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साहित्य इस बरस

इस वक्त हिंदी में कई पीढ़ियों के रचनाकार सक्रिय हैं। सुखद है कि सभी की संवेदना अलग-अलग तरह से सरोकार के वितान रचती है। इस वर्ष भी वरिष्ठतम पीढ़ी से लेकर बिल्कुल नई पीढ़ी तक के रचनाकारों ने अपनी रचनात्मक ऊर्जा से साहित्य को बहुरंगी आयाम दिए..

Author नई दिल्ली | December 26, 2015 11:55 PM
साहित्य से इतर पत्रकारिता का एक लक्ष्य है।

सरोकारों का साल

इस साल हिंदी की जो साहित्यिक पुस्तकें मैं देख-पढ़ सका, उनमें सबसे उल्लेखनीय संजीव का उपन्यास है- फांस। यह विदर्भ के किसानों की आत्महत्या पर केंद्रित है। संजीव ने किसानों की आत्महत्या, तबाह किसान, कर्ज में दबे किसान की समस्या को बड़ी सूझ-बूझ और मनोयोग से चित्रित किया है। किसानों की आत्महत्या के कारणों को उन्होंने भूमंडलीकरण की अर्थनीति से जोड़ा है। दूसरा उपन्यास निलय उपाध्याय का पहाड़ है, जो बिहार के एक असाधारण व्यक्तित्व दशरथ माझी के असाधारण पराक्रम, लगन और बहुत चकित करने वाले श्रम को चित्रित करने वाला उपन्यास है। दशरथ माझी के इस प्रयत्न और अद्भुत कर्मशीलता की प्रेरणा है उनका अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और गांव वालों की सुविधा-असुविधा का प्रश्न। इसमें एक अकाल का भी मर्मस्पर्शी वर्णन आता है। यह बिहार की राजनीति के सच को भी सामने लाता है। तीसरा उपन्यास रवींद्र वर्मा का घास का पुल है। यह वर्तमान भारतीय समाज में धर्म और राजनीति के संबंधों पर केंद्रित है। धर्म राजनीति में पड़ने पर कब विकृत होता है और कब सांप्रदायिक हो जाता है, इसकी भी चिंता उपन्यास में है। साथ ही धर्म के सकारात्मक पक्षों की भी इस उपन्यास में पड़ताल है। यह धर्मनिरपेक्ष और मानवतावादी दृष्टि से लिखा गया महत्त्वपूर्ण उपन्यास है।

कुछ महत्त्वपूर्ण कविता संग्रह भी इस साल आए। उनमें पंकज चतुर्वेदी का संग्रह रक्तचाप और अन्य कविताएं एक है। इस संग्रह की लंबी कविता- रक्तचाप में वर्तमान भारतीय समाज के व्यापक यथार्थ के विभिन्न रूपों का चित्रण है। इन कविताओं में एक गहरी राजनीतिक चिंता है। इसके अलावा मदन कश्यप के संग्रह अपना ही देश में मूलगामी दृष्टि से रची गई कविताएं हैं। मूलगामी दृष्टि यानी जो समाज के बुनियादी स्वरूप को सामने लाती है। संग्रह की अनेक कविताएं समाज में स्त्रियों की विभिन्न दारुण दशाओं पर केंद्रित हैं। इसमें निठारी कांड पर तीन कविताएं संकलित हैं। शैलेय का संग्रह भी उल्लेखनीय है- जो मेरी जात में शामिल है। शैलेय सहज, सरल और सुखद कविताएं लिखते हैं। उनकी ये कविताएं पाठक को आकर्षित और आमंत्रित करती हैं।

दलित चेतना संपन्न कवियों में हेमलता महिश्वर का संग्रह नील, नीले रंग के उल्लेखनीय है। इसमें विषमता और भेदभाव भरे भारतीय समाज में दलितों के साथ होने वाले अत्याचार के प्रतिरोध और प्रतिकार की चेतना वाली कविताएं हैं। इसमें आदिवासियों की अस्मिता पर संकट और सामाजिक समता का उद्घोष करने वाली कविताएं भी हैं। इसके अलावा रजत रानी मीनू के संग्रह पिता भी तो होते हैं मां में स्त्री-पुरुष भेद और जाति भेद के विरुद्ध तल्ख आवाज बुलंद स्वर में मौजूद है। इस संग्रह की शीर्षक कविता में आत्मकथात्मक शैली अपनाई गई है। इसमें संवेदना का घनत्व है और विचारों की विभिन्नता भी।

