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साहित्य और राजसत्ता

भारतीय मानस धर्मप्राण है, इसलिए भारतीय साहित्य अपने स्वभाव में अध्यात्मवादी, रहस्यवादी है; यह धारणा औपनिवेशिक दौर में बनी।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

भारतीय मानस धर्मप्राण है, इसलिए भारतीय साहित्य अपने स्वभाव में अध्यात्मवादी, रहस्यवादी है; यह धारणा औपनिवेशिक दौर में बनी। राजनीति में साहित्य की दिलचस्पी आधुनिक काल में शुरू होती है; इस बेबुनियाद मान्यता का जन्म भी अंगरेजी शासन के दौरान हुआ। वास्तविकता यह है कि भारतीय साहित्यकारों ने प्राचीनकाल से ही राजसत्ता में गहरी रुचि ली और और उसे अपनी सर्जना का विषय बनाया। ‘मुद्राराक्षस’ जैसा शुद्ध राजनीतिक नाटक साहित्य में मजबूत राजनीतिक विचार-परंपरा के बगैर नहीं लिखा जा सकता था। विशाखदत्त रचित पांचवीं शताब्दी के इस नाटक में न कोई योद्धा नायक है और न ही शृंगार भाव पैदा करने वाली नायिका। है तो गंभीर राजनय। जिन आलोचकों को लगता है कि साहित्य विवेचन में राजनीति, अर्थनीति आदि मुद्दों को लाकर साहित्य की स्वायत्तता बिगाड़ दी जाती है और उसे अन्य ज्ञानानुशासनों का उपनिवेश बना दिया जाता है उन्हें नवीं शताब्दी के राजशेखर को पढ़ना चाहिए। ‘काव्यमीमांसा’ में राजशेखर ने लिखा है कि परंपरागत चार मुख्य विद्याएं हैं- त्रयी, वार्ता, आन्वीक्षकी और दंडनीति। इन्हें क्रमश: धार्मिक वांग्मय, कृषि, वाणिज्य, तर्कशास्त्र और राजनीति कह सकते हैं। साहित्य पांचवीं विद्या है और वह शेष सभी विद्याओं का ‘निस्यंद’- टिकने का स्थान है।

प्राचीनकाल से कवियों का एक ठिकाना राजसभा भी रही है। राजसभा में जाने का अर्थ यह नहीं था कि कवि राजा का चरित लिखेगा, उसकी प्रशस्ति करेगा और उसके अपकर्मों का औचित्य जुटाएगा। जो ऐसा करते थे उनके लिए एक भिन्न कोटि बनाई गई। इन्हें चारण, भाट, विरुदावलीगायक आदि कहते हैं। भाटों का लिखा हुआ उत्तम कोटि के साहित्य में कभी नहीं गिना गया। काव्य विवेचन के प्रसंग में काव्यशास्त्रियों ने विरुदगायकों की रचनाओं को उद्धृत करने से परहेज किया। इस मत पर भी पुराने कवियों में आम सहमति-सी रही कि वे आश्रयदाता राजाओं पर नहीं लिखेंगे। सातवीं शताब्दी के गद्यकार बाणभट्ट ने ‘हर्षचरित’ लिख कर यह लकीर तोड़ी। लेकिन उल्लेखनीय यह है कि बाण ने इस किताब के शुरू के तीन अध्यायों में आत्मचरित लिखा। समूची किताब में उन्होंने कहीं भी कवि को राजा से कमतर नहीं रखा। सम्राट हर्ष से पहली ही मुलाकात में उन्होंने उन्हें जिस तरह कड़ा प्रत्युत्तर दिया वह भारतीय कविता के इतिहास का बड़ा गर्वोन्नत प्रसंग है। कवि और राजा की बराबरी के संबंध में बाण के परवर्ती राजशेखर का कहना था कि जितनी जरूरत कवि को राजा की होती है उतनी ही जरूरत राजा को कवि की। काव्यादर्शकार दंडी तो राजा की गरज को पहले रखते हैं! यशाकांक्षी राजा कवि का मुखापेक्षी होता है।
राजसत्ता और राजा से निकटता लेखनी को प्रभावित न करे, कविगण इस संदर्भ में बहुत सजग रहे हैं। कर्तव्यविरत और राजमद में डूबे नरेशों को फटकारने में भी वे नहीं चूके हैं। चंदबरदाई ने पृथ्वीराज से कहा था- ‘गोरी रत्तउ तुव धरा, तू गोरी अनुरत्त।’- मोहम्मद गोरी तुम्हारी धरती पर नजर गड़ाए हुए है और तू अपनी गोरी (संयोगिता) में अनुरक्त है! नरपति नाल्ह ने राजा बीसलदेव के बड़बोलेपन, अस्थिरचित्त को बखूबी उभारा। नववधू राजमहिषी राजमती के जरिए कवि ने राजमहल में व्याप्त घुटन को वाणी दी।

