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वक्त की नजर : निजीकरण की जरूरत

बैंकों के निजीकरण के साथ प्रधानमंत्री को उन सरकारी कंपनियों के निजीकरण के बारे में भी सोचना चाहिए, जो शुरू से घाटे में चल रही हैं। ऐसा अगर अभी तक किसी पूर्व प्रधानमंत्री ने नहीं किया है तो शायद इसलिए कि इन सरकारी कंपनियों और बैंकों से फायदा अगर हुआ है किसी का तो हमारे आला अधिकारियों का।

Author February 25, 2018 04:46 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो-पीटीआई)

नीरव मोदी के बारे में हम बहुत कुछ जान गए पिछले हफ्ते। उनके आलीशान घर देख लिए हैं, उनकी सुंदर दुकानें देख ली हैं और यह भी जान गए हैं कि दुनिया के कौन-से शहरों में ये दुकानें हैं। हमने उनकी महंगी विदेशी गाड़ियां देख ली हैं और यह भी मालूम है हमें कि जब उनके घर में डिनर पर लोगों को बुलाया जाता था तो उनकी पत्नी सूप में थर्मामीटर डाल कर देखती थीं कि ज्यादा गरम तो नहीं है मेहमानों के लिए। मेहमान उनके बॉलीवुड और हॉलीवुड के सितारे हुआ करते थे, आला अधिकारी हुआ करते थे और कुछ राजनेता भी। यह भी जान गए हैं हम कि न्यूयॉर्क में वे कहां रहते हैं। यह सारी जानकारी हमको मिली है मेरे पत्रकार बंधुओं की खोजी पत्रकारिता के जरिए। लगे रहे हैं मेरे बंधु इस काम में दिल लगा कर, जबसे खबर मिली कि नीरव साहब और उनके मामा मेहुल चोकसी, हजारों करोड़ रुपयों के कर्जे छोड़ कर भाग गए हैं अपने इस भारत महान से।

ऐसा अगर वास्तव में उन्होंने किया है, तो जितनी जल्दी उनको दंडित किया जाता है उतना अच्छा होगा, क्योंकि पैसा इस देश की गरीब जनता का है, हम आप का है, जो हमने सरकारी बैंकों में पूरा भरोसा रख कर जमा किया था। लेकिन जो बात मुझे समझ में नहीं आती वह यह कि मेरे पत्रकार बंधुओं ने उतनी ही मेहनत करके हमें क्यों नहीं बताया है अभी तक कि वे अधिकारी कौन हैं, जिन्होंने सरकारी बैंकों का इतना खस्ता हाल कर रखा है कि नीरव मोदी जैसे लोग आराम से उनको लूट सकते हैं। एक-दो अखबारों में यह खबर छपी जरूर कि नीरव मोदी ने मुट्ठी भर लोगों को रिश्वत देकर ऐसी स्थिति बना ली थी अपने लिए कि हजारों करोड़ रुपए लौटाए बिना ही उसे हजारों करोड़ रुपए और लेने की सुविधा उपलब्ध हो गई थी। ऐसा अगर हुआ था तो क्या हमको उन अधिकारियों के चेहरों से वाकिफ नहीं हो जाना था अभी तक? उनके घर कहां हैं, कैसे हैं? उनकी बीवियों के गहने कैसे हैं? उनके बच्चे कहां पढ़ते हैं? उनके पास भी क्या विदेशी गाड़ियों के काफिले हैं? ये सारे सवाल पूछे जाने चाहिए थे, लेकिन हम अक्सर पूछते नहीं हैं, क्योंकि हमारी समाजवादी मानसिकता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि हम सरकारी अधिकारियों को देश के चौकीदार मानते हैं। राजनेताओं का भ्रष्टाचार पकड़ने के लिए हम खूब कोशिश करते हैं, लेकिन सरकारी अधिकारी तभी पकड़े जाते हैं जब उनके ही कोई साथी उनकी शिकायत करते हैं आयकर विभाग में। लेकिन इस मामले में क्या बैंकों के अधिकारी उतने ही दोषी नहीं हैं, जितने नीरव मोदी खुद हैं?