इस वर्ष आलोचना पुस्तकों में धनंजय वर्मा की आधुनिक कवि विमर्श प्रमुख है। इसमें आधुनिकता, आधुनिकीकरण, समकालीनता और परंपरा आदि धारणाओं पर विचार किया गया है। इसके अलावा इस साल बजरंग बिहारी तिवारी की दलित साहित्य पर तीन पुस्तकें आर्इं- जाति और जनतंत्र, दलित साहित्य: एक अंतर्यात्रा और भारतीय दलित साहित्य: आंदोलन और चिंतन। गैर-दलित हिंदी लेखकों में बजरंग बिहारी की आलोचनादृष्टि व्यवस्थित, वस्तुनिष्ठ और व्यापक है। वे न सिर्फ हिंदी के दलित साहित्य, बल्कि दूसरी भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे दलित साहित्य पर भी नजर रखते हैं। इसके अलावा आशुतोष पार्थेश्वर ने प्रेमचंद के सोजेवतन पर एक किताब लिखी है, जो शोधपरक आलोचना है। सोजेवतन के प्रकाशन और जब्ती आदि को लेकर दिलचस्पी रखने वाले लोगों को यह पुस्तक पसंद आएगी।

कथेतर गद्य में सुधीर विद्यार्थी की दो किताबें इस साल महत्त्वपूर्ण रहीं- फतेहगढ़ डायरी और बरेली: एक कोलाज। फतेहगढ़ डायरी में उन्होंने एक शहर के साथ-साथ उसके परिवेश के इतिहास पर भी उन्होंने बारीक नजर डाली है। इसमें 1857 के विस्मृत नायक तफज्जुल हुसेन खां के साथ योगेश चंद्र चटर्जी और मणींद्रनाथ बनर्जी की भी विस्तार से चर्चा की है। इसमें हिंदी क्षेत्र के बड़े कवि अछूतानंद, महादेवी वर्मा और गुलाम रब्बानी ताबां का भी जिक्र है। इसी तरह बरेली: एक कोलाज में उस शहर के इतिहास के साथ-साथ राधेश्याम कथावाचक, इस्मत चुगताई, निरंकारदेव सेवक, हरिवंशराय बच्चन और कुछ शायरों की चर्चा है, जो बरेली से जुड़े हैं।

इस साल कुछ महत्त्वपूर्ण ग्रंथावलियां और संचयन भी आए, जिनमें देवशंकर नवीन द्वारा संपादित राजकमल चौधरी रचनावली, राजेश जोशी के संपादन में मुक्तिबोध संचयन और लीलाधर मंडलोई के संपादन में केदारनाथ सिंह संचयन प्रमुख हैं। (मैनेजर पांडेय)
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सामाजिक जुड़ाव की रचनाशीलता

साहित्य की दुनिया में गुजरते वर्ष को अगर लेखक की सामाजिक भूमिका के स्वीकार का वर्ष कहा जाए तो उचित होगा। सामाजिक सरोकार की दृष्टि से संजीव का उपन्यास फांस इस वर्ष सर्वाधिक ध्यान आकृष्ट करने वाला इसलिए है कि यह विदर्भ के किसानों की आत्महत्या के बहाने भारत के किसानों की त्रासदी पर केंद्रित हिंदी में पहला उपन्यास है। किसान त्रासदी की समाजशास्त्रीय पड़ताल के साथ कथा-रस को बरकरार रखना इस तरह के लेखन की सबसे बड़ी चुनौती है।  युवा लेखक सत्यनारायण पटेल के उपन्यास गांव भीतर गांव में आज के बदलते गांव को जनतंत्र की विकलांगता और विकास के विनाशकारी मॉडल के परिप्रेक्ष्य में कथात्मक बनाया गया है। इस दौर के अधिकतर उपन्यास सामाजिक सरोकारों से युक्त हैं।

अलका सरावगी इस वर्ष प्रकाशित अपने नए उपन्यास जानकीदास तेजपाल मैनशन में अपने पूर्व के उपन्यासों की ही तर्ज पर अपने वर्ग की पक्षधर रचनाकार की भूमिका में खड़ी दिखती हैं। उपन्यास का मुख्यपात्र जयगोविंद-जयदीप उत्पीड़क और उत्पीड़ित दोनों भूमिकाओं में एक साथ उपस्थित है। रवींद्र वर्मा का उपन्यास घास का पुल भी सांप्रदायिकता, उपभोक्तावाद और मध्यवर्ग के रसायन में रचा-पगा अपनी सुपरिचित जमीन पर कदमताल करता उपन्यास बन पाया है। एक अर्थ में यह पश्चगामी इसलिए है कि यह धर्म के विखंडन के बजाय उसकी ‘सनातनता’ और ‘सकारात्मकता’ में ही मुक्ति की तलाश करता दीखता है।

जरूरी नहीं कि बड़े फलक की रचना ही आज के हिंसक समय की निशानदेही करती हो। इसका शिद्दत से अहसास इस वर्ष प्रकाशित दूधनाथ सिंह के कहानी संग्रह जलमुर्गियों का शिकार की कहानी कालीचरण कहां है पढ़ कर हुआ। गहरी अर्थवत्ता से युक्त यह कहानी मितकथन का उत्कृष्ट उदाहरण है।

