भाषा संस्कृति : लोकतंत्र में भाषिक मर्यादा - Jansatta
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भाषा संस्कृति : लोकतंत्र में भाषिक मर्यादा

एक सभ्य लोकतंत्र, राजनीति के पक्ष-प्रतिपक्ष, समर्थन-विरोध या प्रकृति-संस्कृति का ही लोकतंत्र नहीं होता। वह भाषा का लोकतंत्र भी होता है।

Author नई दिल्ली | January 24, 2016 12:05 AM
एक सभ्य लोकतंत्र, राजनीति के पक्ष-प्रतिपक्ष, समर्थन-विरोध या प्रकृति-संस्कृति का ही लोकतंत्र नहीं होता। वह भाषा का लोकतंत्र भी होता है।

भाषा साहित्य की हो, धर्म या राजनीति की, वह मनुष्य का संस्कार होती है। भाषा सीखना, लिखना, पढ़ना, बोलना एक पक्ष है, लेकिन उसका व्यवहार संस्कार का सौंदर्य लगे, संवेदन का मर्म लगे और समाज या देश की पहचान बने यह भी जरूरी है। राष्ट्र केवल अर्थशास्त्र से नहीं बनता, न राजनीति ही उसे संपूर्ण राष्ट्र बनाती है, एक संपूर्ण राष्ट्र बनता है सामाजिक चेतना से, सभ्यता के उत्कर्ष से, जीवन के प्रति श्रेष्ठताबोध से! भाषा मनुष्य की चेतना का निर्माण करती है। वह मानवीय स्पंदन है, सौंदर्य है, संवेदन है और वे तमाम जीवन-व्यवहार भाषा से प्रकट होते हैं, जो मनुष्य अपने में जीता है।

एक सभ्य लोकतंत्र, राजनीति के पक्ष-प्रतिपक्ष, समर्थन-विरोध या प्रकृति-संस्कृति का ही लोकतंत्र नहीं होता। वह भाषा का लोकतंत्र भी होता है। भाषा लोकतंत्र की वाणी भी है, व्यवहार भी, संस्कार भी। राजनीति केवल विषय ज्ञान नहीं और न राजनीतिशास्त्र में उच्चतम उपाधि-प्राप्त कर लेने से आती है। राजनीति मनुष्य के आंतरिक स्वभाव की अभिव्यक्ति है, उसके ज्ञान, उसकी चेतना, उसके अनुभव और उसके संकल्प की भी अभिव्यक्ति है। भाषा उस ज्ञान, चेतना और अनुभव को राजनीति की मर्यादा और शील बना देती है। जब राजनीति भाषा का शील त्याग देती है, तो वह विकृत होने लगती है। उसकी बौद्धिक और वैचारिक ऊर्जा नष्ट होने लगती है और ऐसा लगता है जैसे राजनीति अशिक्षितों, असभ्यों या कुटिल लोगों का तमाशा और व्यवहार बन गई है।

भारतीय लोकतंत्र की नींव में संविधान है। संविधान महज बंधों-उपबंधों का जखीरा नहीं है। वह हमारे देश की श्रेष्ठतम, प्रखरतम बौद्धिक प्रतिभाओं के अध्ययन, अनुभव, ज्ञान और संकल्प का प्रतिसाद है, परिणाम है। वह जितना राजनीतिक-शास्त्रीयता का वैधानिक लोकमार्ग है, उतना ही हमारी वांग्मयी, वेदांती या उपनिषदीय सांस्कृतिकता से बना है। संविधान जितना उदार, उदात्त और मानवीय है, वह यह सिद्ध करता है कि जिस देश का समाज बहुधर्मी, बहुभाषी, बहु-जातीय, बहुक्षेत्रीय हो, वहां का संविधान हमारी देशज और सार्वभौमिक सामूहिकता का श्रेष्ठतम प्रतिनिधि हो। हमारे पूर्वजों ने इसी आधार पर संविधान की रचना की।

हमारा लोकतंत्र बहुभाषी होने के नाते हमारी सांस्कृतिक विविधता का लोकतंत्र भी है। यह विविधता हमें तोड़ती नहीं, जोड़ती है। हम अपनी भाषा से आगे जाकर अन्य की भाषा को स्वीकार करने, उनसे संवाद करने, उनको अपनी शिक्षा में शामिल करने का कर्तव्य भी निभाते हैं। हमारा लोकतंत्र राजनीतिक रूप से इन अड़सठ सालों में पुष्ट और परिपक्व तो हुआ है, लेकिन संयम और संतुलन की मर्यादा का उल्लंघन भी होने लगा है। हमारे राजनीतिक दलों, उनके सदस्यों, जनप्रतिनिधियों, यहां तक कि जिम्मेदार नेताओं का भाषाई व्यवहार अशालीन और सार्वजनिक रूप से अमर्यादा का शिकार हुआ है।

लोकतंत्र में विरोध, आलोचना यहां तक कि निंदा की भी अनुमति होती है, लेकिन उसके लिए एक ऐसे शिक्षित समाज की अभिव्यक्ति जरूरी है, जिसे भाषा का सही ढंग से उपयोग करने की शिक्षा और संस्कार मिला हो। जब राममनोहर लोहिया पहली बार संसद में पहुंचे और नेहरू-नीतियों की कठोर शब्दों में उन्होंने आलोचना की थी, तो नेहरू ने कहा था, कुछ नए सदस्य संसद में आए हैं, उन्हें संसदीय भाषा सीखनी चाहिए। कांग्रेस और भाजपा का आपसी विरोध राजनीतिक रूप से कितना भी रहा हो, मगर बांग्लादेश के निर्माण पर अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिराजी को दुर्गा तक कहा और इंदिराजी ने वक्त आने पर अटलजी को संसद की शोभा कहा। क्या आज हम अपनी राजनीति में इतने शालीन, इतने सहिष्णु, इतने संवेदनशील हैं?

