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पुस्तकायन: कुंवर नारायण को गुनते हुए

कुंवर नारायण उन यशस्वी कवियों में हैं, जिनकी कविता में मिथक और इतिहास, परंपरा और आधुनिकता, पूर्व और पश्चिम की काव्यात्मक परंपरा, कलात्मक औदात्य, बौद्धिक सघनता, वैचारिक ईमानदारी, काव्यात्मक नैतिकता, संवेदनात्मक गहनता, मितव्ययिता और प्रतिरोधात्मक साहस का मेल पिछली शताब्दी के मध्य से लेकर इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बाद भी बना हुआ है। काव्य-परंपरा […]
Author May 3, 2015 16:11 pm

कुंवर नारायण उन यशस्वी कवियों में हैं, जिनकी कविता में मिथक और इतिहास, परंपरा और आधुनिकता, पूर्व और पश्चिम की काव्यात्मक परंपरा, कलात्मक औदात्य, बौद्धिक सघनता, वैचारिक ईमानदारी, काव्यात्मक नैतिकता, संवेदनात्मक गहनता, मितव्ययिता और प्रतिरोधात्मक साहस का मेल पिछली शताब्दी के मध्य से लेकर इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बाद भी बना हुआ है। काव्य-परंपरा की इतनी उज्ज्वलता और समृद्धि कम कवियों में है। उन्होंने कविता की ऊंचाई की जो लकीर अपने लिए खींची उसे लगातार बनाए रख कर काव्य-सर्जना की। यह किसी उपलब्धि से कम नहीं है। वे आधुनिक हिंदी काव्य-परंपरा के क्लासिक मॉडल के भीतर अपनी जगह बनाते हैं।

हिंदी में उनकी उपस्थिति के गहन विवेचन-विश्लेषण-मूल्यांकन की भी एक परंपरा है। हाल के वर्षों में इस परंपरा को आगे बढ़ाने का काम यतींद्र मिश्र और पंकज चतुर्वेदी ने किया है। पंकज ने लगातार कई लेख लिख कर कुंवर नारायण की काव्य-संपदा को समझने-समझाने की कोशिश की है। जीने का उदात्त आशय में कुंवर नारायण पर दस निबंधात्मक लेख हैं। इनमें पचास वर्षों से अधिक समय में फैली उनकी काव्य-संपदा, कवि-दृष्टि और कवि-व्यक्तित्व को पहचानने की कोशिश की गई है। ‘मध्यम मार्ग की कविता’ शीर्षक के अंतर्गत कुंवर नारायण का एक साक्षात्कार भी प्रकाशित है। संग्रहित लेख कुंवर नारायण को समग्रता में समझने में बेहद उपयोगी और सहायक हैं।

पूरी पुस्तक पढ़ने के बाद यह निष्कर्ष आसानी से निकाला जा सकता है कि पंकज, कुंवर नारायण के इर्द-गिर्द जमे रहे हैं। ‘बिटविन द लाइन्स’ रहने की कोशिश की है। हालांकि आलोचना को कुंवर नारायण के आरपार जाना चाहिए। कई बार दूर भी।

पंकज पहले ही पृष्ठ पर कुंवर नारायण की दृष्टि को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं: ‘कविता उनके लिए एक संवेदनशील और मेधावी मनुष्य की आत्माभिव्यक्ति का गहन पारदर्शी माध्यम है’। जाहिर है यहां यह बात साफ होनी चाहिए कि कुंवर नारायण छायावादियों की आत्माभिव्यक्ति से कहां और किस बिंदु पर अलग होते हैं। जब वे आगे कुंवर नारायण को उद्धरित करते हैं- ‘कविता मेरे लिए कोई भावुकता की हाय-हाय न होकर यथार्थ के प्रति एक प्रौढ़ प्रतिक्रिया की मार्मिक अभिव्यक्ति है’- तो बातें साफ हो जाती हैं, लेकिन फिर भी आलोचकीय दृष्टि की मांग बनी रहती है।