वित्तमंत्री ने पिछले हफ्ते स्वीकार किया कि आरबीआइ ने लापरवाही दिखाई होगी जो इतनी बड़ी चोरी पहले नहीं पकड़ी गई थी। लेकिन इस बार मंत्रीजी, यह काफी नहीं है। आपको यह भी बताना होगा हमें कि अभी तक सरकारी बैंकों के निजीकरण की चर्चा तक क्यों नहीं हो रही है। उनका राष्ट्रीयकरण चालीस वर्ष पहले भी विवादों में घिरा रहा था, क्योंकि कई राजनीतिक पंडितों को विश्वास था कि इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए किया था यह, देश के आर्थिक हित के लिए नहीं। ऐसा पिछले चालीस वर्षों में साबित हो चुका है। बहुत पहले मालूम हो गया था कि सरकारी बैंकों का बुरा हाल है। कांग्रेसी प्रधानमंत्री बैंकों की बीमारी का इलाज ढूंढ़ने की कोशिश भी नहीं कर सकते थे, क्योंकि ऐसा करते तो कबूल करना पड़ता कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके इंदिरा गांधी ने बहुत बड़ी गलती की थी, जिसका खमियाजा आज तक देश भुगत रहा है। लेकिन नरेंद्र मोदी क्यों नहीं अभी तक खुल कर स्वीकार कर पाए हैं कि सरकारी बैंकों का इतना बुरा हाल है कि इलाज एक ही बच गया है अब और वह है इनका निजीकरण इनका। कम से कम चर्चा तो शुरू हो जानी चाहिए। इसके बारे में जब भी मैंने दिल्ली के आला अधिकारियों से बात की है, तो उनका जवाब यही होता है कि प्रधानमंत्री ऐसा करना चाहते हैं, लेकिन ऐसा तभी हो पाएगा जब थोड़ा-बहुत सुधार आ जाएगा बैंकों की हालत में। इस हाल में इनको कौन खरीदेगा जी?

बात सही भी है, लेकिन चर्चा तो शुरू हो जानी चाहिए थी अभी तक। मोदी की निजी छवि अब भी बेदाग है और उनकी लोकप्रियता भी कायम है, सो उनसे अच्छा राजनेता नहीं मिल सकता है इस देश को आर्थिक सुधारों की दिशा में ले जाने के लिए। जब देश भर में किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं कर्जों की वजह से क्यों मुश्किल होगा उनको समझाना कि बैंकों ने उनके साथ- और देश के साथ भी- बहुत बड़ा धोखा किया है। न राष्ट्रीयकरण का लाभ उनको मिला है और न ही देश को, इसलिए जरूरी हो गया है उनका निजीकरण। रही बात जन-धन खातों की, तो एक-दो बैंक रखे जा सकते हैं सार्वजनिक क्षेत्र में, जहां ऐसे खाते खुल सकते हैं और जहां से सरकारों की बड़ी-बड़ी समाज कल्याण योजनाओं के लिए ऋण लिया जा सकता है। बैंकों के निजीकरण के साथ प्रधानमंत्री को उन सरकारी कंपनियों के निजीकरण के बारे में भी सोचना चाहिए, जो शुरू से घाटे में चल रही हैं। ऐसा अगर अभी तक किसी पूर्व प्रधानमंत्री ने नहीं किया है तो शायद इसलिए कि इन सरकारी कंपनियों और बैंकों से फायदा अगर हुआ है किसी का तो हमारे आला अधिकारियों का। बिना कुछ निवेश किए, बिना किसी कारोबार को सफलता से चलाए ये लोग रहते हैं तकरीबन उसी शान से जो नीरव मोदी के जीवन की झलक में हमने देखा पिछले हफ्ते।

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