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तीरंदाज : जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत

कश्मीर समस्या’ के समाधान में मूलमंत्र के रूप में जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत का फार्मूला कोई बुरा नहीं है।

Author नई दिल्ली | April 24, 2016 12:03 AM
तीन युवकों की हत्या के विरोध में नकाब पहने एक कश्मीरी मुस्लिम युवक पुलिसवालों पर पत्थर फेंकता हुआ। (पीटीआई फोटो)

‘‘जम्हूरियत वोटबाजी का खालिस खेल है। सियासी नवाबों की शाम की शतरंज की बाजी की तरह। उन्होंने अपने वजीर तराशे हुए हैं और पैदल भी। सबको अपनी बिसात पर चलाते हैं और फिर डिब्बे में बंद कर देते हैं, अगली बाजी तक। और जनाब, हुक्मरानों से इंसानियत की उम्मीद रखना मक्का में इंतिहा की बर्फबारी की उम्मीद रखने जैसा है। जहां तक कश्मीरियत का सवाल है, तो जनाब कश्मीरियत तो साजिश की दोजख में कब की जल मरी। क्या बात करते हैं आप और जनाब अटल बिहारी (वाजपेयी)! जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत कहने-सुनने के लिए लाजवाब है, पर हकीकत में लफ्फाजी।’’

करीब चौदह साल पहले श्रीनगर के एक टैक्सी वाले ने मुझसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के एक बयान पर यह प्रतिक्रिया दी थी। अभी पिछले हफ्ते वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यह तीन सूत्रीय फार्मूला दोहराया है और शायद वह टैक्सीवाला भी अपनी पुरानी प्रतिक्रिया फिर से याद करके मुस्करा रहा होगा कि कहने को तो सब कुछ बदल गया है, पर फिर भी कुछ नहीं बदला!

वैसे ‘कश्मीर समस्या’ के समाधान में मूलमंत्र के रूप में जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत का फार्मूला कोई बुरा नहीं है। अगर हम कश्मीर घाटी को फिर से अमन-चैन, खुशहाली और रोशनखयाली की तरफ ले जाना चाहते हैं तो ये तीनों चीजें जरूरी हैं। कश्मीरियों की भी यही तम्मना है। पर ऐसा क्यों नहीं हो रहा है? चुनाव भी हो रहे हैं, बाढ़ के बाद इंसानी मदद भी और सूफी महफिलें भी जम रही हैं, पर इनमें तारतम्य है क्या?

एक पत्रकार की हैसियत से मेरा 1990 से कश्मीर आना-जाना लगा रहा है। दहशतगर्दी के काले दिन भी देखे, सियासी और कुदरती जलजले भी। ‘कश्मीर समस्या’ से रूबरू भी हुआ और कश्मीरियों की समस्याओं से भी। शुरुआती दिनों को छोड़ कर जब दहशतगर्दी का उन्माद चरम पर था, आम कश्मीरी वास्तव में पाक समर्थक नहीं है। उनको अच्छी तरह मालूम है कि पाकिस्तान के पास उनको देने के लिए कुछ नहीं है। उनको यह भी मालूम है कि पाकिस्तान के होते हुए आजादी उनके लिए संभव नहीं है। इसके बावजूद अगर आजादी के नारे लगते हैं और पाकिस्तानी झंडे लहराए जाते हैं तो उसका कारण है कि जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत को दहशतगर्दी की आंधी के बाद ठीक से रोपा नहीं गया। नीति सूत्र सिर्फ जुबानी जमाखर्च है।

कश्मीर समस्या के ठोस समाधान के लिए सबसे पहले हमारी पाकिस्तान नीति साफ होनी चाहिए। यानी अगर हम मानते हैं कि कश्मीर में पाकिस्तान का हाथ है तो हमें फौरन अधिकृत रूप से पाकिस्तान से मुंह मोड़ लेना चाहिए। भारत की ढुलमुल नीति की वजह से काफी नुकसान हो चुका है। स्पष्ट संदेश देना जरूरी हो गया है। पाकिस्तान से बातचीत का सिलसला बंद करने से ही कश्मीरी अवाम केंद्र के नजरिए को गंभीरता से लेगा। आज की तारीख में ऐसा नहीं है।

