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वक्त की नजर: नतीजों के संकेत

मोदी सरकार के लिए राजनीतिक मौसम अब इतना खराब होने लगा है कि सोनिया गांधी के हौसले बुलंद हो गए हैं एक मुद्दत के बाद। खूब आत्मविश्वास के साथ उन्होंने मुंबई स्थित इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में कहा कि ‘अच्छे दिन’ का नारा कांग्रेस के लिए 2019 में वही काम करेगा जो ‘शाइनिंग इंडिया’ यानी ‘उज्ज्वल भारत’ ने 2004 में किया था।

Author March 18, 2018 3:39 AM
कांग्रेस की राष्ट्रीय अक्ष्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद मोदी। (फाइल फोटो)

गोरखपुर और फूलपुर के नतीजे क्या नरेंद्र मोदी के लिए इब्तिदा-ए-अंत का संकेत दे रहे हैं? क्या योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री नियुक्त करना बहुत बड़ी गलती थी? खासतौर पर उस समय जब मतदाता स्पष्ट कर रहे थे कि उनको परिवर्तन और विकास चाहिए? सो, जब परिवर्तन और विकास के बदले रोमियो स्क्वॉड घूमने लगे और गौरक्षा के नाम पर बेरोजगारी बढ़ने लगी कई उद्योगों में, तो क्या नौजवानों में बेचैनी बढ़नी तय नहीं थी? मोदी सरकार के लिए राजनीतिक मौसम अब इतना खराब होने लगा है कि सोनिया गांधी के हौसले बुलंद हो गए हैं एक मुद्दत के बाद। खूब आत्मविश्वास के साथ उन्होंने मुंबई स्थित इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में कहा कि ‘अच्छे दिन’ का नारा कांग्रेस के लिए 2019 में वही काम करेगा जो ‘शाइनिंग इंडिया’ यानी ‘उज्ज्वल भारत’ ने 2004 में किया था। तब एक भी राजनीतिक पंडित नहीं था, जिसने अटल बिहारी वाजपेयी को हारते देखा हो। हम सबने तय कर लिया था कि सोनिया गांधी, जो उस समय हिंदी भी मुश्किल से बोलती थीं, किसी हाल में अटलजी का मुकाबला नहीं कर सकती हैं। अटलजी के सलाहकारों को भी ऐसे ही लगा होगा कि उन्होंने ‘उज्ज्वल भारत’ का नारा देकर अपने प्रधानमंत्री को चुनावी युद्धभूमि में भेजा।

भारत में एक नई उज्ज्वलता बेशक दिल्ली से दिखी होगी उस साल, लेकिन देहातों में जब गरीब जनता और बेरोजगार नौजवानों के कानों तक बात पहुंची कि भारत अब उज्ज्वल हो चुका है तो उनको इतना बुरा लगा कि अटलजी जैसे काबिल, उदारवादी प्रधानमंत्री को भी उन्होंने उखाड़ फेंका। सो, सोनियाजी गलत नहीं हैं जब वे कहती हैं कि ‘अच्छे दिन’ का नारा भी ऐसा काम कर सकता है मोदी के लिए 2019 में क्योंकि कड़वा सच यह है कि ‘अच्छे दिन’ बहुत कम भारतवासी देख रहे हैं अभी तक। देहातों में जब घूमती हूं तो गांव-गांव दिखते हैं बेरोजगार नौजवानों के वह झुंड जो पहले दिखा करते थे। किसान इतनी तकलीफ में हैं कि पचास हजार से ज्यादा किसान दो सौ किलोमीटर पदयात्रा करके मुंबई आए थे पिछले हफ्ते मुख्यमंत्री के सामने अपनी कठिनाइयों को रखने। मुंबई में बड़े उद्योगपति नाखुश हैं, क्योंकि जिन आर्थिक सुधारों की उम्मीद से उन्होंने मोदी का समर्थन किया था, वे अभी तक आए नहीं हैं। लेकिन मोदी के मंत्री छाती चौड़ी करके कहते फिरते हैं कि भारत में बिजनेस करना आसान हो गया है। रही बात छोटे कारोबारियों की तो नोटबंदी और जीएसटी की उलझनों में अभी तक फंसे पड़े हैं। ऊपर से समस्या यह है कि जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनी हैं पिछले चार वर्षों में, उनमें गौरक्षकों और हिंदुत्ववादियों ने ऐसी हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया है जिन्होंने भारत को कलंकित किया है। पिछले महीने जब न्यूयॉर्क में थी तो मुझे विदेश नीति के कुछ विशेषज्ञ मिले, जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनको चिंता है कि भारत अब पाकिस्तान जैसा देश बनता जा रहा है। यानी कट्टरपंथियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती दिखने लगी है। जिन देशों में लोगों को जिंदा जला दिया जाता है सिर्फ इसलिए कि उनका नाम अफराजुल या पहलू खान है, उन देशों में निवेशक आने से डरते हैं। सो विदेशी निवेशक भारत आए तो हैं मोदी के दौर में, लेकिन नए उद्योग लगाने नहीं और न ही अपने उद्योगपति निवेश कर रहे हैं बड़े पैमाने पर। सो कहां से आएंगे ‘अच्छे दिन’?

