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वक्त की नजर: किसका साथ, किसका विकास

गौरक्षा के नाम पर ऐसा आतंक फैल चुका है देश में कि गायों का पालना मुश्किल हो गया है, क्योंकि उनको खरीद कर घर लाने वालों को गौरक्षकों ने सरेआम मार डाला है इतनी बार। डर और हिंसा का माहौल बन गया है और प्रधानमंत्री मौन रहे हैं। बावजूद इसके कि उन्होंने वादा किया था- ‘सबका साथ, सबका विकास’ का।

Author December 30, 2018 3:34 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फाइल फोटो।

पुराने साल का जाना, नए साल का आना जश्न माना कर स्वागत करते हैं हम। इस बार जश्न का माहौल नहीं है मेरे जैसों के लिए, जिनका काम है भारत की राजनीति पर लिखना। इसलिए कि 2019 में जो आम चुनाव आने वाला है, उसमें दोनों तरफ दिख रहे हैं मायूस करने वाले विकल्प। एक तरफ हैं नरेंद्र मोदी। लेकिन वह नरेंद्र मोदी नहीं, जिनको 2014 में पूर्ण बहुमत से हमने जिताया था। इनको परिवर्तन और विकास का मसीहा समझ कर। अब थोड़े थके, हारे-से मोदी दिखने लगे हैं, क्योंकि जिन क्षेत्रों में परिवर्तन आना चाहिए था, वहां आया नहीं है और जहां परिवर्तन नहीं आना चाहिए था वहां एक हिंसक, डरावना परिवर्तन आया है।

मैंने नरेंद्र मोदी का समर्थन 2014 में किया था इस उम्मीद से कि देश की आर्थिक दिशा वास्तव में बदल कर दिखाएंगे। आधी उम्र गुजरी है मेरी उस जमाने में जब अर्थव्यवस्था पूरी तरह सरकार के हाथों में थी नेहरू जी की समाजवादी आर्थिक नीतियों के कारण। सो डालडा, दूध, डबल रोटी, चीनी- सब सरकारी कारखानों से मिलती थीं। सरकारी अफसर बिजनस में अक्सर नालायक होते हैं। सो, इन चीजों का हमेशा घाटा रहा करता था। बिजनेस में व्यस्त रहते थे हमारे शासक, सो शासन पर ध्यान नहीं दे पाते थे और बिजली, पानी जैसी बुनियादी जरूरतें भी आम भारतीय को दे नहीं पाए थे। इसलिए जब मोदी ने 2014 में कहा कि सरकार का काम नहीं होना चाहिए बिजनस करना तो मुझे उनकी बातें बहुत अच्छी लगीं। अफसोस के पिछले चार वर्षों में उन्होंने सरकारी कारखानों और कंपनियों के निजीकरण की बात तक नहीं की है। आर्थिक दिशा आज भी वही है जो 2014 में थी। मैं मानती हूं कि सबसे जरूरी राजनीतिक परिवर्तन यह होना चाहिए कि जनप्रतिनिधि और सरकारी अफसर अपने आपको जनता के सेवक मानना सीखें, ताकि सेवा का भाव रहे उनमें, राज करने का नहीं। उम्मीद थी कि मोदी चूंकि अपने आपको प्रधानसेवक मानते हैं तो उनके मंत्रियों और मुख्य मंत्रियों में विनम्रता दिखने लगेगी, सत्ता की शान नहीं। ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ है और न ही परिवर्तन आया है प्रशासनिक तरीकों में। परिवर्तन आया है तो सिर्फ यह कि गौरक्षा के नाम पर ऐसा आतंक फैल चुका है देश में कि गायों का पालना मुश्किल हो गया है, क्योंकि उनको खरीद कर घर लाने वालों को गौरक्षकों ने सरेआम मार डाला है इतनी बार। डर और हिंसा का माहौल बन गया है और प्रधानमंत्री मौन रहे हैं। बावजूद इसके कि उन्होंने वादा किया था- ‘सबका साथ, सबका विकास’ का।