पंकज उनकी कविताओं की विशेषताएं बताते हुए लिखते हैं- ‘उनकी कविता में निरी समकालीनता और सामाजिकता की अविचारित वाचालता, चमक-दमक या आतंक नहीं है। वह मनुष्य की आत्मा, मनुष्य और प्रकृति, मनुष्य और अज्ञात सत्ता, मनुष्य और समाज, मनुष्य और इतिहास- यानी प्रकट-अप्रकट सभी तरह के संबंधों और सच्चाइयों की पड़ताल में प्रवृत्त होती है।’ व्यापक अर्थ में कविता ‘जीवन की आलोचना’ है।

पंकज इस बात का उल्लेख करते हैं कि कुंवर नारायण की कविता में अंतर्जगत और बहिर्जगत या व्यक्ति और समाज के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं है, बल्कि दोनों के मध्य एक निरंतर विकसनशील द्वंद्वात्मक संबंध है, जिसे वे अपनी कविता में उपस्थित करते हैं। उनकी कविता में बहुस्तरीयता है। यह मानने में शायद पाठकों को कठिनाई होगी कि कुंवर नारायण का शिल्प सुबोध और सरल है। दरअसल, उनकी कविता अर्थ के संश्लेष को प्रकट करती है। वह अपनी बुनावट में बेहद जटिल और बौद्धिक है। भाषा की स्पष्टता, अर्थ की स्पष्टता नहीं है।

शुरुआती दौर की उनकी कविताएं काफी हद तक अंतर्मुखी हैं। बीसवीं सदी के अंत तक आते-आते उनकी कविताओं में खुलापन दिखने लगा। यथार्थ ज्यादा सघन और जटिल हुआ। सामाजिक-राजनीतिक अन्याय के प्रति कविता मुखर होने लगी। ‘आत्मजयी’ में जो व्यक्ति चीजों के प्रति जिज्ञासु है, वह अब प्रतिकार की मुद्रा अपनाने लगा। यह कविता का ऐतिहासिक विकास है और लेखक की समकालीनता के भीतर पैठ। समाज के भीतर अन्वेषक दृष्टि को टिकाए रखने की निरंतरता भी। यही वजह है कि कुंवर नारायण नवोदित लेखकों के बीच ‘आउटडेटेड’ या ‘ओल्ड फैशन’ के कवि नहीं हैं।

वे समय के साथ लगातार मुठभेड़ करते और अपने को बदलते रहे। अपने शिल्प और वस्तुसौंदर्य में भी बदलाव लाने में सफल रहे। वे आत्मजयी की भाषा, सौंदर्य और अमूर्तन को बहुत पीछे छोड़ आए हैं। समाज में बढ़ते तनाव, कटुता, सांप्रदायिकता और क्रूरता के प्रति लेखक का भाव-संवेदन कठोर हुआ है। जो चीजें नहीं बदली हैं- वे शाश्वत मूल्य हैं। मसलन, आत्मा की उच्चता, नैतिकता, सौंदर्यबोध। मनुष्य का नैतिक बल, असहमत हो जाने का माद्दा और सार्थक जीवन जीने की कला। इन सबकी तरफ पंकज इशारा करते चलते हैं।

कुंवर नारायण की कविताओं में पैसा, ताकत, उपभोग और अपव्यय के प्रतिकार के आख्यान को उद्घाटित करते हुए पंकज बताते हैं कि वे अपने चिंतन में बुद्ध के मध्यम मार्ग का अनुसरण करते हैं। उनके काव्य-चिंतन में सांसारिक बंधनों, भोगों और भौतिक सुखों से ऊपर उठ कर ज्यादा उदात्त और संपूर्ण मानव-सत्य की तलाश है। मनुष्यों के बीच आत्मीय संबंधों की ऊष्मा है। सब कुछ हासिल कर लेने, सफल हो जाने और छीना-झपटी के विरोध में उनकी कविता है।

