ताज़ा खबर
 

बाखबर: उठ उठ री लघु लघु लोल लहर

शाम के छह बजे ज्यों ही पड़े हुए वोटों के आंकड़े आते हैं, त्यों ही एंकरों और रिपोर्टरों की परेशानी बढ़ जाती है कि ये क्या? जरा-सी भी लहर नहीं? ये कैसा चुनाव है? आश्चर्य कि किसी की लहर नहीं दिखती। पता नहीं अब क्या होगा!

Author April 14, 2019 5:43 AM
वृहस्पतिवार को इक्यानवे सीटों के एकदम शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव संपन्न होकर चुके हैं और अपने कई एंकर ‘लहर’ खोजने में लग गए हैं।

चैनल ‘सुपर-एक्शन’ में हैं। वे वोटिंग बूथों में वोट डालने वालों की लंबी कतारें दिखाते हैं। यत्र-तत्र हुई छिटपुट घटनाओं को भी दिखाते हैं। वे कभी वोट डालने वालों के मूड को टोटोलने लगते हैं, तो कभी लहर खोजने लगते हैं कि किसकी लहर है? लेकिन इन दिनों के वोटर बड़े ही ‘सयाने’ नजर आते हैं। कैराना हो या मुजफ्फरनगर, किसी कैमरे के आगे वे अपने मन की असली बात नहीं कहते। हां, कैमरों के आगे अपनी भड़ास जरूर निकालते हैं। वोटरों की भाषा बदली-बदली नजर आती है। आजकल वे उसी राजनीतिक मुहावरे में बोलते हैं, जिस मुहावरे में एंकर, दलों के नेता और उनके प्रवक्ता बोला करते हैं।कुछ कहते हैं कि कुछ भी नहीं हुआ। कोई विकास नहीं हुआ। सड़कों को देखो। कैसी खस्ता हाल हैं? बिजली आती कहां है? अबकी बार गठबंधन ही आएगा।… लेकिन वहां कोई एक चेहरा तय नहीं? कोई बात नहीं, चेहरा बाद में तय हो जाएगा! सब मिल कर तय कर लेंगे।…

इसके जवाब में कुछ कहते हैं कि जो सत्तर साल में नहीं हुआ था, वह पांच साल में हुआ है। दुनिया में भारत की इज्जत बढ़ी है। राष्ट्र मजबूत हुआ है, ताकत बढ़ी है। पहले देश है, बाद में कुछ और है।…
रिपोर्टरों की सबसे बड़ी समस्या है कि सर्वत्र मौजूद ऐसे धुर विरोधियों के बीच संतुलन कैसे बिठाएं? अगर अधिक आलोचना हो गई तो गए और अगर कम हुई तो भी गए! पता नहीं कि कौन बनेगा प्रधानमंत्री?
चैनलों के लिए कन्हैया कुमार नया हीरो हैं। कन्हैया का रोड शो सुपर हिट दिखता है। बेगूसराय अचानक खबरों में छा गया है। एक चैनल बेगूसराय को ‘हॉट सीट’ का दर्जा देता है। इंडिया टुडे के राहुल कंवल कन्हैया के घर पहुंच कर कन्हैया के घर को दिखाते हैं। एकदम साधारण सबाल्टर्न गरीब-सा घर है, जो बाकी नेताओं के घरों से एकदम कंट्रास्ट में नजर आता है। राहुल उसकी सज्जारहित कस्बाई सादगी देख चकित हैं। सीपीआई का एक नेता कहता है- ‘वो हमारा उगता सितारा है’। कन्हैया दोटूक मगर सहजता से बोलते हैं, जो सुनने में भला लगता है। एक और चैनल बेगूसराय में ‘कौन बनेगा प्रधानमंत्री’ टाइप बहस कराता है, लेकिन जल्दी ही सब कुछ तू-तू मैं-मैं में बदल जाता है।
जब तक किसी की रैली होती है तब तक उसकी ‘लहर’ सी नजर आती है। लेकिन ज्यों ही रैली खत्म होती है, तो लहर भी बिला जाती है।
मायावती, अखिलेश, अजित सिंह की सहारनपुर की संयुक्त रैली लगभग सभी चैनलों पर लाइव दिखती है। मायावती पढ़ कर बोलती हैं। उनकी हर ‘पंच लाइनों’ को सामने बैठा जनसमूह जोरदार समर्थन देता है। वे मुसलमानों को गठबंधन को वोट देने जैसी बात कह देती हैं, जो तुरंत ‘आपत्तिजनक’ करार दी जाती है! कुछ एंकर भी इस पर आपत्ति करते हैं।

