ताज़ा खबर
 

सीखने में बाधक बनती परीक्षा

हर जगह, चाहे घर हो या स्कूल, बच्चों पर परीक्षा रूपी भय की तलवार लटकी रहती है। अध्ययन बताते हैं कि परीक्षा के दिनों में बच्चे ठीक से सो नहीं पाते हैं। इतना ही नहीं, बच्चों के अभिभावक भी असामान्य हो जाते हैं। हम एक ऐसी संस्कृति में जीने के आदी हो चुके हैं, जहां बच्चों के बचपन को संवारने की जरा भी चिंता नहीं करते।

Author February 25, 2018 05:43 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कालू राम शर्मा

हम परीक्षा में सुधार के बजाय परीक्षा देने वाले तमाम छात्रों में सुधार करने पर तुले हुए हैं। बच्चे जब सब कुछ याद कर परीक्षा में जाते हैं तो वे भूल जाते हैं, इसके लिए शिक्षक कहते हैं कि आत्मविश्वास जरूरी है। यह सही है कि छात्रों में आत्मविश्वास पैदा होना चाहिए। कई बार छात्रों के ‘सिर पर हाथ फेरने’ से उनमें आत्मविश्वास आता है। मगर यह केवल कहने का मामला नहीं है। परीक्षा के मनोवैज्ञानिक और शैक्षिक पहलुओं को जब तक नजरअंदाज किया जाता रहेगा, तब तक हम परीक्षा की नींव को मजबूत बनाने का ही काम करते रहेंगे। दरअसल, परीक्षा आखिर छात्रों के लिए क्या करती है? एक कक्षा से अगली कक्षा में पहुंचने के पैमाने का काम। दूसरा, जब छात्र कक्षा रूपी सीढ़ी के अगले पायदान पर पहुंच जाता है तो उसे नौकरी मिलने का सर्टिफिकेट दे देती है। तीसरा पहलू पारिवारिक-सामाजिक है, जो किसी छात्र-छात्रा की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। अगर देखा जाए तो परीक्षा इतनी ताकतवर हो चुकी है कि उसके सामने शिक्षण और सीखना गौण हो चुका है। स्कूलों-महाविद्यालयों में सीखना चाहे हो न हो, मगर परीक्षा जरूर होगी। हमारे शिक्षण संस्थान डिग्री बांटने के केंद्र बन कर रह गए हैं।

एक बच्ची कहती है कि वह परीक्षा के दौरान सब कुछ भूल जाती है। इस सवाल का जवाब केवल आत्मविश्वास के दायरे में नहीं दिया जा सकता। इसे समझने की जरूरत है कि स्कूलों में जो कुछ पढ़ाया जाता है वह अर्थहीन, नीरस और उबाऊ होता है। खंड-खंड पाखंडों में स्कूल की शिक्षा बिखरी हुई होती है, जिसका कोई भी धागा छात्रों की पकड़ में नहीं आता और इस ज्ञान को पाने के चक्कर में वे उलझे हुए दिखते हैं। मनोविज्ञान कहता है कि हमारा मस्तिष्क अर्थहीन तथ्यों और जानकारियों को नहीं पकड़ता। मस्तिष्क अर्थपूर्ण चीजों को ही ग्रहण करता है। हमारा मस्तिष्क रचनात्मक और व्याख्यात्मक होता है। हर बच्चा अपने आप में अनूठा होता है और वह सीखने की क्षमता लेकर जन्म लेता है। इसे व्यापक तौर पर समझने की जरूरत है कि स्कूलों में जो कुछ पढ़ाया जाता है उसका सर्वांगीण विकास से कोई नाता नहीं होता। बच्चे स्कूल में भर्ती होते ही वर्णमाला, गिनती-पहाड़ों, संकेत-सूत्र, तथ्यों और जानकारियों के मायाजाल में जकड़ दिए जाते हैं, जिनमें उन्हें कोई अर्थ नहीं मिलता। बच्चों को स्कूली माहौल में आत्मीयता और विश्वास नहीं मिलता। स्कूल बच्चों को शक की नजर से देखता है। वहां उनकी अभिव्यक्ति की परवाह नहीं होती। इसके चलते बच्चों में कैसे आत्मविश्वास पैदा होगा? परीक्षा एक थर्मामीटर की तरह है, जिससे बच्चों के शैक्षिक तापमान को मापा भर जाता है। अगर किसी को बुखार है तो उसे बार-बार मापने से बुखार उतर नहीं जाता। बुखार का इलाज करने की जरूरत होती है। हमारे शिक्षा तंत्र में महज बच्चों की परीक्षा ली जाती है। उन्हें सीखने के अवसर न के बराबर मिलते हैं। शिक्षकों के लिए आयोजित प्रशिक्षण और उन्मुखीकरण शिविर सब कुछ पर परीक्षा हावी होती है। यहां पर शिक्षकों का सीखना कम और ‘कैसे जांचा जाएगा’ पर चर्चाएं जोरों पर होती हैं।