इस वर्ष प्रकाशित गीताश्री की कोन्हारा घाट और किरण सिंह की द्रोपदी पीक कहानियां स्त्री विमर्श के दो छोर प्रस्तुत करती हैं। पहली जहां देशज स्वाभाविकता के लिए, तो दूसरी अपनी रचनात्मक गढ़ंत के लिए याद रह जाती हैं। हाल ही में प्रकाशित केदार प्रसाद मीणा की कहानी सामंतों के शहर की राजकुमारी आदिवासी सरोकारों के विकृतीकरण का अंतरंग वृत्तांत होने के चलते उल्लेखनीय है।

यह स्वागत योग्य है कि दलित विमर्श पर केंद्रित बजरंग बिहारी तिवारी की तीन पुस्तकें- दलित साहित्य: एक अंतर्यात्रा, भारतीय दलित साहित्य: आंदोलन और चिंतन तथा जाति और जनतंत्र का प्रकाशन इस वर्ष एक साथ हुआ है। इनके प्रकाशन से यह मिथक टूटेगा कि दलित विमर्श दलितों तक सीमित दलितों का विमर्श है। भीष्म साहनी शताब्दी वर्ष में भीष्म साहनी के साहित्यिक सरोकार शीर्षक राम विनय शर्मा की आलोचनात्मक पुस्तक लेख-संग्रह होने के बावजूद प्रासंगिक बन पड़ी है। स्वाधीनता आंदोलन पर केंद्रित कामतानाथ का चार खंडों का उपन्यास कालकथा अपने मुक्कम्मल स्वरूप में इस वर्ष प्रकाशित होकर हमारे सामने है। (वीरेंद्र यादव)
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कविता की धमक

लगातार अपने काम में लगा रहा, इसलिए हिंदी की किताबें इस साल नहीं पढ़ पाया। मगर कुछेक किताबें जो मैं पढ़ पाया, उनमें पवन वर्मा की गालिब पर लिखी किताब सबसे महत्त्वपूर्ण है। पवन वर्मा ने काफी लगन और मेहनत से यह किताब लिखी है। गालिब पर किताबें तो बहुत लिखी गई हैं, पर पवन वर्मा की यह किताब एक तरह से मुकम्मल है।

इस वर्ष पत्रिकाओं पर ज्यादा मेरी नजर पड़ी। उनमें इस साल कुछ पत्रिकाओं के विशेष अंक अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। उनसे इस समय की रचनात्मक सक्रियता का पता चलता है। पत्रिकाओं में सबसे अधिक उल्लेखनीय रहा आग्नेय के संपादन में निकलने वाली पत्रिका सदानीरा का ताजा अंक। यह मुख्य रूप से कविता की पत्रिका है और इसमें हिंदी की मौलिक रचनाओं के अलावा दूसरी भाषाओं की अनूदित कविताएं भी प्रकाशित होती हैं। इस बार के अंक में हेमंत शेष की करीब पंद्रह कविताएं प्रकाशित हैं, जो राजस्थान के विभिन्न शहरों और ऐतिहासिक स्थलों पर केंद्रित हैं। उनमें जैसलमेर, रणथंभौर, केवलादेव, और यमुना नदी आदि को लेकर बहुत सुंदर कविताएं हैं। यमुना में खाली नावें कविता का नया सौंदर्य रचती है।

इसी तरह प्रयाग शुक्ल के संपादन में निकलने वाली पत्रिका संगना का सितारा देवी पर निकला विशेषांक महत्त्वपूर्ण है। उसमें अपने भाई उदयशंकर पर सितारवादक रविशंकर का संस्मरणात्मक आलेख बहुत महत्त्वपूर्ण है। वह केवल संस्मरण नहीं, बल्कि उदयशंकर को समझने की नई दृष्टि देता है। साखी का नया अंक भी संग्रहणीय है। उसमें भूमंडलीकरण पर रवींद्र श्रीवास्तव का लेख निस्संदेह बहुत उल्लेखनीय है। नामवर सिंह के तीन वक्तव्य भी इसमें परिशिष्ट में दिए गए हैं, जो नामवरजी को एक नए ढंग से पढ़ने का पता देते हैं।

इस वर्ष की पत्रिकाओं में अकार का अशफाक उल्लाह खां पर केंद्रित अंक भी महत्त्वपूर्ण है। इसके अलावा अक्षरपर्व का भीष्म साहनी पर केंद्रित अंक सराहनीय है। वागर्थ और लहक के भी कुछ अंक बहुत अच्छे थे। लहक का दिवाली विशेषांक उल्लेखनीय है। इन पत्रिकाओं को पढ़ते हुए यही लगा कि इस समय कहानियों की अपेक्षा कविता ज्यादा अच्छी लिखी जा रही है। (दूधनाथ सिंह)
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खुला-खिलापन

