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पुस्तकायन : दो दुनियाओं के बीच सेतु

प्रताप दीक्षित कथाकार शैलेंद्र सागर के संग्रह ब्रंच तथा अन्य कहानियां में वर्तमान के कोलाहल के बीच उगे-फैलते मरुथल में संवेदना की तलाश और मनुष्य की अस्मिता की स्थापना के प्रयास हैं। इन कहानियों में दो समांतर दुनियाएं हैं। एक तरफ अंधकार, उपेक्षा, उत्पीड़न, निराशा और दूसरी तरफ सपनों का अनंत संसार। दोनों दुनियाएं हमारी […]

Author February 8, 2015 10:00 PM

प्रताप दीक्षित

कथाकार शैलेंद्र सागर के संग्रह ब्रंच तथा अन्य कहानियां में वर्तमान के कोलाहल के बीच उगे-फैलते मरुथल में संवेदना की तलाश और मनुष्य की अस्मिता की स्थापना के प्रयास हैं। इन कहानियों में दो समांतर दुनियाएं हैं। एक तरफ अंधकार, उपेक्षा, उत्पीड़न, निराशा और दूसरी तरफ सपनों का अनंत संसार। दोनों दुनियाएं हमारी जानी-पहचानी हैं। हम कभी इसके, कभी उसके साथ होते हैं, लेकिन एक साथ कभी नहीं। ये कहानियां दोनों दुनियाओं के बीच पुल बनाती हैं। बाहरी सतह पर, हमारे आसपास के घटित की सहज प्रतीति ये कहानियां गहन मानवीय सरोकारों से प्रतिरोध का समांतर संसार रचती हैं।

संग्रह में ‘ब्रंच’ और ‘प्रश्नचिह्न’ को छोड़ कर बाकी छह कहानियों का कथानक स्त्री की विवशताओं, दयनीय स्थिति और शोषण की पड़ताल के साथ बदले समय-परिवेश में उनके अंतर्द्वंद्व को चित्रित करता है। ये स्त्रियां अपने-अपने तरीके से अन्याय का प्रतिवाद ही नहीं, जिंदगी के विभिन्न मोड़ों पर अपने लिए ‘नए क्षितिज का संधान’ करती हैं। उनके निजी दुख-संघर्ष, समस्याओं की पृष्ठभूमि का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए लेखक ने इन्हें समाजेतिहास के संदर्भों में, समय के व्यापक सरोकारों से जोड़ा है।

‘दुनिया इतनी छोटी तो नहीं है’ नौकरीपेशा दंपति नवीन और सुमेधा के अहं के टकराव, पति की बेवफाई, सुमेधा के अलग होने के निर्णय और उसकी मुक्ति के अहसास की कहानी है। कहानी तीन स्तरों पर प्रश्न उठाती है। दांपत्य में अहं के टकराव में समझौते-त्याग की अपेक्षा पुरुष सत्तात्मक समाज में स्त्री से ही की जाती है, भले स्त्री आत्मनिर्भर हो, उसकी गलती भी न हो। सुमेधा के जीवन में मानसिक स्तर पर टूटन तो बहुत पहले शुरू हो गई थी, बस देह का मिलन जारी था। कहानी का दूसरा पक्ष उस भौतिकतावादी व्यवस्था पर कटाक्ष करता है जहां ‘ठीकठाक नौकरी, सम्मानजनक आवास, रोजमर्रा की भौतिक सुविधाओं’ के साथ ‘एक अदद पति’ भी इसी कोटि में आता है। कहानी का तीसरा आयाम पति से अलग होने के बाद सुमेधा का स्वाभाविक द्वंद्व है। शायद इसी कारण ‘दीवार पर लगी फोटो में नवीन के मुस्कराते चेहरे पर उसकी नजरें अटक जातीं’ और ‘आंखें नम हो जातीं’। पर अगले ही पल चित्र में मुस्कराती बेटी को देख सुमेधा के चेहरे पर आई मुस्कान आने वाली जिंदगी के बीच सेतु बनती है।

