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बाखबर: लटके हुए चेहरे

परिणाम आते रहे। एक ओर लड्डू लुटते रहे, दूसरी ओर चेहरे लटकते रहे! एक चैनल चिंतामग्न हुआ कि कहीं अब भारत हिंदू राष्ट्र न बन जाए! एक पत्रकार बोलीं कि एक दल का ऐसा वर्चस्व चिंताजनक है। एक विशेषज्ञ बोले कि यह ‘हिंदुत्व’ नहीं, ‘मोदीत्व’ की जीत है।

Author May 26, 2019 4:45 AM
नई दिल्ली में गुरुवार शाम बीजेपी मुख्यालय पहुंचने पर विक्ट्री पोज देते हुए नरेंद्र मोदी की फाइल फोटो। (फोटोः पीटीआई)

एक चुनाव प्राचीन विश्लेषक : प्रभु! आप जीत चुके हैं। अब आप उदार-हृदय होइए। झोलेवालों को लतियाना छोड़िए!

– प्रभु : जो बीत गई वो बात गई…
– अब तो जेएनयू-वाले को टुकड़े टुकड़े न कहिए!
– कह दिया न, पास्ट इज पास्ट! जो बीत गई वो बात गई!
परिणाम आने के बाद की एक चर्चा चल रही है। कई चीजों का ऐसा स्वाहा हुआ है कि त्राहि त्राहि का जाप होने लगा।
हारने वाले कई बार हारे। किश्तों में हारे और बार-बार हारे। हार के साथ कई तो अपनी तमीज तक हारे!
हारने वालों को सबसे पहले एक्जिट पोलों ने हराया!
जिसे जीतना था उसे सब एक्जिटों ने जिताया। कोई तीन सौ सीट देता, कोई साढ़े तीन सौ देता, कोई दो सौ पचास देता, तो कोई दो सौ देकर तसल्ली करता। लेकिन हां! दुर्भाग्य कि फिर भी सबकी एक ही राय कि सरकार बनेगी, तो मोदी की ही! मोदी आला रे आला!
मोदी का नाम आते ही फिर से लंबा रोना-बिसूरना जारी हो जाता और उच्चाटन मारण मंत्र पढ़े जाने लगते कि चाहे जो हो, वो न आ जाय!
इसके बाद ‘उत्तर सत्य’ यानी ‘पोस्ट-ट्रुथ’ गढ़े जाने लगे। इस बार मोदी सरकार नहीं बनने जा रही। यूपी में महागठबंधन ‘स्वीप’ कर रहा है, जाति का गणित ऐसा सटीक बैठा है कि भाजपा की हवाइयां उड़ रही हैं।
इसके आगे ‘आल्ट ट्रुथ’ खेला जाने लगा और एक से एक ‘आल्ट पीएम’ टीवी पर पेश किए जाने लगे : ये देखिए, ये रहा पीएम का मटीरियल नंबर वन। इसे तीन बार का सीएम का अनुभव है। और ये रहा ‘जय काली कलकत्ते वाली’ वाला मॉडल, जिसे दो बार सीएम का अनुभव है। और ये भी न जंचें तो ये रहे अपने आंध्र वाले भैया, जो सौ टंक पीएम का फर्स्ट क्लास मटीरियल हैं।

आह! एक्जिट पोल और परिणामोें ने किसी की न सुनी। तीन दिन तक अपने बाईस ‘आल्ट पीएम’ अपनी खबरें बनाते रहे। एक दिन दिल्ली, दूसरे दिन लखनऊ, तीसरे दिन कोलकाता और हर जगह नए नए अंगवस्त्रम् पत्रम्-पुष्पम् यत्रम् तत्रम् चढ़ाते रहे।
एक्जिट पोल कहते कि इनको तीन-चार सीट मिल जाएं तो गनीमत, और जब परिणाम आए तो भैया जी जीरो पर आउट!
हा हंत! यह कैसा अंत कि कल चमन था, आज इक सहरा हुआ, देखते ही देखते ये क्या हुआ…
फिर भी हे पीएम के मटीरियल जी! आपकी जय हो कि भीषणताओं से भरपूर इस चुनाव के बीच भी आपने कुछ बढ़िया कॉमिक सीन दिए!
एक्जिटों ने कह दिया था कि प्लीज अब आप लाइन लगा कर एक्जिट करें, लेकिन विपक्ष को शालीनता से एक्जिट करना नहीं आया! खिसियानी बिल्लियां देर तक खंभे नोंचती रहीं! अंत में अपने ‘एक्जिट’ का ठीकरा विपक्ष ईवीएम के सिर फोड़ने लगा। देखते-देखते बाईस के बाईस दल कहने लगे कि ईवीएम खोटी है, ईवीएम खोटी है। जब दिखते, बाईस दिखते। हाथ मिलाते, हाथ उठाते, हंसते-हंसते फोटो खिंचाते और बात करो तो धाड़ मार कर रोने लगते कि हमें हराया जा रहा है। ईवीएम हमें हराएगी।