साहित्य के वर्तमान दौर को, मेरे खयाल से, कई तरह के पूर्वग्रहों से मुक्ति के साथ ही, रचनात्मक विविधता, खुलेपन और उदार मानव मूल्यों के समवाय के रूप में देखा जा सकता है। यह विविधता इस वर्ष के साहित्यिक परिदृश्य में भी नजर आती है। इस वर्ष आर्इं साहित्यिक कृतियां भले बहुत अधिक चर्चा में रह कर पाठकों का ध्यान आकर्षित करने में सफल न हो सकी हों, पर उनमें अपने-अपने ढंग से बात कहने की संवाद-विकलता और एक अनछुई निजता के साथ पाठकों के दिल पर छाप छोड़ने की बहुविध कोशिशें जरूर नजर आती हैं।

इस वर्ष छपी कृतियों में संजीव का उपन्यास फांस महत्त्वपूर्ण है। यह विदर्भ में आत्महत्या कर रहे किसानों की विकल जीवन स्थितियों को लेकर लिखा गया बहुत ईमानदार, सच्चा और प्रामाणिक दस्तावेज है। यह बेशक बड़ी संवेदनशीलता से लिखी गई एक बेधक कृति है। इसी तरह वरिष्ठ साहित्यकार रामदरश मिश्र के ताजा कविता संग्रह मैं तो यहां हूं में उनके जीवन अनुभवों का सहज ताप ही रचनात्मकता में ढल गया लगता है।

कहानी आज भी साहित्य की सर्वाधिक पठनीय विधा है और हिंदी के जाने-माने कहानीकारों के साथ-साथ युवा कथाकारों की कहानियों की भी कई कथा-शृंखलाएं चर्चा में रही हैं। पर इस वर्ष सामने आर्इं सुधा अरोड़ा की बुत जब बोलते हैं, प्रियदर्शन की बारिश धुआं और दोस्त, कुमार अंबुज की इच्छाएं तथा विवेक मिश्र की ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूं कहानी के भिन्न आस्वाद के कारण याद रह जाने वाली पुस्तकें हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ का पुनर्प्रकाशन, जिसकी भूमिका मैनेजर पांडेय ने लिखी है, वर्ष की एक बड़ी और ऐतिहासिक महत्त्व की घटना है। साने गुरुजी की कालजयी कृति ‘श्यामची आई’ का संध्या पेडणेकर द्वारा संजीदगी से किया गया अनुवाद श्याम की मां भी अविस्मरणीय है।

इसी तरह देवेंद्र कुमार के समूचे उपन्यासों का संचयन सात बाल उपन्यास बाल साहित्य की एक बेहद महत्त्वपूर्ण पुस्तक है। लंबे अरसे से बच्चों के लिए लिखते आए बालकृष्ण गर्ग के समूचे बालगीतों का संचयन, लक्ष्मी खन्ना ‘सुमन’ का दिलचस्प बाल उपन्यास छुटके-मुटके जंगल में बाल साहित्य की बार-बार पढ़ी जाने वाली कृतियां हैं। प्रभात की रफ्तार खान का स्कूटर और सुशील शुक्ल की बोलो एक सांस में शिशुओं के लिए लिखी गई बड़ी अद्भुत, खिलंदड़ी पुस्तकें हैं।

इस वर्ष हिंदुस्तानी पत्रिका, शीराजा और आजकल समेत कई पत्रिकाओं के सुंदर बाल साहित्य विशेषांक आए। यह शुभ लक्षण है। एक अच्छा प्रस्थान-बिंदु भी। हिंदी में बड़ों के साहित्य और बाल साहित्य के बीच खामखा खींच दी गई पार्थक्य की रेखाएं अगर हट सकीं तो यह बड़ों के साहित्य और बाल साहित्य दोनों के लिए शुभ होगा। (प्रकाश मनु)
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आलोचना के रंग

इस वर्ष साहित्यिक विधाओं में तो लेखन-प्रकाशन खूब हुआ, पर ज्ञान-विज्ञान के दूसरे अनुशासनों में महत्त्वपूर्ण या उल्लेखनीय किताबें नहीं आर्इं। अनुवाद के रूप में ही कुछ किताबें देखने को मिलीं। दूसरी बात कि आलोचना के नाम पर ढेरों किताबों का प्रकाशन हुआ। उनमें भर्ती की आलोचना पुस्तकों की भरमार है। तीसरी बात यह कि हिंदी में कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना ही ऐसी विधाएं हैं, जिनमें प्रचुर लेखन हुआ। इनसे इतर नाटक, यात्रा संस्मरण, रेखाचित्र, जीवनी, आत्मकथा आदि में मात्रात्मक स्थिति उत्साहवर्धक नहीं है। ध्वनियों के आलोक में स्त्री (मृणाल पाण्डेय) संगीत और स्त्री के रिश्ते को आत्मीय ढंग से देखने का एक नया प्रयास है, जिसकी ओर हिंदी समाज का ध्यान जाना चाहिए।