इन सबके बावजूद अगर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता निजी तौर पर अभी भी कायम है तो इसलिए कि आम लोग आज भी उनको ईमानदार और सच्चे राजनेता मानते हैं। सो अपना गुस्सा, अपनी निराशा निकालते हैं उन मुख्यमंत्रियों पर, जिन्होंने परिवर्तन और विकास के नाम पर कुछ नहीं किया है। मोदी की लोकप्रियता इसलिए भी काफी हद तक कायम है कि दूसरी तरफ जब देखते हैं तो उनके मुकाबले में दिखते हैं राहुल गांधी, जिनको प्रधानमंत्री बनते बहुत कम लोग देखते हैं। लेकिन जब मुकाबला योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव या मायावती के बीच होता है तो बात कुछ और हो जाती है। इसलिए कि विकास और परिवर्तन लाने में इन दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों ने उत्तर प्रदेश के लिए ज्यादा करके दिखाया है। उनके कार्यकाल में ‘एक्सप्रेस वे’ बने हैं जो पूरे देश के लिए मिसाल हैं। योगी के दौर में अभी तक ज्यादा चर्चा रही है हिंदुत्ववादियों की हरकतों की।

विकास के नाम पर योगी ने अवैध बूचड़खानों को बंद करने की मुहिम छेड़ी सत्ता में आते ही। लेकिन इस मुहिम के चलते कई दलितों और मुसलमानों की नौकरियां गर्इं, क्योंकि मांस उद्योग और चमड़ा उद्योग में आमतौर यही काम करते हैं। ऐसा भी नहीं है कि सवर्ण हिंदुओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हो गए हों। सो गोरखपुर और फूलपुर के मतदाता प्रधानमंत्री को एक संदेश भेज रहे हैं। संदेश यह है कि चुनावी तौर पर जो राज्य सबसे महत्त्वपूर्ण है, वहां हाल अच्छा नहीं है। मोदी को उत्तर प्रदेश से अस्सी में से तिहत्तर लोकसभा सीटें नहीं मिलतीं 2014 में तो किसी हाल में उन्हें पूर्ण बहुमत नहीं मिल सकती थी। उत्तर प्रदेश से जो नतीजे आए पिछले सप्ताह, उनमें गंभीर संदेश है मोदी के लिए। भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता गोरखपुर और फूलपुर में हारने की वजह सिर्फ मायावती और अखिलेश यादव का इकट्ठा हो जाना बताते हैं। लेकिन या तो उनकी राजनीतिक समझ कम है या सच का सामना करना नहीं चाहते हैं। सच तो यह है कि उत्तर प्रदेश के लोगों ने परिवर्तन और विकास की उम्मीद से भारतीय जनता पार्टी को जिताया 2014 के लोकसभा चुनाव में और पिछले वर्ष के विधान सभा चुनावों में भी। लेकिन उनको मिला है अभी तक सिर्फ हिंदुत्व और एक कट्टरपंथी हिंदू मुख्यमंत्री।

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