स्कूलों में आगे बढ़ने और दूसरों को पीछे धकेलने या नीचे गिरारे की होड़ दिखाई देती है, जिसका गहरा असर हमारे समाज में दिखाई देता है। स्कूल में बच्चा जो कुछ सीखता है उसकी तुलना उसकी कक्षा के बच्चों से की जाती है। अगर एक शिक्षक इस बात को समझ लेता है कि बच्चों की सीखने की गति अलग-अलग होती है, तो फिर अगर कोई बच्चा किसी चीज को देर से सीखता है तो उसमें उतावलापन दिखाने की क्या जरूरत! एक शिक्षक में इतना धैर्य होना चाहिए कि बच्चा देर-सवेर वह सीख ही लेगा। विविधता का दूसरा पहलू यह है कि अगर कोई बच्चा किसी एक मामले में होशियार है तो दूसरा बच्चा किसी और चीज में अव्वल होगा। यह बात शिक्षा की नीतियां भी प्रकारांतर कहती रही हैं कि होड़ को बढ़ावा देने में सबसे अव्वल हैं परीक्षाएं। परीक्षा को लेकर सहज समझ कहती है कि अगर बच्चों की परीक्षा नहीं होगी तो वे पढ़ेंगे ही नहीं। परीक्षा का डर बच्चों को स्कूल आने को बाध्य करता है, उन्हें अध्ययन के लिए बाध्य करता है। यहां तक कि शिक्षकों को भी परीक्षा का भय ही कक्षा शिक्षण के लिए बाध्य करता है। कमोबेश समाज भी इसी प्रकार से सोचता है कि परीक्षा तो होनी ही चाहिए। इतना ही नहीं शिक्षा विभाग के नीति निर्माताओं से लेकर तमाम अधिकारी यही मानते हैं कि परीक्षा एकमात्र हल है शिक्षा में सुधार का। इसीलिए स्थानीय स्तर पर परीक्षा के बदले जल्द ही बोर्ड की परीक्षाओं से बच्चों का सामना कराने की कवायदें की जाती हैं। सवाल है कि परीक्षा का आंतक जब तक रहेगा तब तक बच्चे प्रतियोगिता से मुक्त नहीं हो सकेंगे। हर जगह, चाहे घर हो या स्कूल, बच्चों पर परीक्षा रूपी भय की तलवार लटकी रहती है। अध्ययन बताते हैं कि परीक्षा के दिनों में बच्चे ठीक से सो नहीं पाते हैं। इतना ही नहीं, बच्चों के अभिभावक भी असामान्य हो जाते हैं। हम एक ऐसी संस्कृति में जीने के आदी हो चुके हैं, जहां बच्चों के बचपन को संवारने की जरा भी चिंता नहीं करते। बच्चों को आनंद के साथ सीखने के अवसर स्कूलों से नदारद हैं। आखिर वे बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए सपने देखते हैं। मगर यह भी सोचना होगा कि प्रतिस्पर्धा रूपी परीक्षा की बुनियाद पर बच्चों के भविष्य को संवारने का सपना उनके सुकून और आत्मविश्वास को चकनाचूर ही करता है।

बतौर जॉन होल्ट, क्या परीक्षा का जाल होना जरूरी है? किसे ईनाम मिले, और किसे सजा- जब परीक्षा इस बात को निर्धारित करने लगती है तो वह जाल बन जाती है। कौन निर्धारित करेगा? चर्चिल ने हैरो के अपने अनुभवों को इनसे कहीं ज्यादा प्रभावशाली शब्दों में कहा था। उनके अनुसार उन्हें क्या आता था इसे जानने में उनके शिक्षकों की कोई रुचि नहीं थी। उन्हें क्या नहीं मालूम था, वे सिर्फ यह पता करना चाहते थे। यह बात सामान्यत: सच है। स्कूली शिक्षा की तमाम नीतियां और आयोग परीक्षा में सुधार की अनुशंसाएं करते हुए शिक्षकों की पेशेवर तैयारी पर जोर देती रही हैं। बच्चों ने क्या सीखा, इसकी बेहतर जांच एक शिक्षक अपनी कक्षा में कर सकता है। बोर्ड के विचार को तज कर सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का विचार आज भी सपना बना हुआ है। परीक्षा को कमजोर बनाने या कहें कि इसमें सुधार करने को लेकर आजादी के पहले से विमर्श किया जाता रहा है। अंग्रेजों के जमाने में हंटर कमीशन से लेकर अब तक के हर आयोग ने इस बात को उठाया कि भारत में परीक्षा आधारित शिक्षण का बोलबाला है। परीक्षा ही एक एजेंडा बन चुका है, शिक्षा विभाग का। लिहाजा, समितियां और आयोग परीक्षा को लेकर महज चिंता व्यक्त करते रहे, मगर इसमें कोई आशाजनक परिणाम सामने नहीं आया। समाज और शिक्षा जगत की नियति ही कुछ इस प्रकार की बनाई जा चुकी है कि परीक्षा के बिना शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती। इतना ही नहीं, अगर हम किसी राज्य के शिक्षा जगत पर डालें तो वह शैक्षिक सत्र का अधिकतर वक्त परीक्षा के संचालन में खर्च कर देता है। एक स्कूल से लगाकर राज्य की एससीईआरटी तक परीक्षा और आंतरिक मूल्यांकन की योजना बनाते रहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में बच्चों को सही अर्थों में अध्ययन करने का अवसर ही नहीं मिल पाता।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App