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प्रसंग : अविचारित कार्रवाई

गोपेश्वर सिंह रमेशचंद्र शाह को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो हिंदी की आभासी दुनिया में हंगामा हो गया। बधाइयां कम मिलीं, लानत-मलामत ज्यादा हुई। एक प्रलापी ने इसे ‘साहित्य का अपमान’ घोषित कर दिया। फिर क्या था, उनके फेसबुक-मित्र शाह के लिए गाली-गलौज पर उतर आए। उन टिप्पणीकारों को पढ़ कर लगा कि उनमें से […]

Author January 4, 2015 11:15 PM

गोपेश्वर सिंह

रमेशचंद्र शाह को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो हिंदी की आभासी दुनिया में हंगामा हो गया। बधाइयां कम मिलीं, लानत-मलामत ज्यादा हुई। एक प्रलापी ने इसे ‘साहित्य का अपमान’ घोषित कर दिया। फिर क्या था, उनके फेसबुक-मित्र शाह के लिए गाली-गलौज पर उतर आए। उन टिप्पणीकारों को पढ़ कर लगा कि उनमें से शायद ही किसी ने शाह को पढ़ा हो। शाह को तो भला-बुरा कहा ही गया, लपेटे में अशोक वाजपेयी और उनका ‘गिरोह’ भी आ गया।

वीरेंद्र यादव ने धर्म और साहित्य से संबंधित शाह का एक पुराना बयान उठाया और आभासी दुनिया के सामने प्रश्न की तरह रख दिया- ‘‘अभी-अभी साहित्य अकादेमी से सम्मानित आदरणीय रमेशचंद्र शाहजी का कहना है कि- ‘साहित्यिक कृति के कालजयित्व की कसौटी अंतत: धार्मिक मूल्य-चेतना ही होगी…’ (बहुवचन-1, पृष्ठ- 272)… क्या सचमुच?’’ इस ‘अभी-अभी’ पर ध्यान दें। ऐसा आभासित कराया जा रहा है कि जैसे यह बयान अभी-अभी का है। उसके बाद तो उनके फेसबुक-मित्रों की ओर से उसी एक वाक्य के आधार पर शाह पर दनादन हथगोले फेंके जाने लगे।

उस चर्चा में शाह की कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना आदि का कहीं कोई संदर्भ नहीं था। सत्यमित्र दुबे ने शाह के परिप्रेक्ष्य को सही करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि शाह के सोच पर गांधी, अरविंद, लोहिया, जयप्रकाश आदि का असर है, साहित्य में वे अज्ञेय, निर्मल वर्मा आदि को महत्त्व देते हैं और आलोचना में विजयदेव नारायण साही को। पर दुबे का यह प्रयास शाह को वीरेंद्र यादव और उनके मित्रों की निगाह में सही परिप्रेक्ष्य नहीं दिला सका। जब कोई किसी को अपने एजेंडे के अनुसार सिद्ध करने पर तुला हो तो उसका कोई क्या कर लेगा!

चूंकि शाह को एक धार्मिक व्यक्ति सिद्ध करना था, लेकिन उनका संबंध लोहिया से जोड़ा जा रहा था, इसीलिए वीरेंद्र यादव को जरूरी लगा कि मूल स्रोत यानी लोहिया की धार्मिकता को ही सांप्रदायिक सिद्ध कर दिया जाए। लोहिया में जब उन्हें कुछ नहीं मिला, तो उन्होंने दूधनाथ सिंह के उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ के नायक तत्सत पांडे के कथन को उद्धृत कर दिया- ‘‘…लोहिया की दो नाड़ियां सदा से हिंदुत्व की ओर जाती हैं। उनकी इड़ा-पिंगला में राम-कृष्ण-शिव तथा पौराणिक चिंतन का जो कचरा बहता रहता है वह उन्हें सावरकर के अधिक निकट ले जाता है, नेहरू से कम। कांग्रेस-सोशलिज्म की धार सिर्फ उनकी तीसरी नाड़ी में बहती है जब वे अगड़ों-पिछड़ों की बात करते हैं, जब वे कहते हैं, ‘भारत में जातियां ही वर्ग हैं’। लोहिया और जयप्रकाश दोनों ही गांधीजी के धर्म-तत्त्व के उत्तराधिकारी हैं। महात्माजी के व्यक्तित्व का प्रसार तो सिर्फ नेहरू में दिखाई पड़ता है… इसीलिए लोहिया के अधिकांश अनुयायी एक-न-एक दिन धर्मतत्त्ववादियों के साथ चले जाएंगे, अंतत: ‘हिंदू’ हो जाएंगे।’’