स्त्री की असहायता की ही कहानी है ‘रूपांतरण’। प्रणय के परिणय में तब्दीली के बाद ऐसा क्यों मान लिया जाता है कि विवाह स्त्री के मन-जीवन, अंत: प्रकृति और अभीप्सा को ही नहीं, उसके बुनियादी गठन को ही आमूल बदल देगा। कुछ बेहतर होने की उम्मीद में उसका सर्वोत्तम कहीं छूटता जाता है। विवाह वह संबंध क्यों नहीं बन पाता, जो उसे पूर्णता दे। कहानी की नायिका सलिला के पति द्वारा उत्पीड़ित-अपमानित होने पर मायके में उसकी आंखें छलकती देख मां के आक्रोश भरे शब्द: ‘… या तो तू यहां रह कर अपनी जिंदगी संवारे, सोच-समझ कर निर्णय ले या फिर सपने देखना बंद कर दे’ सलिला ही नहीं, स्त्री मात्र के लिए दिशाबोधक बनते हैं।

पतिगृह में स्त्री की उपेक्षा-उत्पीड़न के बाद अगर जन्म देने वाले माता-पिता का घर भी उसका अपना नहीं हो पाता, कहनी-अनकहनी सुननी पड़ती है तो उसके पास ख्वाब बुनने के अलावा रह क्या जाता है? इसे ‘पुनरावृत्ति’ कहानी व्यक्त करती है। ईशा के लिए उसके एकाकीपन, अजनबियत और बेचारगी का संबल, आत्मविश्वास का बायस उसकी अनुपस्थित (र्बोडिंग स्कूल में पढ़ती) पुत्री तनु बनती है। एक सेतु जो अभिशप्त वर्तमान से सक्षम-समर्थ भविष्य के सपनों से जोड़ता है।
‘घर-बाहर’, ‘सहभागिता’ और ‘वे औरतें’ स्त्री पर थोपी गई वर्जनाओं और उनके अतिक्रमण की कहानियां हैं। इन कहानियों की स्त्रियों की स्थिति, शिक्षा-दीक्षा, परिवेश भिन्न है, पर इन पर लागू बंदिशें, इन्हें नियंत्रित करने की इच्छाओं और लक्ष्मण रेखाओं को लांघने की इनकी अदम्य इच्छाशक्ति के कारण यह अपने जैसी असंख्य स्त्रियों की नुमाइंदगी करती हैं।
‘सहभागिता’ की अंकिता ऊंचे पद पर नौकरी कर रही है। लंबे समय तक मुंबई में अकेले रहने के बाद माता-पिता उसके साथ रहने आ जाते हैं। अंकिता को भी अपने अकेलेपन से निजात मिलने की आशा है। मां की एकमात्र चिंता युवा बेटी के विवाह की है। पर अंकिता की प्राथमिकता उसका करिअर है। मां उसके फोन, सजने-संवरने, रहन-सहन, आने-जाने को लेकर निरंतर टोकती रहती है, पल-पल का हिसाब रखती है। अंकिता को अपनी स्वतंत्रता बाधित होती लगती है। पीढ़ियों के अंतराल में वे अपने-अपने अंधेरों से लड़ रहे हैं। इस द्वंद्व के बावजूद आश्वस्ति यह है कि उनके बीच विश्वास का सेतु टूटा नहीं है। अंकिता के अकेले दिल्ली जाने पर पिता की चिंता को मां ही निर्मूल करती है।

‘घर-बाहर’ पुलिस विभाग में कार्यरत उर्मिला की दुश्वारियों, संघर्ष और उसके आत्मविश्वास की कहानी है। कामकाजी स्त्री की दोहरी जिम्मेदारियां होती हैं। नौकरी के अलावा घर, पति, बच्चे अनिवार्यत: उसका दायित्व हैं। स्त्री प्राय: पुरुष के लिए वस्तु मात्र होती है। पति अवधेश उस पर शक करता है। कहानी में एक सत्य ध्वनित होता है कि इस संघर्ष पथ पर स्त्री को अकेले यात्रा करनी होगी, विजय पाना होगा। उर्मिला का आत्मविश्वास दरअसल, संपूर्ण स्त्री जाति के लिए एक परोक्ष संदेश है- औरत की दुनिया तो एक जैसी है… अपने अस्तित्व को बचाना है, भले इसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े।