पंकज को दिए साक्षात्कार में ‘कोई दूसरा नहीं’ को उन्होंने अपना सबसे पसंदीदा संग्रह बताया है। उसकी वजह है कि इस रचना में ‘आत्म’ का अभूतपूर्व विस्तार मिलता है। एक ऐसे दौर में जब ‘अन्य’ की अवधारणा पर बहस चल रही थी, कुंवर नारायण के लिए कोई ‘दूसरा’ नहीं है। मनुष्य/ मनुष्यता की अखंड सत्ता की इस अवधारणा की दृष्टि भारतीय परंपरा में पहले से मौजूद है, जिसे अपने समय में कुंवर नारायण अपने ढंग से हासिल करते हैं। यह संग्रह राष्ट्रीय जीवन के बृहद क्षेत्रों के साथ-साथ सीधे जुड़ता है। प्रेम, प्रकृति, इतिहास, संस्कृति, पर्यावरण, लोकतंत्र, भ्रष्टाचार, गुलामी, उत्पीड़न, शोषण सबको समेटा है।

पंकज चतुर्वेदी अपने शोध में पाते हैं कि चक्रव्यूह का कवि मनुष्य के संकटापन्न और जुझारू अस्तित्व के विभिन्न आयामों का विश्लेषण करता है। ईश्वर और देवत्व के सवाल के साथ मुठभेड़ करता है। उनके काव्य में मौजूद प्रश्नाकुलता, आधुनिक मनुष्य की विडंबनात्मक स्थिति को स्पष्ट करती है। ईश्वर की अवधारणा यहीं से निकलती है। व्यक्ति के आत्मसंघर्ष की युद्धात्मक संसार को यहीं पढ़ा जा सकता है। नचिकेता के व्यक्तित्व में भी जिज्ञासा और प्रश्नाकुलता है। संशय है। वह प्रदत्त संरचनाओं के खिलाफ जाता है। कहने का अर्थ यह कि वह धार्मिक-दार्शनिक सवालों से उलझा आधुनिक मनुष्य है, जिसके भीतर समकालीन समस्याएं और चुनौतियां हैं। पंकज का आलोचक भारत की बहुलधर्मी दार्शनिक परंपरा के भीतर जाकर ‘आत्मजयी’ को पढ़ता है।

पंकज की आलोचकीय दृष्टि इस बात को आसानी से पकड़ती है कि कवि के लिए प्रेम व्यक्तिगत आकांक्षा या निजी संबंध का मामला नहीं, बल्कि यह ‘समूची सृष्टि की मंगलकामना’ है। इस अर्थ में यह ‘मनुष्यता की सबसे सुंदर उदात्त अभिव्यक्ति’ है। इसका यह आशय नहीं है कि उनके यहां लौकिक प्रेम का अभाव है।

पंकज चतुर्वेदी की यह पुस्तक कुंवर नारायण की काव्यात्मक-रचनात्मक उपस्थिति की पड़ताल बेहद आत्मीय तरीके से करती है। वे कुंवर नारायण को संपूर्णता में समझने की कोशिश करते हैं और अलग-अलग रचनाओं का भी विशद विवेचन-विश्लेषण डूब कर करते हैं। इस क्रम में कुंवर नारायण के काव्य का ऐतिहासिक विकासक्रम भी स्पष्ट होता है। काव्य-दृष्टि के विकास का भी पता चलता है और कवि द्वारा अपनाए गए मोड़ों का भी। निश्चय ही यह हिंदी के शोधार्थियों-विद्यार्थियों-पाठकों के लिए बेहद उपयोगी और जरूरी पुस्तक है।

राजकुमार
जीने का उदात्त आशय: पंकज चतुर्वेदी; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली; 600 रुपए।

 

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