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वक्त की नब्जः खतरे दूसरे हैं

मोदी अगर 2019 में दुबारा प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो कम से कम उनको इतना तो करना होगा कि देश के असली दुश्मनों की तरफ अपना ध्यान आकर्षित करें। कश्मीर में समस्या गंभीर है। जिहादी आतंकवाद की समस्या गंभीर। ‘शहरी नक्सल’ कुछ भी नहीं हैं इन खतरों के आगे।

मेरी नजर में माओवादियों की जगह इतिहास के उस कूड़ेदान में है, जहां फासीवादी और नाजी सोच के लोग पड़े हुए हैं। माओवादी तो अब माओ के अपने देश में भी बहुत कम मिलते हैं और उनकी हिंसक विरासत पर चीन के लोग दशकों से सवाल उठाते आए हैं। लेकिन ऐसी बातें हम भारत में नहीं कह सकते हैं खुल कर, क्योंकि माओवादियों के हमदर्द बहुत हैं आज भी। जंगलों में बंदूकधारी हैं, तो विश्वविद्यालयों में ‘टुकड़े-टुकड़े’ वाले हैं और बुद्धिजीवियों में तो इतने सारे हैं कि अखबारों के दफ्तरों में मिलते हैं, लेखकों में हर दूसरा लेखक उनका हमदर्द है और कवियों में भी उनकी कोई कमी नहीं है। विचारों के मैदान में हावी रहे हैं पिछले सत्तर वर्षों से, सो मुझे अच्छा लगा जब नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ये लोग थोड़ा-बहुत अदृश्य हो गए थे।

गड़े मुर्दों को जिंदा करना लेकिन कोई भारतीय जनता पार्टी से सीखे। पिछले हफ्ते से अगर ये ‘शहरी नक्सल’ फिर से हावी हो गए हैं, तो गलती उन लोगों की है, जिन्होंने पुणे से लेकर मुंबई और दिल्ली तक गिरफ्तार किया ऐसे लोगों को, जिनके खिलाफ उनके पास न ठोस सबूत थे किसी अपराध के और न ही नक्सलियों के हमदर्द होने के। नतीजा यही हुआ कि बात सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंची, जहां से हुकुम हुआ कि ‘असहमति’ अपराध नहीं है लोकतांत्रिक देशों में। हिरासत से फौरन रिहा हुए सबके सब और अपने घरों में अब नजरबंद हैं। पुलिस की तरफ से इन पर आरोप समझ में नहीं आते। कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ और। परिणाम यह कि सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों पर फिर से दिखने लगे हैं ऐसे चेहरे, जो पिछले चार सालों में गायब रहे हैं।

हर चर्चा में अब कहा जा रहा है कि इन लोगों का अपराध सिर्फ यह है कि उनकी विचारधारा मोदी सरकार की विचारधारा से अलग है। नुकसान हुआ है किसी का तो प्रधानमंत्री का निजी तौर पर और वह भी ऐसे समय जब वैसे भी काफी नुकसान हुआ है। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठने लगे हैं, जबसे साबित हुआ है कि नोटबंदी से काला धन हासिल नहीं हुआ है, लेकिन अर्थव्यवस्था को चोट जरूर पहुंची है। यह भी साबित करने में लगे हैं अर्थशास्त्री कि सोनिया-मनमोहन के दौर में अर्थव्यवस्था ज्यादा तेजी से दौड़ रही थी, मोदी के दौर के मुकाबले। यानी अच्छे दिन नहीं आए हैं।

इन चर्चाओं के बीच मेरी नजर नरेंद्र मोदी के उस भाषण पर इत्तेफाक से पड़ी, जो उनका राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में पहला कदम माना जाता है। भाषण दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्रीराम कॉलेज में दिया था फरवरी, 2013 में। सभा में अठारह हजार से ज्यादा छात्र थे और तकरीबन हर टीवी चैनल पर भाषण दिखाया गया था। भाषण में मोदी ने कहा कि स्वराज मिल गया है भारत को, लेकिन सुराज नहीं, क्योंकि हमने साधन, हमारी शक्ति का ठीक इस्तेमाल नहीं किया है। परिवर्तन और विकास की तरफ पहली बार इशारा किया मोदी ने। भाषण के कुछ सप्ताह बाद मैं ग्रामीण राजस्थान के दौरे पर गई थी, मालूम करने कि वसुंधरा राजे इस साल होने वाला विधानसभा चुनाव जीतने वाली हैं कि नहीं।

हैरान हुई, जब वसुंधरा की बातें न करके लोग, खासकर नौजवान, मोदी को जिताने की बातें करने लगे। मैंने जब पूछा उनसे कि मोदी को इतना पसंद क्यों करते हैं, तो उन्होंने कहा कि उनका भाषण उन्होंने टीवी पर देखा था और बहुत अच्छा लगा, क्योंकि वे सब चाहते थे कि देश में परिवर्तन और विकास आए, ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी कम हो जाए। मोदी को पूर्ण बहुमत मिला देश की आर्थिक दिशा बदलने के लिए, लेकिन न जाने क्यों उन्होंने दिशा न बदल कर अपना सारा ध्यान कालाधन खोजने में लगाया। सो, न ही बेरोजगारी कम हुई है खास करके और न ही आर्थिक हाल देश का इतना बदला है जितनी उम्मीद थी।

सो, अब हर रंग के वामपंथी उन पर ताने कसने लगे हैं। राहुल गांधी हर दूसरे दिन याद दिलाते हैं कि चीन में रोज कितनी ज्यादा नई नौकरियां पैदा होती हैं और भारत में कितनी कम। सोनिया गांधी के पुराने सलाहकार याद दिलाने लगे हैं कि उनके दौर में उन्होंने मनरेगा शुरू किया था और शिक्षा, सूचना और स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार कानूनी तौर पर दिए थे जनता को। सच तो यह है कि मनरेगा का पैसा अगर असली नौकरियों को पैदा करने में लगाया जाता, तो ग्रामीण भारत की शक्ल शायद अब तक बिल्कुल बदल गई होती। सच यह भी है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार कानूनी तौर पर हासिल करने की क्षमता आम भारतीय के पास है ही नहीं। बेकार अधिकार हैं ये, जिनके बदले निवेश किया जाना चाहिए बेहतर स्कूलों और अस्पतालों में।

ये सारी चीजें अब तक होनी शुरू हो गई होतीं अगर मोदी ने आर्थिक दिशा को बदलने का अपना वादा निभाया होता। नक्सलियों को हराने का इससे बड़ा हथियार नहीं है। माओवादी विचारधारा को पूरी तरह खत्म करने का भी विकास सबसे बड़ा हथियार है। यही कारण है कि जब भी ग्रामीण इलाकों में नक्सली हमले होते हैं तो उनके निशाने पर होते हैं स्कूल, अस्पताल, सड़कें और बिजली घर। अब लोकसभा चुनाव इतने पास आ गए हैं कि न आर्थिक दिशा बदलने की बात हो सकती है और न ही आर्थिक सुधारों की। लेकिन मोदी अगर 2019 में दुबारा प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो कम से कम उनको इतना तो करना होगा कि देश के असली दुश्मनों की तरफ अपना ध्यान आकर्षित करें। कश्मीर में समस्या गंभीर है। जिहादी आतंकवाद की समस्या गंभीर। ‘शहरी नक्सल’ कुछ भी नहीं हैं इन खतरों के आगे।

 

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