मोदी का जादू कम हो गया है तो जरा विकल्प तो देखिए। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जीतने के बाद राहुल गांधी ऐसे पेश आने लगे हैं जैसे कि प्रधानमंत्री बन गए हों। असली प्रधानमंत्री को हुकुम देने लग गए हैं। किसानों के कर्ज माफ करो देश भर में अभी। इस आदेश में छिपी है उनकी आर्थिक समझ। किसानों के कर्ज माफ हो गए देश भर में तो ग्रामीण भारत में विकास के कार्यों के लिए पैसे कहां से आएंगे? किसानों की असली समस्या है कि खेती से अब मुनाफा कमाना मुश्किल हो गया है, क्योंकि खेत बहुत छोटे हो गए हैं। नए रोजगार के अवसर पैदा नहीं हुए हैं। राहुल गांधी अभी तक अपने बल पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं हैं, सो उनको निर्भर होना पड़ेगा ऐसे राजनीतिक दलों पर जिनकी आर्थिक सोच भी पुराने समाजवादियों की है। यह आर्थिक सोच नाकाम रही है दुनिया भर में। ऊपर से परिवारवाद इन राजनीतिक दलों में इतना है कि हमारे तकरीबन सारे विपक्षी दल निजी कंपनियों में तब्दील हो गए हैं, जिनको चलाते हैं राजनीतिक वारिस। ये आमतौर पर ऐसे वारिस हैं जो राजनीति में आए हैं पैसा कमाने, देश की सेवा करने नहीं। अगले आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी अगर मोदी के बल पर नहीं जीत पाती है और सरकार बनती है खिचड़ी किस्म की तो पहली लड़ाई होगी प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए। उसके बाद झगड़े होंगे उन मंत्रालयों को लेकर जिनको एटीएम मंत्रालय कहा जाता है। इन मंत्रालयों को हासिल करके कई मंत्रियों का आर्थिक हाल बदला है।
राहुल गांधी के साथ जितने भी राजनीतिक दल खड़े हैं, इकट्ठा हुए हैं ‘सेक्युलरिज्म’ के बहाने। साफ कहते हैं कि मोदी को हटाना जरूरी है, क्योंकि उन्होंने साबित कर दिया है कि वे देश के सेक्युलर चरित्र को समाप्त करके भारत को हिंदू राष्ट्र में तब्दील करना चाहते हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने 2014 में भी कहा था कि मोदी कोई परिवर्तन और विकास नहीं लाना चाहते थे और उनका असली मकसद था हिंदुत्व फैलाना और आज भी है, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हाथों में मोदी सिर्फ एक मोहरा हैं।

काश कि पिछले चार वर्षों में मोदी ने राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तन लाकर दिखाया होता कि यह झूठ है। काश कि भीड़ के हाथों पहली ‘लिंचिंग’ के बाद ही उन्होंने स्पष्ट किया होता कि ऐसी हिंसा से उनको नफरत है। ऐसा करने के बदले उन्होंने मौन रहना पसंद किया। अगले आम चुनाव में ऐसा लगने लगा है कि इसका खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा। उनके समर्थक भी अब मानते हैं कि पूर्ण बहुमत नहीं आने वाली है दोबारा, लेकिन 220 सीटें भी मिल जाती हैं भारतीय जनता पार्टी और उनके सहयोगी दलों को तो मोदी फिर से बन सकेंगे प्रधानमंत्री। सवाल यह है कि क्या कमजोर प्रधानमंत्री बन जाने के बाद शासन संभाल पाएंगे मोदी या नहीं! सो, जब दोनों तरफ दिखता है ऐसा राजनीतिक भविष्य जिसमें रोशनी की छोटी-सी किरण नहीं नजर आती है, नए साल का जश्न कैसे मना सकते हैं मेरे जैसे राजनीतिक पंडित? फिर भी नया साल शुरू होने वाला है इसलिए शुभकामनाएं नववर्ष की।

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