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भाषा-संस्कृति: बिलाती बोलियां

प्रत्येक बोली-भाषा समुदाय की अपनी ज्ञान-शृंखला है। एक बोली के विलुप्त होने के साथ उसका कृषि, आयुर्वेद, पशु-स्वास्थ्य, मौसम, खेती आदि का सदियों पुराना ज्ञान भी समाप्त हो जाता है। यह दुखद है कि हमारी सरकारी योजनाएं इन बोली-भाषाओं की परंपराओं और उन्हें आदि-रूप में संरक्षित करने के बजाय उनका आधुनिकीकरण करने पर ज्यादा जोर देती हैं।

भाषा और बोलियांहाल की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में केवल 1365 मातृभाषाएं बची हैं, इनमें से कई ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले दस हजार से भी कम लोग रह गए हैं।

सन 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 बोली-भाषाएं थीं, जबकि हाल की एक रिपोर्ट के अनुसार केवल 1365 मातृभाषाएं बची हैं। भारत सरकार के जनगणना निदेशालय के मुताबिक देश में बाईस अनुसूचित भाषाएं और सौ गैर-अधिसूचित भाषाएं हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक लाख है। बयालीस ऐसी भाषाएं हैं, जिन्हें बोलने वाले दस हजार से कम बचे हैं और उन्हें लुप्तप्राय माना जा रहा है।

दो साल पहले जब यूनेस्को द्वारा जारी दुनिया की भाषाओं के मानचित्र में यह आरोप लगा कि भारत अपनी बोली-भाषाओं को भूलने के मामले में दुनिया में अव्वल है, तो लगा था कि शायद सरकार और समाज कुछ चेतेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। विडंबना है कि देश की आजादी के बाद हमारी पारंपरिक बोली-भाषाओं पर सबसे बड़ा संकट आया और उनमें भी आदिवासी समाज की बोलियां लुप्त होने में अव्वल रहीं। गणेश देवी के सर्वे के अनुसार हम करीब तीन सौ बोलियों को बिसरा चुके हैं और एक सौ नब्बे अंतिम सांसें ले रही हैं।

बोलियों के गुम हो जाने का संकट सबसे अधिक आदिवासी क्षेत्रों में है। चूंकि देश के अधिकांश जनजातीय बहुल इलाके प्राकृतिक संसाधन से संपन्न हैं, इसलिए बाहरी समाज के लोभ की गिरफ्त में यही क्षेत्र सबसे ज्यादा होते हैं। हिंसा-प्रतिहिंसा, विकास और रोजगार की छटपटाहट के चलते आदिवासियों के पलायन और उनके नई जगह पर बस जाने की रफ्तार बढ़ी, तो उनकी कई पारंपरिक बोलियां पहले कम हुईं और फिर गुम हो गईं। एक बोली के लुप्त होने का अर्थ उसके सदियों पुराने संस्कार, भोजन, कहानियां, खानपान सभी का गुम हो जाना है।

जिन भाषाओं या बोलियों को लुप्तप्राय माना जा रहा है, उनमें अंडमान निकोबार द्वीप समूह की ग्यारह, पूर्वोत्तर की बारह और हिमाचल प्रदेश की चार शामिल हैं। इसी तरह ओडीशा, बस्तर, कर्नाटक, तेलंगाना-आंध्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, झारखंड में भी कुछ जनजातियों की बोली-भाषाओं को इस्तेमाल करने वालों की संख्या कम होने के आंकड़े बेहद चैंकाते हैं। इन्हें राज्य सरकार ने पीवीजीटी श्रेणी में रखा है।

एक बात आश्चर्यजनक है कि मुंडा, उरांव, संताल जैसे आदिवासी समुदाय, जो कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर पर आगे आ गए, जिनका अपना मध्यवर्ग उभर कर आया, उनकी जनगणना में आंकड़े देश के जनगणना विस्तार के अनुरूप ही हैं। बस्तर में गोंड, दोरले, धुरबे आबादी के लिहाज से सबसे ज्यादा पिछड़ रहे हैं। कोरिया, सरगूजा, कांकेर, जगदलपुर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा जिलों में आदिवासी आबादी तेजी से घटी है। यह भी गौरतलब है कि नक्सलग्रस्त क्षेत्रों में पहले से ही कम संख्या वाले आदिवासी समुदायों की संख्या और कम हुई है। ये केवल किसी आदि समाज के इंसान के लुप्त होने के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उसके साथ उनकी बोली-भाषा के भी समाप्त होने की दास्तान है।

प्रसिद्ध नृशास्त्री ग्रियर्सन की सन 1938 में लिखी पुस्तक ‘माड़िया गोंड्स आफ बस्तर’ की भूमिका में एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख है, जो बस्तर की छत्तीस बोलियों को समझता-बूझता था। जाहिर है कि आज से अस्सी साल पहले वहां कम से कम छत्तीस बोलियां थीं। सभी जनजातियों की अपनी बोली, प्रत्येक हस्तशिल्प या कार्य करने वाले की अपनी बोली। राजकाज की भाषा हल्बी थी, जबकि जंगल में गोंडी का बोलबाला था। गोंडी का अर्थ कोई एक बोली समझने का भ्रम न पालें- घोटुल मुरिया की अलग गोंडी, तो दंडामी और अबूझमाड़िया की गोंडी में अलग किस्म के शब्द। उत्तरी गोंडी में अलग भेद। राज गोंडी में छत्तीसगढ़ी का प्रभाव ज्यादा है। इसका इस्तेमाल गोंड राजाओं द्वारा किया जाता था। सन 1961 की जनगणना में इसको बोलने वालों की संख्या 12,713 थी। आज यह घट कर करीब पांच सौ रह गई है।