यह कैसी तर्क-पद्धति है कि लोहिया को एक मार्क्सवादी लेखक के उपन्यास के जरिए जाना जाए? क्या वीरेंद्र यादव यह बताने की कृपा करेंगे कि लोहिया और जयप्रकाश अपने किस आचरण और किस लिखित या अलिखित वक्तव्य के लिए सांप्रदायिक हैं? यह कैसी समझ और रणनीतिक चतुराई है भाई! दुनिया को बनाने चले थे दोस्त, अपने ही दोस्त दुश्मन बन बैठे!

नास्तिकता और आस्तिकता किसी लेखक के जेनुइन होने का प्रमाण नहीं हो सकती। हां, किसी लेखक की धार्मिकता दूसरे संप्रदाय के प्रति घृणा फैलाती है, तब वह चिंतनीय और निंदनीय दोनों है। धार्मिकता और धार्मिकता में भी फर्क होता है। गांधी की धार्मिकता और सावरकर की धार्मिकता एक नहीं थी। एक मनुष्य को जोड़ती है, दूसरी भेद करती है। जहां तक मैं जानता हूं, शाह जोड़ने वाली धार्मिकता के पक्षधर हैं।

शाह को पुरस्कार मिला तो मुझे प्रसन्नता हुई। उनसे मेरी दो-चार बार की मुलाकात है। कभी-कभार फोनाफानी भी हो जाती है। पाठक के रूप में उन्हें थोड़ा-बहुत पढ़ा है मैंने। व्यक्तिगत जीवन में उनसे कुछ लेना-देना नहीं है। वे लेखन और उम्र में मुझसे बड़े हैं। यह शिष्टाचार मैं निभाता हूं। इसीलिए पुरस्कार मिला तो मैंने फोन करके उन्हें बधाई दी। वे प्रसन्न हुए। प्रसन्न मैं भी हुआ। इसलिए नहीं कि शाह कोई महान लेखक हैं, इसलिए कि एक आदमी जो लगभग पांच दशक से कलम घसीट रहा है, उसका सम्मान हुआ- देर से सही। यह ठीक है कि वह अलग रंग का लेखक है, लेकिन है तो साहित्य की दुनिया का ही आदमी।

ऐसे अवसर पर जबकि वैचारिक मतभेदों को भुला कर बधाई देने का शिष्टाचार है, कुछ लोगों ने न सिर्फ इसे साहित्य का अपमान बताया, बल्कि शाह को एक ‘घटिया’ और ‘वाहियात’ लेखक भी कहा। इतना ही नहीं, अपने फेसबुक मित्रों द्वारा शाह को दी गई गाली को पसंद भी किया। उनकी कहानी, कविता, आलोचना, उपन्यास आदि पर बहस करने की जगह उनकी धार्मिकता पर चर्चा होती रही। यह कैसी हिंदी संस्कृति बन रही है! यह नए जमाने की तथाकथित क्रांतिकारी और मार्क्सवादी आलोचना का नमूना है या आभासी दुनिया की तुरंता और अविचारित कार्रवाई, समझ में नहीं आता!

