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JNU विवाद पर सुधीश पचौरी का कॉलम बाख़बर : लेनिन की दाढ़ी में

जेएनयू में कल्चर क्रांति। अफजल गुरु की जयकार, इंडिया को धिक्कार। जयकार और धिक्कार के बीच लेफ्ट और राइट की भिड़ंत। एक ओर देशभक्त। दूसरी ओर देशद्रोही।

JNU Row, Afzal Guru, Afzal Guru Event JNU, Anti national Slogan, JNU, Delhi Police, Rajnath Singhजेएनयू कैंपस में राहुल गांधी, डी राजा।

दूर हो न हो, जनता का दुख चैनल में बिकने लगता है। सुखिया एंकर दुखियारों के दुख पर जम कर फाइट करते हैं। इस फाइट में अपराधी बच कर निकल जाते हैं। तब तक कहीं और से कोई दुख चैनलों के कैमरों में टपक पड़ता है और बहसें ले उड़ती हैं। ऐसी वारदातें आम हैं:

एक दिन कैराना में जश्न। जश्न की खुशी। खुशी में बंदूक। बंदूक में गोली। चलती है गोली। मरता है शमी। रोती है माता। रोता है बाप। उसे चाहिए सिर्फ इंसाफ!

जश्न में मौत है। मौत पर फाइट है। बहसों में नेता हैं, वक्ता-प्रवक्ता हैं। दो दिन तक यही यही दिखता है। फिर जांच बैठ जाती है, तो बहस बैठ जाती है!

हनुमंथप्पा जिंदाबाद! इतने दिन बाद चैनलों को हैरतअंगेज खबर मिली। पैंतीस डिग्री नीचे के तापमान में बर्फ के पहाड़ के नीचे दफ्न लांस नायक हनुमंथप्पा जीवित मिलते हंै। दौड़ते हैं पीएम, दौड़ते हैं रक्षामंत्री। बाकी नौ दफ्न हैं। पता नहीं कहां हैं। एक चैनल का रिपोर्टर सेना के हेलीकॉप्टर में बैठ कर रिपोर्ट देता है कि नीचे कितनी बर्फ है। एक बताता है कि हनुमंथप्पा किस तरह से जीवित रह सका होगा।

चैनल टिकर दे रहा है: हनुमंथप्पा की हालत नाजुक! उधर उसके जीवन के लिए प्रार्थना करते परिजन और दक्षिण भारत के कुछ लोग। उत्तर भारत में एक जगह पूजा तक नहीं, यज्ञ तक नहीं, दुआएं तक नहीं।

जेएनयू में कल्चर क्रांति। अफजल गुरु की जयकार, इंडिया को धिक्कार। जयकार और धिक्कार के बीच लेफ्ट और राइट की भिड़ंत। एक ओर देशभक्त। दूसरी ओर देशद्रोही।

इसके बाद टाइम्स नाउ के अर्णव ने तमाम तरह के देशद्राहियों को अकेले ऐसी फाइट दी कि देशद्रोहियों के चेहरे निकल आए। पहली बार लगा कि कोई कितना भी खतरनाक ‘देशद्रोही’ क्यों न हो, जब तक अपने अर्णव भाई जैसा देशभक्त है तब तक कोई कितना ही देशद्रोही क्यों न आ जाय, अर्णव के हाथ से बच कर नहीं निकल सकता। जैसी अथेंटिक पिटाई अर्णव ने अकेले की, वैसी तो न एबीवीपी की नूपुर शर्मा कर पार्इं, न संघ के प्रफुल्ल केतकर!

पहले वाक्य से आखिरी वाक्य तक और एक घंटे के आगे के एक्स्ट्रा टाइम तक में अर्णव धुनते रहे। जब उमर ने कुछ ‘डिस्सेंट’ ‘जेएनयू कैंपस के जनतंत्र और अफजल की फांसी के विरोध में अरुंधती राय तक ने लिखा था’ चीख-चीख कर रिपीट किया तो अर्णव ने पूछा: अमेरिका में आप लादेन की बरसी मनाएं, लादेन की जयकार करें, तो ओबामा क्या करने देंगे? बताना लेनिन कि रूस वाले लेनिन अपने समय में मास्को में जार की जय जयकार करने वालों का क्या बनाते? बताना, क्यूबा में तुमको कोई अमेरिका की जयकार करने की इजाजत देता? सच, जेएनयू के लेनिन ने असली लेनिन की बड़ी बेहुरमती करवाई! लेनिन की दाढ़ी में यह तिनका कहां से आ गया?