धर्मपाल ने विल्बर फोर्स द्वारा चार संसदीय भाषणों का संग्रह किया है, जिसमें चार सांसदों के ब्रिटिश संसद में उत्तेजित भाषणों का जिक्र है। ये उत्तेजित भाषण भारत में पदस्थ उन गवर्नर जनरलों-वायसरायों को लेकर थे, जिन्होंने भारत में ईसाई धर्म के प्रचार के बजाय राजनीतिक पद का अपनी अय्याशी में दुरुपयोग किया। ब्रिटिश संसद ने तो क्लाइव और वारेन हेस्टिंग्स पर भारत में किए गए भ्रष्टाचार और अत्याचार के विरोध में महाभियोग भी चलाया था। फिर उन्हें भले मुक्त कर दिया गया, लेकिन एक लोकतांत्रिक न्याय-प्रक्रिया तो चलाई थी। हमने भी संसद का ब्रिटिश मॉडल अपनाया तो अवश्य, लेकिन आरोप, अभियोग और विरोध की भाषा का संयम नहीं सीखा, विरोध की सीमा तय नहीं की, प्रतिपक्ष की भूमिका को सकारात्मक और रचनात्मक बना कर लोकतंत्र का शिक्षित स्वरूप प्रस्तुत नहीं किया।

सच पूछा जाए तो हमारा जन-प्रतिनिधित्व कितना भी पढ़ा-लिखा हो, मगर वह लोक-शिक्षा का उदाहरण नहीं है। हमारा नेतृत्व करने वाले व्यक्तिगत आरोपों, आक्षेपों और निंदनीय भाषा के संयमहीन शब्दों से इस कदर आच्छादित हैं कि नीति, विकास, जनरुचि आदि के मुद्दे गौण हो जाते हैं और व्यक्तिगत कीचड़बाजी शुरू हो जाती है, चाहे वह सदन के अंदर हो, बाहर या मीडिया में। यहां तक कि सर्वाधिक शिक्षित, अनुभवी और तेजस्वी नेता भी अपनी वाणी का शील और संयम खो देते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में हमने अपना राजनीतिक व्यवहार अत्यंत संकीर्ण कर लिया है। यह सच है कि राजनीति और राजनीतिकों के बिना लोकतंत्र असंभव है। दल और दलगत नेतृत्व अनिवार्य शर्त है, लोकतंत्र की। विरोध का विपक्षी अधिकार संसदीय आचरण है, पर क्या यह भी सच नहीं कि इस अधिकार का दुरुपयोग विरोध के साथ सदनों को ठप करने में किया गया है, चाहे सत्ता किसी भी दल की रही हो? चुनाव-पूर्व की करबद्ध विनम्रता चुनाव-पश्चात के कर-दंड या अहंकार में बदल जाती है।

अगर भारत बहुभाषी, बहुक्षेत्रीय, बहुजातीय और बहुधर्मी न होता, तो संभव था कि हमारा लोकतंत्र फौजी बूटों के तले रौंद दिया जाता, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे पड़ोसी देशों में हुआ। यह हमारी विविधता की ताकत है कि हम एक हैं और कोई भी दल, सत्ता यहां तक कि शक्ति चाहे फौज ही क्यों न हो, उसे इस विविधता का डर जितना है उतना एकधर्मी एकता का नहीं।
हमने लोकतंत्र के मंदिरों में बहसबाजी के शंख तो बहुत फूंके, मगर क्या कभी लोकतंत्र की दीक्षा के वे सूत्र रचे, जिनसे यह पता चलता हो कि लोकतंत्र की पुलिस कैसी हो, प्रशासन कैसा हो, लोकसेवक का लोक के साथ व्यवहार कैसा हो। क्या प्रशासन केवल दफ्तरी आपत्तियों का नाम है, जो जनता के लिए हमेशा विपत्तियां खड़ी करता रहे? अगर पानी, सड़क, बिजली, खाद्यान्न, रोजगार, स्वच्छता, शिष्टाचार जैसे विषय जनसंस्कार और जनजागृति के विषय बनते तो लगता जनता के प्रतिनिधि केवल नेता नहीं, जन-शिक्षक भी हैं, जन-रक्षक भी हैं और जन-सेवक भी, जिनके पास भाषा का शील भी है और शिक्षा की सौम्य, सुंदर और संवेदनशील संस्कृति भी।

आज का राजनीतिक माहौल और आचरण देख कर लगता है कि क्या ऐसे ही लोकतंत्र और ऐसी ही स्वतंत्रता की लड़ाई हमारे पुरखों ने गोरी सरकार के विरुद्ध लड़ी थी? अब हर दल, हर प्रतिनिधि को यह सोचना होगा कि वह लोकतंत्र को किसी शोकतंत्र में न बदलने दे। जनता के पास केवल आकांक्षाएं होती हैं, जनता अपनी उपेक्षा नहीं सह पाती। इसीलिए वह हर बार सरकार बदल कर यह संदेश देती है कि जनता की उपेक्षा का जनतंत्र उसे नहीं चाहिए। जब हमारी पूरी राजनीति और राजनीतिक व्यवस्था इस मर्म को समझेगी तो एक सबसे बड़ा लोकतंत्र सर्वाधिक सभ्य, सुशिक्षित और संगठित लोकतंत्र कहला सकेगा, वरना अभी हमारा लोकतंत्र अशिक्षितों के भाषा-भ्रंश का लोकतंत्र ही लगता है।

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