चूंकि बस्तर भाषा के आधार पर गठित तीन राज्यों महाराष्ट्र, ओडीशा, तेलंगाना (आंध्र प्रदेश) से घिरा हुआ है, सो इसकी बोलियां छूते राज्य की भाषा से अछूती नहीं हैं। दक्षिण बस्तर में भोपाल पट्टनम, कोंटा आदि क्षेत्रों में दोरली बोली जाती है, जिसमें तेलंगाना/ आंध्र प्रदेश से लगे होने के कारण तेलुगु का प्रभाव दिखता है, तो दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा दंडामी बोली का क्षेत्र है। जगदलपुर, दरभा, छिंदगढ़ में धुरवी बोली का बोलबाला है, वहीं कोंडागांव क्षेत्र के मुरिया अधिकतर हल्बी बोलते हैं।

नारायणपुर घोटुल मुरिया और माड़िया का क्षेत्र है। बस्तर और ओडिशा राज्य के बीच सबरी नदी के किनारे धुरवा जनजाति की बहुलता है। जगदलपुर का नेतानार का इलाका, दरभा और सुकमा जिले के छिंदगढ़ और तोंगपाल क्षेत्र में धुरवा आदिवासी निवास करते हैं। इस जनजाति की बोली धुरवी है। इसी तरह नारायणपुर ब्लॉक में निवासरत अबूझमाड़िया माड़ी बोलते हैं। इन दोनों जनजातियों की आबादी पचास हजार से अधिक नहीं है। इन जनजातियों की पुरानी पीढ़ी के लोगों के बीच आज भी धुरवी और माड़ी ही संवाद का जरिया है, पर नई पीढ़ी में इन बोलियों का प्रचलन धीरे-धीरे घट रहा है।

राजस्थान में आधा दर्जन बोलियां यूनेस्को की लुप्तप्राय बोलियों की सूची में शामिल हैं। राजस्थान के पश्चिम में मारवाड़ी के साथ मेवाड़ी, बांगडी, ढारकी, बीकानेरी, शेखावटी, खेराड़ी, मोहवाड़ी और देवड़ावाटी; उत्तर-पूर्व में अहिरवाटी और मेवाती; मध्य-पूर्व में ढूंढाड़ी और उसकी उप-बोलियां- तोरावटी, जैपुरी, काटेड़ा, राजावाटी, अजमेरी, किसनगढ़ी, नागर चैल और हाड़ौती; दक्षिण-पूर्व में रांगडी और सौंधवाड़ी (मालवी); और दक्षिण में निमाड़ी बोली जाती हैं। घुमंतू जातियों की अपनी बोलियां हैं, जैसे गाड़िया लुहारों की बोली- गाड़ी। अब ये या तो दूसरी बोलियों के साथ मिल कर अपना मूल स्वरूप खो चुकी हैं या नई पीढ़ी इनमें बात ही नहीं करती।

मध्यप्रदेश की बारह आदिवासी बोलियों पर विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है। इनमें ज्यादातर आदिवासी बोलियां हैं- भीली, भिलाली, बारेली, पटेलिया, कोरकू, मवासी निहाली, बैगानी, भटियारी, सहरिया, कोलिहारी, गौंडी और ओझियानी। ये जनजातीय बोलियां यहां सदियों से बोली जाती रही हैं, लेकिन अब ये बीते दिनों की कहानी बनने के कगार पर हैं।
उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र की बंगाणी बोली को अब मात्र बारह हजार लोग बोलते हैं। पिथौरागढ़ की दारमा और ब्यांसी, उत्तरकाशी की जाड और देहरादून की जौनसारी बोलियां खत्म होने के कगार पर हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि चूंकि ये बोलियां न तो रोजगार की भाषा बन पाईं और न ही अगली पीढ़ी में इनमें बात करने वाले बचे हैं, सो इनका मूल स्वरूप धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। याद करना होगा कि अंडमान निकोबार और कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में बीते चार दशक में कई जनजातियां लुप्त हो गर्इंऔर उनके साथ उनकी आदिम बोलियां भी अतीत के गर्त में समा गईं।

प्रत्येक बोली-भाषा समुदाय की अपनी ज्ञान-शृंखला है। एक बोली के विलुप्त होने के साथ उनका कृषि, आयुर्वेद, पशु-स्वास्थ्य, मौसम, खेती आदि का सदियों पुराना ज्ञान भी समाप्त हो जाता है। यह दुखद है कि हमारी सरकारी योजनाएं इन बोली-भाषाओं की परंपराओं और उन्हें आदि-रूप में संरक्षित करने के बजाय उनका आधुनिकीकरण करने पर ज्यादा जोर देती हैं। हम अपना ज्ञान तो उन्हें देना चाहते हैं, लेकिन उनके ज्ञान को संरक्षित नहीं करना चाहते। यह हमें जानना होगा कि जब किसी आदिवासी से मिलें, तो पहले उससे उसकी बोली-भाषा के ज्ञान को सुनें, फिर उसे अपना नया ज्ञान देने का प्रयास करें। आज जरूरत बोलियों को उनके मूल स्वरूप में सहेजने की है।

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