चुनाव आयोग के पुराने अधिकारी और तकनीकी विशेषज्ञ कहते रहे कि भैए, ईवीएम में सेंध लगाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है और ये क्या बता हुई कि आप जीतें तो ईवीएम ओके और हारें तो रोने लगें कि उनमें खोट है। वो ‘हैक’ कर ली गई हैं। एक चैनल चर्चक ने कहा भी कि इसे कहते हैं ‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा!’ ऐसा मनमाना ‘पोस्ट ट्रुथ’ चलने वाला नहीं। इसके बाद चुनाव परिणाम थे, जिनको हर चैनल अपने सबसे ‘अच्छा मेरा चुनाव’ कह कह कर दिखाता और बेचता रहा। कुछ एंकरों को छोड़ बाकी चैनलों के एंकरों और रिपोर्टरों के चेहरे परिणामों के साथ-साथ खिलते रहे। हां, एक चैनल अवश्य मुरझाता-सा दिखा। त्राहि-त्राहि का स्वर यहीं से उठा! परिणाम आते रहे। एक ओर लड््डू लुटते रहे, दूसरी ओर चेहरे लटकते रहे! एक चैनल चिंतामग्न हुआ कि कहीं अब भारत हिंदू राष्ट्र न बन जाए! एक पत्रकार बोलीं कि एक दल का ऐसा वर्चस्व चिंताजनक है। एक विशेषज्ञ बोले कि यह ‘हिंदुत्व’ नहीं, ‘मोदीत्व’ की जीत है।
पूछा गया कि ‘मोदीत्व’ माने क्या? तो एक पत्रकार बोलीं कि मोदीत्व माने विकास। मोदीत्व माने मजबूत सरकार। मोदीत्व माने वो क्या कि घर मे घुस कर मारेंगे यानी सुरक्षा की गांरटी…

एक विशेषज्ञ बोले कि यह चुनाव न जात पर है न पांत पर, बल्कि विकास पर और राष्ट्र पर लड़ा गया है, इसलिए जात-पांत की बात छोड़ो! बाकी साफ हुआ भाजपा कार्यालय से सीधे प्रसारित धन्यवाद भाषण में, कि यह चुनाव देश की एक सौ तीस कोटि जनता का चुनाव है… यह चुनाव एक सौ तीस करोड़ देशवासियों को सभी मुसीबतों से मुक्त कर भारत को एक विकसित और समृद्ध भारत बनाने के लिए है… कि इस चुनाव में सेक्युलरिज्म स्वाहा हो गया… कि अब दो ही जातियां बची हैं। एक गरीब, दूसरी वो जो गरीबों की गरीबी दूर करने का काम करे…
चुनाव परिणाम के दिन हर चैनल ‘मोदीमय’ रहा! किसी चैनल के लिए यह चुनाव ‘सुनामी’ था, तो किसी के लिए ‘मोदी स्वीप’ था, तो किसी के लिए ‘मोदीत्व की विजय’ था। यह ‘मोदी युग’ है प्यारे! परिणाम वाले दिन ही एक चैनल में एक नया कोरस बजने लगा : ‘रामराज्य की करो तैयारी! आ रहे हैं भगवाधारी!’ इस ‘भगवा गीत’ के स्पांसर का नाम नजर न आया! कहीं यह किसी नए ‘भगवायुग’ का जयगान तो नहीं!

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