अर्णव की पहली चपेट में ही देसी लेनिन का हलक सूख गया। पानी पीना पड़ा। अर्णव ने दर्शकों को जता कर कहा कि आप देखें कि अभी हनुमंथप्पा नामक सिपाही देश की सरहदों की रक्षा करते हुए अपनी जिंदगी दांव पर लगाए बैठा है और ये तीन हैं कि देश के टुकड़े करना चाहते हैं। ये नारे लगा रहे थे। ‘इंडिया गो बैक गो बैक!’ ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी रहेगी!’ यानी संसद पर हमला करने वाले के अरमान पूरा करेंगे। भारत को खत्म करने तक जंग लड़ते रहेंगे भारत से!

फिर ईशान लेनिन और उमर तीनों से मुखातिब होकर कहा: आप तीनों तो वामपंथी भी नहीं ‘एंटी नेशनल’ हैं। आप तो वामपंथ के नाम पर कलंक हैं! यहां का खाते हैं, पाकिस्तान का गाते हैं!

जैसी यूपी वैसी यूपी सरकार! सरकार ने सोचा कि यूपी का ‘यशभारती’ बनाया उन उन को यशभारती के नाम से पचास हजार रुपए महीने की पेंशन दे दी जाए! लेकिन जिस दिन पेंशन की बात चलाई, उसके अगले दिन ही पिटाई खाई। हर चैनल पर मार पड़ी। चैनल मजे ले-ले कर बताने लगे कि जरा पेंशन प्रार्थियों की लिस्ट देखिए: राज बब्बर, नादिरा बब्बर, सुरेश रैना, शुभा मुद्गल! बड़े-बड़े सेलीब्रिटी क्यों भिखमंगे बन गए?

जब भी लगे कि देशभक्ति की भावना कम हो रही है, आप हिंदी के चैनल देखने लगिए। एक न एक चैनल आपको जरूरी मात्रा में देशभक्ति पेल देगा। जी न्यूज देखा तो उसे बताते पाया कि हाफिज सईद ने एक बार फिर भारत के खिलाफ जहर उगला है! लेकिन फिर हमारी हिम्मत बंधाते हुए समझाने लगा कि फिक्र की कोई बात नहीं, मुजफ्फराबाद की सभा में कुल दो सौ लोग ही थे!

बंगलुरू में तंजानिया की एक युवती को नंगा कर प्रताड़ित करने की खबर तीन दिन तक चैनलों में बारी-बारी से घूमती रही। अफ्रीकन एसोसिएशन के लोग बोले। बाद में चैनलों ने बताया कि यह रेसिज्म है। यार! ये तो कहानी में शुरू से था और भइए, गोरा-कालावाद तो हमारे खून में है! इतनी-सी बात समझने के लिए एनडीटीवी वालों को योगेंद्र यादवजी को बुलाना पड़ा, जिनने एक दो नहीं पूरे पांच प्रकार के भेद हमारे जैसे मंदमतियों को और कन्फयूज कर दिया!

हेमा मालिनी का भाग्य अच्छा था या कि चैनल वाले उनके फैन रहे कि उनको लेकर कथित ‘लैंडस्केम’ की एक चटपटी खबर बनी। उम्मीद रही कि कथित ‘लैंडस्केम’ की यह कहानी कम से कम दो-तीन दिन तक धुनी जाएगी। लेकिन हाय मेरी निराशा कि अगले ही रोज यह कहानी मिमियाने लगी। ऐसी कहानियों के लिए ही साहिर ने कहा है:
‘वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन/ उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना बेहतर!’

गुजरात के सेठ की बारात आ रही थी हवाई जहाज में कि बारातियों ने फरमाइश कर डाली सोनू निगम से कि एक गाना ही गा दो। विमान परिचारिका से लिया माइक और गायक गाने लगा विमान बाथरूमों के बीच वाली जगह खड़े होकर:
‘पंछी नदिया पवन के झोंके कोई इनको ना रोके/ सरहद इंसानों के लिए है बोलो हमने तुमने क्या पाया इंसां होके!’
जमीन पर उतरते ही केस हो गया! और गाओ बेटा सोनू!

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