काव्य संग्रहों में जिद (राजेश जोशी), टोकरी में दिगंत (अनामिका), खुद पर निगरानी का वक्त (चंद्रकांत देवताले), आशा बलवती है राजन (नंद चतुर्वेदी), आकाश भटका हुआ (नंदकिशोर आचार्य), वर्तमान की धूल (गोविंद प्रसाद), मां गांव में है (दिविक रमेश), प्रेम गिलहरी दिल अखरोट (बाबुशा कोहली), चूंकि सवाल कभी खत्म नहीं होते (उमाशंकर चौधरी), सुख एक बासी चीज है (सदानंद शाही), अपना ही देश (मदन कश्यप), पिता भी तो होते हैं मां (रजत रानी मीनू) उल्लेखनीय हैं। कविता के क्षेत्र में इस वर्ष की सबसे उल्लेखनीय पुस्तक वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण की कुमारजीव है। यह पुस्तक अलग से ध्यान खींचती और बार-बार आमंत्रण देती है।

जिन उपन्यासों ने पाठकों के बीच सहज भाव से अपनी जगह बनाई, उनमें फांस (संजीव), जानकीदास तेजपाल मेंशन (अलका सरावगी), पहाड़ (निलय उपाध्याय), कोठागोई (प्रभात रंजन), अन्हियारे तलछट में चमका (अल्पना मिश्र), ढाक के तीन पात (मलय जैन) का नाम लिया जा सकता है। कहानी संग्रहों में हलंत (हृषिकेश सुलभ), बारिश धुआं और दोस्त (प्रियदर्शन), चांद के पार एक चाभी (अवधेश प्रीत) आदि सहज स्मरणीय हैं।

आत्मकथा के क्षेत्र में मेरे जानते दो पुस्तकें उल्लेखनीय हैं- निर्मला जैन की जमाने में हम और दूसरी है विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अस्ति और भवति। इनकी किताबों में ऐसा बहुत कुछ है, जो आत्मकथा विधा को समृद्ध करता है।

इस साल जो विधा सबसे अधिक सक्रिय लगी वह आलोचना है। आलोचना के क्षेत्र में नए आलोचकों की कई ऐसी पुस्तकें दिखीं, जो पुराने आलोचनात्मक प्रतिमानों से भिन्न मन-मिजाज का संकेत देती हैं। इनमें आलोचना और सृजनशीलता (कृष्णदत्त शर्मा), मदन वात्स्यायन: शब्द और संवाद (सं.- रश्मिरेखा), कविता का परिसर: एक अंतर्यात्रा (रामेश्वर राय), छायावाद और मुकुटधर पाण्डेय (रामनारायण पटेल), उत्तर आधुनिकता और समकालीन हिंदी आलोचना (बली सिंह), हिंदी आलोचना में कैनन निर्माण की प्रक्रिया (मृत्युंजय), जीने का उदात्त आशय (पंकज चतुर्वेदी), नामवर: संदर्भ और विमर्श (पीएन सिंह), हिंदी उपन्यास का स्त्री पाठ (रोहिणी अग्रवाल), सन्नाटे का छंद (आनंद कुमार सिंह), भारतीय दलित साहित्य: आंदोलन और चिंतन (बजरंग बिहारी तिवारी), तुलसी और गांधी (श्रीभगवान सिंह) पिछली पीढ़ी के आलोचनात्मक निकष से भिन्न नए निकष की खोज में तत्पर हैं। (गोपेश्वर सिंह)
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मिलाजुला परिदृश्य

साहित्य के लिए यह वर्ष मिलाजुला रहा। हालांकि वैचारिक पुस्तकों के लिए अनुवाद पर निर्भरता बनी रही। नरेंद्र दाभोलकर की अंधविश्वास उन्मूलन शृंखला की तीन पुस्तकें मराठी से अनूदित होकर आर्इं। ये इस वर्ष की सबसे उल्लेखनीय और उपयोगी किताबें हैं। विचार का आलम यह है कि हिंदी आलोचना तक में नवाचार का अभाव दिखाई देता है। फिर भी इस वर्ष तीन ऐसी पुस्तकें आर्इं, जो नई अवधारणाओं को सामने लाने में समर्थ हुई दिखती हैं। मैनेजर पांडेय की पुस्तक साहित्य और दलित दृष्टि, नित्यानंद तिवारी की मध्यकालीन साहित्य पुनरवलोकन और आख्यानशास्त्र। ये तीनों आलोचना के सिद्धांत पक्ष को समृद्ध करने वाली पुस्तकें हैं।

