तीस हजार करोड़ रुपए मंजूर किए जा चुके हैं और सत्तासी हजार दो सौ सत्ताईस करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। मुझे एक तमिल कहावत याद आती है कि गधे ने अपने को काली चींटी जितना छोटा कर लिया! थोड़े से उत्साह और ज्यादा धूमधड़ाके के बीच योजना को बड़े कारोबारियों और स्वरोजगार में लगे पेशेवरों को भी उधार देने के लिए विस्तारित कर दिया गया है।

हालांकि कर्ज लेने वालों के बीच कोई विश्वास नजर नहीं अता। तिरुप्पुर कपड़ा उद्योग अपनी क्षमता का तीस फीसद उत्पादन कर रहा है। ठेके या फुटकर इकाइयों में कुल क्षमता का साठ फीसद काम है। हार्डवेयर कारोबारी, सीमेंट डीलर या टायरों के डीलर भारी मुश्किल में हैं और सामान्य दिनों के मुकाबले मात्र बीस फीसद आर्डर मिल रहे हैं। संभावित कर्जदार इस डर के मारे कर्ज नहीं ले रहे हैं कि वे उसे चुकाएंगे कहां से। अगर उनके पास अपना पैसा है तो वह उसे कारोबार में लगाएं, और नहीं लगाते हैं तो उन्हें कम क्षमता के साथ काम करने को विवश होना पड़ेगा।

बड़े कारोबार और उद्योग सार्वजनिक रूप से एलान कर चुके हैं कि वे पूंजीगत खर्च में कटौती करेंगे और नगदी बचाएंगे। मशहूर उद्योग घराने तक अपने को कर्ज मुक्त करने के इरादे की घोषणा कर चुके हैं। इन सबका असर वृद्धि और रोजगार सृजन पर पड़ेगा।

अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बीच
सरकार ने जिस तरीके से मुक्त व्यापार को खत्म कर डाला है, उससे दुनिया भर में एक गहरा संदेह पैदा हो गया है। भारत खुल कर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों को तोड़ने की बात कहता रहा है और बहुपक्षीय व द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के खिलाफ मोर्चा तान दिया है। आयात किए जाने वाले सामान का यहां निर्माण करना खुशहाली का नया (पुराना?) रास्ता है। मात्रात्मक प्रतिबंध, उच्च शुल्क और गैर शुल्क बाधाओं की वापसी हो रही है। मैं इसे ट्रंप का असर कहता हूं, सरकार इसे आत्मनिर्भर कहती है, जो 1960 से 1990 के बीच अपनाई गई तानाशाही नीतियों से कहीं अलग नहीं है।

जरा उन संस्थानों पर नजर डालें जो अपनी वह ताकत खो चुके हैं जो उन्हें मिलनी चाहिए थी। इनमें सूचना आयोग, चुनाव आयोग, प्रतिस्पर्धा आयोग, नीति आयोग (पूर्व योजना आयोग), प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद, मुख्य आर्थिक सलाहकार का दफ्तर, नियंत्रक और महालेखाकार परीक्षक का दफ्तर और ऐसे ही कई अन्य भी। कई अधिकार आयोग गहरी नींद में हैं, इनमें कोई भी मानवाधिकार आयोग से बेहतर नहीं है। आज कारोबारियों, संस्थागत निवेशकों, पेंशन फंडों और वेल्थ फंडों के बीच भारत को लेकर राय खराब है।

तिहरे संकट- अर्थव्यवस्था का कुप्रबंधन, महामारी का फैलना और चीन के साथ टकराव ने भारत की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। डॉ. सिंह और श्री चक्रवर्ती ने भारत को आर्थिक संकट से निकलने के लिए व्यावहारिक और उपयुक्त रास्ता दिखाया है।

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