जनता के पक्ष में खड़े होकर राजसत्ता की जैसी परख तुलसीदास ने की है वैसी शायद ही किसी दूसरे कवि ने की हो। वे देवेंद्र और नरेंद्र दोनों को एक ही कोटि में रखते और बिना लाग-लपेट के उनकी जनविरोधी प्रकृति का खुलासा करते हैं। खल वंदना के प्रसंग में इंद्र के बारे में उन्होंने लिखा- ‘बहुरि सक्र सम बिनवहुं तेहीं। संतत सुरानीक हित जेहीं।’ लोग हमेशा नशे में रहें या युद्ध का माहौल बना रहे- इंद्र का हित इसी से सधता है। अन्यत्र उन्होंने कहा कि ऊंचे रहने वालों की करतूत उतनी ही नीची होती है। वे दूसरों को सुखी नहीं देख सकते। रामकथा कह चुकने के बाद तुलसी ने कहा कि रावण जब था, तब था। आज का रावण तो मंहगाई और दरिद्रता है। रामवत वही है, जो दरिद्रता के खिलाफ खड़ा हो। राम ने ऐसा ही किया था- उन्होंने मणि-माणिक्य यानी विलासिता की चीजें मंहगी कर दी थीं और पशुओं का चारा, पानी और अनाज सस्ता कर दिया था। स्वघोषित रामभक्तों के बारे में तुलसी विशेष रूप से सावधान करते हैं- ‘बंचक भगत कहाय राम के। किंकर कंचन कोह काम के।’ खुद को रामभक्त कहने वाले ठग हैं। वे असल में दौलत, हिंसा और कामवासना के दास हैं। जब राजा धनाढ्यों के पक्ष में काम करता है तब जनता दुखी होती है। जिस राज्य की जनता दुखी है वहां का राजा राजपद लायक नहीं रह जाता, वह नरक का अधिकारी होता है- ‘जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी।’ अब, राजा अपने आप तो नरक जाना नहीं चाहेगा। यह जिम्मेदारी दुखी लोगों की है। क्या तुलसी विप्लव का संकेत कर रहे हैं? शायद हां, क्योंकि उनके पूर्ववर्ती ऐसी राह बना चुके हैं।

डेढ़ हजार साल पहले तमिल महाकाव्य ‘सिलप्पदिकारम’ आया। इसके रचनाकार इलंगो अडिहल स्वयं राजघराने के थे, वीतरागी राजकुमार। महाकाव्य की कहानी चेर, चोल और पांड्य राज्यों को समेटती है। चोलवासी दंपत्ति कोवलन और कण्णही आजीविका की तलाश में पांड्य राजधानी मदुरै गए। वहां कोवलन पत्नी का पायल बेचने शाही स्वर्णकार की दुकान पहुंचा। परदेसी देख कर सुनार ने कोवलन पर रानी का पायल चुराने का आरोप लगाया और उसे सिपाहियों को सौंप दिया। आनन-फानन में सिपाहियों ने कोवलन को सूली पर लटका दिया। अन्यायी राज्य में राजा से न्याय मांगने कण्णही राजमहल गई। उसके संताप ने राजा-रानी दोनों की जान ले ली। मदुरै में आग लग गई। अन्याय की कीमत इस तरह चुकता हुई।

करीब दो हजार वर्ष पूर्व लिखित संस्कृत नाटक ‘मृच्छकटिक’ भी प्रजापीड़क राजा की परिणति प्रस्तुत करता है। उज्जयिनी का राजा पालक अपने नाम के ठीक उल्टा है। शासन में राजा के साले स्थानक या शकार का बोलबाला है। शकार घोर मूर्ख है, मगर अपने पांडित्य का प्रदर्शन करना उसका स्वभाव है। दुर्योधन को कुंतीपुत्र बताने वाला शकार खुद को राष्ट्रीय साला कहता है। राज्य की न्याय-व्यवस्था ऐसी जैसे वह हिंसा का समुद्र हो- ‘नीतिक्षुण्णतटं च राजकरणं हिंस्रै: समुद्रायते।’ न्याय उस राजकरण (कचहरी) से मिलता है, जिसका रिश्ता नीति (नियम-कानून) से टूट गया है। अपने प्रेम-प्रस्ताव को अस्वीकारने वाली वसंतसेना की हत्या खुद शकार करता है और आरोप चारुदत्त पर लगा देता है। न्यायाधीश यथार्थ जानते हैं, मगर राजा का कोपभाजन नहीं बनना चाहते। चारुदत्त को फांसी की सजा सुना दी जाती है। इधर त्रस्त प्रजा के बीच से क्षुब्ध हुंकार उठती है। नेतृत्व गोपकुल का एक युवा आर्यक संभालता है। दर्दुरक, शर्विलक जैसे हिम्मती युवक उसके सहायक हैं। राज्य में क्रांति होती है। यज्ञमंडप में राजा ठीक उस वक्त मारा जाता है जब चारुदत्त को फांसी देने चौराहे पर ले जाया जा रहा है। नाटककार शूद्रक प्रजापीड़क राजा का वध आवश्यक ठहराते हैं।

जनता के पक्ष से साहित्य ने हमेशा अपनी क्रांतिकारी भूमिका का निर्वाह किया है। काव्यप्रयोजनों को गिनाते हुए मम्मट ने जब ‘शिवेतरक्षतये’ को एक प्रयोजन माना तो उसका आशय स्पष्ट था- जो अकल्याणकारी है उसकी क्षति के लिए साहित्य रचा जाता है। बड़े नरम किंतु दृढ़ स्वर में स्वाधीनता संग्राम के दौरान भारतभारतीकार ने लिखा था- ‘राजा प्रजा का पात्र है, वह एक प्रतिनिधि मात्र है। अगर वह प्रजापालक नहीं तो त्याज्य है। हम दूसरा राजा चुनें, जो सब तरह सबकी सुने। कारण, प्रजा का ही असल में राज्य है।’

 

 

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