सिर्फ बयान देकर किसी लेखक को घटिया या सांप्रदायिक बताना एक असाहित्यिक कदम है। जो ऐसा बयान देते हैं, उन्हें लिख कर बताना चाहिए कि शाह क्योंकर घटिया और सांप्रदायिक लेखक हैं। उन्हें यह भी बताना चाहिए कि वे कौन-सी चीजें हैं, जिनके कारण कोई लेखक घटिया या उम्दा होता है। किसी को महान या घटिया कहना एक बयान भर कहलाएगा। बयान को तथ्य आधारित होना चाहिए। एजरा पाउंड के अनुसार बयान एक चेक भर है, आप जब चेक काटते हैं तो आपके खाते में उतना पैसा भी होना चाहिए। शाह प्रथमत: और अंतत: लेखक हैं, कोई धार्मिक प्रवक्ता नहीं। उनका अखाड़ा साहित्य है, उनसे लड़ाई उस अखाड़े में ही हो सकती है। आलोचना अगर साहित्य का विवेक है, तो शाह के आलोचकों से यह अपेक्षा है कि वे उस विवेक के तहत साहित्य के अखाड़े में ही उनका मूल्यांकन करें।

शाह के उपन्यासों में ‘गोबर गणेश’ मुझे अच्छा लगता है। हिंदी का महान भले नहीं, पर उल्लेखनीय उपन्यास है। उसमें रचनात्मक ताजगी है। शाह की कहानियों में अपने ढंग की सामाजिकता है, सांप्रदायिक सद्भाव और वंचितों के लिए संवेदना भी है। छायावाद और ‘प्रसाद’ पर लिखी उनकी आलोचना महत्त्वपूर्ण है। शाह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न समर्पित लेखक हैं। उन्होंने विपुल मात्रा में लिखा है। उसमें कुछ अच्छा भी है और कुछ सामान्य भी। मार्क्सवादियों द्वारा उपहास और उपेक्षा का पात्र बनाए जाने के कारण उनके प्रति वे सहज नहीं हैं। उनकी पसंद-नापसंद की अपनी दुनिया है। अज्ञेय, साही, निर्मल आदि को वे अधिक महत्त्व देते हैं। वे गांधी, अरविंद, लोहिया आदि के विचारों को अधिक पसंद करते हैं। एक लेखक के रूप में मार्क्सवादी लाइन को नकारने और दूसरी लाइन को चुनने का अधिकार उन्हें है। लोकतंत्र में उन्हें यह अधिकार मिलना ही चाहिए।

साहित्य का यह कैसा लोकतंत्र है कि जिसमें अपनी धारा से विपरीत लेखक के लिए जगह नहीं है? मैं उस दिन की कल्पना नहीं कर सकता, जब हिंदी साहित्य में जैनेंद्र, अज्ञेय, रेणु, साही, निर्मल आदि नहीं होंगे। यह कैसी मार्क्सवादी समझ है, जो हिंदी की विविधता से भरी समृद्धि को खत्म करने पर उतारू है? शाह से उम्र में छोटे और लेखन में भी कमतर लोगों को पुरस्कार मिल चुका है। कई वरिष्ठ और श्रेष्ठ लोग तब भी छूट गए थे। तब उन वरिष्ठों के लिए हंगामा क्यों नहीं मचाया गया? क्या इसलिए चुप्पी साध ली गई कि जो पुरस्कृत हो रहे थे, वे अपनी ‘राजनीतिक धारा’ के मेल में थे?

शाह अज्ञेय की तरह ‘ट्रेंड-सेटर’ लेखक नहीं हैं। ट्रेंड सेटर लेखक तो यशपाल भी नहीं थे। इससे न तो यशपाल का महत्त्व कम होता है और न शाह का। यशपाल ने एक तरह की साहित्यिक धारा का विकास किया, तो शाह ने दूसरी साहित्यिक धारा का। शाह पर आरोप उनके धार्मिक-सांप्रदायिक रुझान का है। मैंने जहां तक पढ़ा है, उन्हें वैसा नहीं पाया। सांप्रदायिक सद्भाव सिर्फ मार्क्सवादी लेखकों का नहीं, शाह सरीखे गैर-मार्क्सवादी लेखकों का भी मुख्य एजेंडा है। शाह के पुरस्कृत होने पर नित्यानंद तिवारी समेत अनेक वामपंथी रुझान के वरिष्ठ लेखकों से मेरी बातचीत हुई। उन सबने अकादेमी के इस निर्णय का स्वागत किया। जिन्हें शाह के पुरस्कृत होने पर आपत्ति है, उन्हें फतवा जारी करने के पहले इस पर अपने वैचारिक हलके में ही रायशुमारी करा लेनी चाहिए।

 

 

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