कथेतर गद्य चर्चा में रहा और इस साल भी कई उल्लेखनीय पुस्तकें आर्इं। विश्वनाथ त्रिपाठी की संस्मरण पुस्तक गुरुजी की खेती-बारी श्रेष्ठ गद्य का उदाहरण है, जिससे हमारी भाषा की ताकत का पता चलता है। लीलाधर मंडलोई की डायरी दिनन-दिनन के फेर की भाषा बेहद कलात्मक है, तो प्रभात रंजन की कोठागोई में कथा-रस के साथ-साथ सबाल्टर्न इतिहास की कच्ची सामग्री भी है। निदा नवाज की डायरी सिसकियां लेता स्वर्ग में आज के कश्मीर का भयावह यथार्थ है।

शोधपरक और सरोकारी लेखन की दृष्टि से अनंत विजय की बॉलीवुड सेल्फी और कवि, मनोचिकित्सक विनय कुमार की एक मनोचिकित्सक की डायरी विशेष उल्लेखनीय हैं। जमाने में हम (निर्मला जैन) और आपहुदरी (रमणिका गुप्ता) उल्लेखनीय आत्मकथाएं हैं।

कहानियों में दूधनाथ सिंह का जलमुर्गियों का शिकार इस वर्ष का श्रेष्ठ संग्रह है। नए यथार्थ को पकड़ने की उनकी क्षमता चकित करती है। अपनी भाषा और बनक के कारण ही स्वयं प्रकाश के छोटू उस्ताद की छोटी और संस्मरणात्मक कहानियां प्रभावित करती हैं, जबकि युवा कवि-कथाकार संजय कुंदन के श्यामलाल का अकेलापन की कहानियां यथार्थ की प्रस्तुति के अपने अनोखे अंदाज के कारण आकर्षित करती हैं। संजीव का फांस और निलय उपाध्याय का उपन्यास पहाड़ निस्संदेह महत्त्वपूर्ण हैं। अलका सरावगी के जानकीदास तेजपाल मेंशन में पुरानी शिकायत बनी रही कि वे पूंजीवादी क्रूरता को छिपा लेती हैं।

कविता संग्रहों में वरिष्ठतम पीढ़ी के कुंवर नारायण, चंद्रकांत देवताले और मलय के संकलनों से लेकर युवा पीढ़ी के उमाशंकर चौधरी और पिछले वर्ष असमय दिवंगत हुए युवा रविशंकर उपाध्याय के संग्रह तक शामिल हैं। अनामिका का टोकरी में दिगंत ने नए विमर्शों के प्रसंग में बुद्धकालीन थेरीगाथाओं के पुनर्सृजन के कारण विशेष रूप से प्रभावित किया। स्त्रियों और युवाओं ने इस वर्ष भी बाजी मारी। इस वर्ष की एक खास उपलब्धि है रमणिका गुप्ता द्वारा संपादित कविता संग्रह कलम को तीर होने दो, जिसमें झारखंड के सत्रह आदिवासी कवियों की हिंदी में लिखी कविताएं संकलित हैं। इनके अलावा महत्त्वपूर्ण कवि राजेश जोशी का संग्रह जिद भी अभी-अभी आया है। (मदन कश्यप)
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वैचारिक विस्तार

यह हिंदी लेखक की सामाजिक भूमिका को परिभाषित करने का वर्ष है। इस पूरे माहौल में हिंदी वैचारिक रूप से समृद्ध हुई है। एडवर्ड सईद और एरिक जे हाब्सबाम के चुनिंदा निबंधों का रामकीर्ति शुक्ल का अनुवाद क्रमश: वर्चस्व और प्रतिरोध तथा इतिहास, राजनीति और संस्कृति और नरेंद्र दाभोलकर की अंधविश्वास उन्मूलन का हिंदी में प्रकाशन हुआ। इन किताबों से हिंदी के वैचारिक आकाश को विस्तार मिला। वैचारिकता के विस्तार का प्रमाण स्त्री लेखन में खासकर दिखा। अलका सरावगी जानकीदास तेजपाल मेंशन जैसे छोटे उपन्यास में स्वप्न, कल्पना और यथार्थ के मेल से ढहती हुई सभ्यता, ढहते हुए युग और ढहते हुए मूल्यबोध की कहानी रच देती हैं। मनीषा कुलश्रेष्ठ, वंदना राग, अल्पना मिश्र और गीताश्री जैसी लेखिकाओं की पीढ़ी एक साथ सक्रिय है और अपने लेखन से स्त्री को ‘स्त्रीवाद’ के दायरे से मुक्त कर रही है।