‘वे औरतें’ आधी दुनिया के सपनों को जीने के सतरंगी संसार की कहानी है। पारंपरिक रूप से औरतों का ठिकाना ‘घर’ माना जाता है, वह घर जो उनका होता ही नहीं। घर तो पति का होता है, वह कमाता जो है और औरत से इसे जताना भी नहीं भूलता। इस घर में पुरुष की अपनी कुंठाएं हैं। स्त्री के लिए यही घर बेचारगी, गुलामी, ऊब का बायस होता है। घर की देहरी लांघना स्त्री की आजादी, आत्मनिर्णय और उसके अस्तित्व की प्रमाणिकता का प्रतीक बन जाता है। तीन विभिन्न परिवेश की स्त्रियां पतियों के काम पर जाने के बाद बाहर निकलती हैं- पापड़ सेंटर तक जाने के लिए। वे यथासंभव सज-संवर कर निकलती हैं, चहकती हैं, गपियाती हैं। उनके लिए यह सब जीने की सार्थकता का है। यहां यह महत्त्वहीन है कि वे घर से इसलिए निकलती हैं कि उन्हें कमाई करनी है। महत्त्वपूर्ण हैं ‘हमारे अपने पैसे!’ कहानी बहुआयामी है। एक छोर पर स्त्रियों की आजादी, आत्मनिर्भरता, स्वनिर्णय का साहस, तो दूसरा आयाम भविष्य के ख्वाबों और जिंदगी के स्राव को शुष्क होने से बचाना है। कहानी सपनों को तलाशती नहीं, उन्हें सच करके दिखाने की कोशिश करती है।

‘प्रश्नचिह्न’ शिक्षा-व्यवस्था की विरूपताओं और युवा वर्ग के टूटते सपनों की ही कहानी नहीं, बल्कि समाज के वर्तमान स्वरूप के परिप्रेक्ष्य में भविष्य के प्रति आगाह करती है। हमारी नियति है कि हम इतिहास के उस कालखंड में रहने को विवश हैं, जहां विकास के अनेक सोपानों को तय कर चुकने के बाद भी मनुष्य नितांत अकेले पड़ जाने को अभिशप्त है। किसानों और युवाओं की आत्महत्याओें के पीछे उनकी दुश्वारियों, कर्ज, बेरोजगारी, सामाजिक-आर्थिक-भाषाई भेदभाव आदि कारणों के साथ यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उपभोक्तावादी संस्कृति ने मनुष्य को आत्मविपन्न, हताश कर दिया है। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा चुनौतियों को स्वीकार करने, सहयोग और पिछड़ जाने पर उसे स्वीकार करने की क्षमता का विकास करती है। पर प्रतिस्पर्धा जब, टालस्टॉय के पाहोम की तरह अंतहीन अंधी दौड़ में बदल जाती है तब प्रशांत सहाय ऐसे कितने मेधावी छात्रों के अंदर, बाहर के अंधेरे का गहराना उनकी नियति बन जाता है।

विकास की विडंबना का दूसरा रूप है कि मनुष्य इस तंत्र का एक उपकरण बन कर रह गया है। कंप्यूटर, इंटरनेट, सुविधाओं के आधुनिक साधन मनुष्य की सुख-शांति, कार्यक्षमता, दक्षता में इजाफे के लिए होते हैं, पर आज मनुष्य इन साधनों का निमित्त मात्र बन कर रह गया है। महानगरों में नौकरी करते युवाओं की दिनचर्या बदल चुकी है। ‘ब्रंच’ इस समस्या का गहराई से उत्खनन करती है। अनुज अपने घर अब त्योहारों पर ही आ पाता है। घर में जहां उसकी मां, पिता, बाबा बेसब्री से उसका इंतजार कर रहे हैं, उसके लिए ऊबने, संवादहीनता की जगह है। फास्टफूड की आदत के कारण घर के खाने से उसका पेट खराब हो जाता है। देर से सोने और देर से उठने के कारण उसका ब्रेकफास्ट और लंच एक साथ होता है, जिसे बाबा के पूछने पर वह ब्रंच का नाम देता है। वास्तव में यह रूपक दो छोरों के बीच सेतु है। दरअसल, न तो बाबा को नई पीढ़ी से बैर है, न अनुज की संवेदनाएं चुकी हैं। जरूरतर बदली हुई परिस्थितियों में संवाद और सामंजस्य की है। इसलिए अलग प्रतीत होती दुनियाओं के बीच पुल अपरिहार्य हो जाते हैं। जटिल स्थितियों की सहज प्रस्तुति इन कहानियों को संवेदना और चेतना के धरातल पर संप्रेषणीय बनाती है।

ब्रंच तथा अन्य कहानियां: शैलेंद्र सागर; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 225 रुपए।

 

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