यूपी का चुनाव एक से एक उत्तेजक सांप्रदायिक मुहावरों से बनाया जा रहा है और इस मामले में कोई भी पक्ष कम नहीं है। जब तक ‘मुसलमान’ को एक पक्ष को वोट देने को कहने वाले हैं या ‘अली’ और ‘बजरंग बली’ कहने वाले हैं, तब तक आप कुछ कर लें, विभाजनकारी भाव ही पनपते रहेंगे!
जबसे चुनाव अभियान शुरू हुआ है तबसे अब तक हर दिन कुछ न कुछ ‘आपत्तिजनक’ कहा ही जाता है। यह सब ऐसे ही चलते रहना है। आप लाख आपत्ति करें, चुनाव आयोग बोलने वाले को सिर्फ ‘चेतावनी’ दे सकता है!
इंडिया टुडे में राजदीप सरदेसाई से बातचीत में चुनाव आयोग के मुखिया खुद स्वीकार करते हैं कि आयोग एक नैतिक वातावरण बनाता है। उसके अधिकार ‘सीमित’ हैं, लेकिन फिर भी उसने एक राजनीतिक फिल्म पर रोक लगा कर जता दिया है कि वह किसी दबाव में काम नहीं करता!
एक चैनल पर ‘मैं भी चौकीदार हूं’ वाले विज्ञापन के नए टुकड़े में एक युद्धविरोधी गीत सुनाई देता है। दो लाइनों के इस गीत में एक करुण-सी लय बजती है। यह ‘मैं भी चौकीदार हूं’ वाली मार्चपास्टी लठ्ठमार धुन से अच्छा लगता है।
इसके मुकाबले, ‘मैं ही तो हिंदुस्तान हूं’ वाला कांग्रेस का विज्ञापन ‘न्याय’ की तुक के चक्कर में अपने आप से ही अन्याय कर बैठता है। यारो! एक ऐसा गाना तो देते, जो जुबान पर चढ़ता!

वृहस्पतिवार को इक्यानवे सीटों के एकदम शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव संपन्न होकर चुके हैं और अपने कई एंकर ‘लहर’ खोजने में लग गए हैं। हर बंदा पूछता फिर रहा है : कितने प्रतिशत वोट पड़े? किसकी लहर रही?
और, शाम के छह बजे ज्यों ही पड़े हुए वोटों के आंकड़े आते हैं, त्यों ही एंकरों और रिपोर्टरों की परेशानी बढ़ जाती है कि ये क्या? जरा-सी भी लहर नहीं? ये कैसा चुनाव है? आश्चर्य कि किसी की लहर नहीं दिखती। पता नहीं अब क्या होगा! जितने प्रतिशत वोट सन चौदह में पड़े। लगभग उतने ही प्रतिशत अब पड़े, तब लहर कहां गई?
चाहे प्रियंका, राहुल, वाड्रा और बच्चे अमेठी में कितना ही रोड शो करें, इन दिनों वह दिलचस्प नहीं दिखता। कांग्रस के घोषणापत्र के मुकाबले आया भाजपा का घोषणापत्र एक दिन की खबर बन कर निकल जाता है।
टाइम्स नाउ अपने एक सर्वे में अचानक एक ‘लहर’ खोज लाता है कि बालाकोट ने एनडीए के पक्ष में लगभग दो फीसद तक झुकाव पैदा किया है। उसे 279 सीट मिल सकती हैं, जबकि यूपीए को 145 मिल सकती है।
लेकिन इक्यानवे सीटों के वोटिंग प्रतिशत कथित ‘लहर’ की सारी हवा निकाल देता है। शाम तक हर एंकर चकित होकर कहने लगता है कि कमाल है! किसी की कोई लहर नहीं दिखती! लेकिन अपने भैया जी को कहां आराम? लहर के अभाव में भी वे अपना ‘स्पेस’ ढूंढ़ ही लेते हैं कि ‘लहर नहीं’ के माने यह कि कोई ‘एंटी लहर’ नहीं है!
यानी ‘उठ उठ री लघु लघु लोल लहर!’

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App