वंदना राग की हिजरत से पहले और ख्यालनामा, अल्पना मिश्र की अन्हियारे तलछट में चमका और गीताश्री की स्वप्न साजिश और स्त्री की भाषा और जीवन के सहज अनगढ़ प्रसंगों में से कथा अन्वेषित करने की क्षमता स्त्री लेखन को व्यापकता और गहराई प्रदान करती है। चूंकि सवाल कभी खत्म नहीं होते (उमाशंकर चौधरी) तथा प्रेम गिलहरी दिल अखरोट (बाबुशा कोहली) किताबें मृत्यु के समय में प्रेम की सांस की तरह जान पड़ती हैं। राजेश जोशी के संपादन में मुक्तिबोध संचयन और लीलाधार मंडलोई के संपादन में केदारनाथ सिंह संचयन का प्रकाशन अत्यंत शुभ है। आनंद कुमार सिंह का सौंदर्य जल में नर्मदा नदी सूक्त ही नहीं, पृथ्वी सूक्त भी रचती है और एक गहरी पर्यावरण चिंता का साक्षात्कार कराती है। वरिष्ठ कवि राजकुमार कुंभज की उजाला नहीं है उतना और मदन कश्यप की अपना ही देश की कविताएं प्रवंचक समय को उद्घाटित करती हैं।

इधर कुछ युवा शोधकर्ताओं ने हिंदी की बिखरी संपदा को आविष्कृत किया है। समीर कुमार पाठक द्वारा बालकृष्ण भट्ट समग्र तथा सुजीत कुमार सिंह द्वारा राष्ट्रवाद युगीन दलित समाज की कहानियों अछूत की प्रस्तुति युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी का एहसास कराती है। यह संवादधर्मिता हिंदी आलोचना के लिए स्वास्थकर है।

युवा आलोचक कृष्णमोहन की आईनाखाना अपनी पाठ संलग्नता से हिंदी आलोचना को भरोसेमंद बनाती है, तो वरिष्ठ चिंतक आलोचक पीएन सिंह की किताब नामवर: संदर्भ और विमर्श हिंदी में किंवदंती पुरुष बन चुके नामवर सिंह को किंवदंतियों से बाहर ले जाकर सामान्य व्यक्ति की तरह उन्हें समझने की सार्थक दृष्टि देती है। इसी तरह सत्यप्रकाश सिंह की एक शिक्षक की संघर्ष यात्रा आजादी के बाद विकसित शिक्षा तंत्र की पतनगाथा का जीवंत आख्यान रचती है। (सदानंद शाही)
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समय की चिंताओं की परवाह

यह वर्ष साहित्य के लिए मिला जुला रहा। पर रचनात्मकता के स्तर पर कई रचनाकारों ने विषय, शिल्प और प्रविधि के नए रूप की रचनाएं दीं। उपन्यासों में निलय उपाध्याय का पहाड़ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह दशरथ मांझी के जीवट और संघर्ष का ऐसा आख्यान है, जो समय के प्रतिरोध की नई इबारत लिखता है। संजीव का फांस महत्त्वपूर्ण उपन्यास है, जिसमें किसानों की आत्महत्या को देश की एक बड़ी त्रासदी के रूप में देखा गया है। इस शृंखला में पुरुषोत्तम अग्रवाल का नकोहस भी नए ढंग का उपन्यास है, जो आज के विरूपित समय को प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। रवींद्र वर्मा का घास का पुल भी उल्लेखनीय उपन्यास है।

कहानियों में वंदना राग का संग्रह हिजरत से पहले, विवेक मिश्र का ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूं, गीताश्री का स्वप्न, साजिश और स्त्री और नरेंद्र नागदेव का कला वीथिका कथाकार उल्लेखनीय संग्रह हैं। इसके अलावा इंदिरा दांगी का संग्रह शुक्रिया इमरान साहब प्रभावित करता है। प्रत्यक्षा के संग्रह एक दिन मराकेश की कहानियां प्रतीकों के माध्यम से रोमांचित करने वाला प्रभाव छोड़ती हैं।

कविता की तरफ रुख करें तो सबसे पहले दीर्घयामा पर नजर जाती है। यह वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी की लंबी कविताओं का चयन है, जो कविता में आनुभूतिकता और मार्मिकता का विरल उदाहरण है। इसके अलावा वरिष्ठ कवि अनंत मिश्र का संग्रह हमारे समय में काव्य-मर्म को जीवन-मर्म में विन्यस्त करने का महत्त्वपूर्ण प्रयत्न करता है। मिथिलेश श्रीवास्तव का संग्रह पुतले पर गुस्सा अपनी सर्जनात्मक और प्राविधिक कुशलता में उल्लेखनीय है। युवा कवि पंकज चतुर्वेदी के संग्रह रक्तचाप और अन्य कविताएं में नए मिजाज की कविताएं हैं, जो उनके पिछले संग्रहों से भिन्न हैं। इसके अलावा मदन कश्यप के संग्रह अपना ही देश में अपने समय के यथार्थ को विमर्श में लाकर समकालीन जीवन की विडंबनाओं को उजागर करती कविताएं हैं।
अन्य विधाओं में सूर्यबाला का संस्मरण अलविदा अन्ना और रमणिका गुप्ता की आत्मकथा आपहुदरी विशेष उल्लेखनीय हैं।