दूसरे कदम में फौज को रिहाइशी इलाकों से हटा लेना चाहिए। कुछ विशेषज्ञ यह मानते हैं कि ऐसा करने से हालात बिगड़ जाएंगे, पर यह जोखिम उठाना जरूरी है। शहर और कस्बों की कानून-व्यवस्था पुलिस की जिम्मेदारी है, फौज की नहीं। फौज और सीमा सुरक्षा बल को अंतरराष्ट्रीय सीमा को पूरी तरह सुरक्षित रखने का दायित्य दिया गया है। उन्हें इस दायित्व को कड़ाई से निभाने का मौका देना चाहिए। सीमा सुरक्षा बल सीमा पर सुरक्षा की पहली पंक्ति है। घुसपैठ रोकना उसका काम है। उसके बाद आती है फौज। अगर फौज और सीमा बल समन्वय बना कर चलें, तो आतंकी घटनाओं में भारी गिरावट आ सकती है। साथ ही शहरी इलाकों से फौज के हट जाने से मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़ेगा।

पर ऐसा करने से पहले पुलिस और नागरिक प्रशासन को पूरी तरह पुनर्गठित करना होगा। स्थानीय प्रशासन, खासकर पुलिस, का सालों से चले आ रही अव्यवस्था को जारी रखने में निहित स्वार्थ है। उनके लिए हालात सुधरने का मतलब है जवाबदेही। इसीलिए कश्मीर घाटी में घटनाओं के पीछे परोक्ष रूप से स्थानीय प्रशासन कहीं न कहीं उपस्थित रहता है। असली जम्हूरियत की खातिर और इंसानियत की खातिर इस व्यवस्था को जड़ से उखाड़ना जरूरी है। इसकी जगह कर्तव्यनिष्ठ, संवेदनशील और जिम्मेदार अफसरों और कर्मचारियों को आगे लाना होगा। सियासी गलियारों में हलचल जरूर मचेगी, क्योंकि निहित स्वार्थ ऐसा नहीं चाहेंगे, पर राज्य सरकार को ऐसा करना ही होगा। जम्हूरियत इसी से तंदुरुस्त होगी।

कानून-व्यवस्था और न्याय का इकबाल बुलंद करना अगला ठोस कदम है। सरकार को प्रत्यक्ष रूप से न्याय दिलाना ही नहीं होगा, बल्कि ऐसा करते हुए दिखना भी पड़ेगा। हो सकता है कि ऐसा करने से कुछ तबके नाराज भी हो जाएं, पर न्याय का सिद्धांत ही उस दिशा में ले जाएगा जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को फायदा मिले और उनका विश्वास व्यवस्था में कायम हो। एक प्रो-एक्टिव प्रशासन ऐसा कर सकता है, यह असंभव नहीं है।

कश्मीरियत पिछले दो दशक में एक तबके की जायदाद-सी बन गई है। वही उस पर काबिज होकर कट्टरवाद चला रहा है, जबकि कश्मीरियत का जज्बा सूफी, ऋषि, संत, शैव, बुद्ध और इस्लाम के समागम से बनता है। जम्हूरियत और इंसानियत का यही तकाजा है कि असली कश्मीरियत को फिर से सींचा जाए, जिसमें हर तरह के लोग हिल-मिल के रह सकें। कश्मीर में न्याय तभी होगा, जब शिया, सुन्नी, सूफी और अहमदिया, शेख, ऋषि, पंडित और बौद्ध अपनी अपनी जगह पर तशरीफ फरमा हों। कश्मीर का अवाम भी यही चाहता है- उसकी कश्मीरियत सदियों से यही रही है।

रोजमर्रा के हादसों के बावजूद, केंद्र और राज्य सरकारों को हिम्मत और लगन से जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत के तीनों सूत्रों को सिर्फ जुमले तक नहीं रखना है, बल्कि अमली जमा पहनाना है। तीनों सूत्रों पर एक साथ काम करके उनको अपनी अपनी मंजिल देनी है। यही सही डगर। कहते हैं ये सबसे आसान डगर होती हैं, क्योंकि ये सीधी और बेबाक होती है। इसी पर चल कर हम ‘कश्मीर समस्या’ से हट कर कश्मीर की समस्याओं का हल ढूंढ़ पाएंगे।

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