आलोचना का पक्ष दयनीय दशा में है, जिसमें कुछ पुस्तकें ही ध्यान खींच पाती हैं। इनमें जयदेव तनेजा की पुस्तक रंगसाक्षी, रणजीत साहा की रवींद्र मनीषा और आलोक कुमार सिंह द्वारा संपादित पुस्तक स्त्री मुक्ति के प्रश्न और समकालीन विमर्श विशेष उलेखनीय हैं। इसके अलावा विनोद शाही की समय के बीज और निरंजन देव शर्मा की कृष्णा सोबती के रचनात्मक अवदान पर केंद्रित शब्द परस्पर महत्त्वपूर्ण किताबें हैं।

अंत में कहा जा सकता है कि हिंदी का समकालीन लेखन अपने समय की चिंताओं की परवाह करता है और हिंदी भाषा और समाज के प्रति जिम्मेदार है। (ज्योतिष जोशी)
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औसत का अतिरेक

जहां छपाई की आसानियों और सोशल मीडिया- वेब, ब्लॉग और फेसबुक आदि ने रचनाओं का प्रकाशन आसान कर दिया है, वहीं लिखने-पढ़ने वालों की दुनिया में औसतपन का बोलबाला बढ़ा है। इस साल भी साहित्य की मुख्यधारा के लेखन का परिमाण अधिक प्रबल दिखता है, डायरी, आत्मकथा, रिपोर्ताज, संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाएं उपेक्षित और सूखाग्रस्त-सी लगती हैं।

कविता के क्षेत्र में इस बार भी मोर्चा वरिष्ठ कवियों के हाथ रहा है। मरणोपरांत आए नंद चतुर्वेदी के संग्रह आशा बलवती है राजन के साथ चंद्रकांत देवताले का खुद पर निगरानी का वक्त और राजेश जोशी का जिद महत्त्वपूर्ण संग्रहों में हैं। कुंवर नारायण का काव्य कुमारजीव भी चुनिंदा संग्रह है। वरिष्ठ कवि रामदरश मिश्र का नवीनतम संग्रह मैं तो यहां हूं उनके उत्तरजीवन की सक्रियता का साक्ष्य है। बाबुशा कोहली का संग्रह प्रेम गिलहरी दिल अखरोट युवा कवियों में सर्वाधिक चर्चित रहा है। शैलजा पाठक का एक देह हूं फिर देहरी भी उल्लेखनीय संग्रहों में है।

उपन्यासों में संजीव का उपन्यास फांस महत्त्वपूर्ण है। इसमें किसानों की आत्महत्या को मार्मिकता से उकेरा गया है। पहाड़ों को काट कर रास्ता बनाने के लिए पूरी जिंदगी समर्पित कर देने वाले दशरथ माझी पर निलय उपाध्याय के उपन्यास पहाड़ ने उपन्यासों में नायकत्व की परिभाषा ही बदल दी है। विवेक मिश्र के उपन्यास डॉमनिक की वापसी से भी बड़ी आशाएं हैं।
आत्मकथाओं की यों तो कई पुस्तकें आई हैं, पर अधिकांश का प्रभामंडल निष्प्रभ है। डायरी में लीलाधर मंडलोई की दिनन दिनन के फेर की काव्यात्मकता संवेदना से जोड़ती है, तो कश्मीरी लेखक निदा नवाज की डायरी सिसकियां लेता स्वर्ग संगीनों के साए में शब्दों की हिफाजत है।

कहानी में हृषीकेश सुलभ के संग्रह हलंत, इंदिरा दांगी के शुक्रिया इमरान साहब, वंदना राग के हिजरत से पहले, गीताश्री के स्वप्न साजिश और स्त्री और प्रियदर्शन के बारिश धुआं और दोस्त को रेखांकित किया जा सकता है। कोश या चयन के नाम पर काम तो बहुत हो रहे हैं, पर जिस तरह रमेश कुंतल मेघ ने बरसों की मेहनत से विश्वमिथकसरित्सागर तैयार किया है, वह प्रशंसनीय है।

आलोचना और निबंध का पलड़ा भी इस बार कुछ हल्का रहा है। तथापि राजकुमार का हिंदी की साहित्यिक संस्कृति और भारतीय आधुनिकता, मीरां और उनके समय को लेकर माधव हाड़ा का पचरंग चोला पहर सखी री, रोहिणी अग्रवाल का हिंदी उपन्यास: समय से संवाद, अशोक त्रिपाठी का केदारनाथ अग्रवाल: लड़े द्वंद्व से कविता बन कर और लीलाधर जगूड़ी का रचना प्रक्रिया से जूझते हुए को प्रभावी आलोचनात्मक कृतियों में गिना जा सकता है।  (ओम निश्चल)
(संपूर्ण प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह)

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