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मिथक और मानस रचना

हाल के बीते इतिहास में भी कई देवी-देवताओं के मिथक जो सुप्त थे, जागृत हो कर हमारी जीवन शैली का ऐसा हिस्सा बन गए हैं।
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हाल के बीते इतिहास में भी कई देवी-देवताओं के मिथक जो सुप्त थे, जागृत हो कर हमारी जीवन शैली का ऐसा हिस्सा बन गए हैं कि लगता है वे वैदिक काल की ही देन हैं। ये समाज से ही उपजे नए मिथक हैं और हमारे मानस की रचना शक्ति के अद्भुत उदाहरण हंै।

बचपन में मैंने सैकड़ों रातें अपनी दादी की गोद में लेट कर परियों की कहानियां सुनते हुए बिताई हैं। यह लगभग रोज का क्रम था। खाना खत्म होते ही वे आ जाती थीं और फिर एक लंबी कहानी सुनाती थीं। मैं कभी कहानी सुनते-सुनते सोता नहीं था। उनकी पूरी कहानी सुनता था और फिर वे बड़े दुलार से मुझे अपने बिस्तर पर छोड़ आती थीं। जाते-जाते वे सिर पर हाथ फेर कर कहती थीं, बेटा राजा ने ऐसा क्यों किया, रात में सोचना और देर-सबेर जब मौका मिले ऐसा ही करना।
कहानियां राजा-रानियों या फिर परियों की हों, सबमें जीवन का कोई सत्य पात्रों के मन में दुविधा उत्पन्न करता था और अंत में उस दुविधा का निराकरण होता था। दादी की इन कहानियों में से बहुत कम की मुझे याद है, पर उनसे उपजे संदेश शायद मेरी सोच का एक बड़ा हिस्सा बन गए हैं। इनसे मुझे कई जीवन-सत्य वरदान के रूप में मिले हैं।
जब मैं थोड़ा उम्रदार हुआ, तो बड़ों के मिथकों से मेरा परिचय मेरे पिता ने कराया- त्योंहारों के जरिए। हमारे यहां बहुत सारे पर्व बड़े उत्साह से मनाए जाते थे। यह पर्व मक्कर संक्रांति से शुरू होते थे, वसंत उत्सव, शिव रात्रि, रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी आदि होते हुए क्रिसमस पर खत्म होते थे। होली और दिवाली पर तो विशेष धूम-धड़ाका होता था, पर इस सबसे पहले एक कहानी होती थी, जो हम सब एक साथ बैठ कर सुनते थे। दुर्गा मैया के रूपों की कहानियां, कृष्ण जन्म का किस्सा या फिर राम-रावण युद्ध का वर्णन पूरे परिवार को आनंदित कर देता था। सारी कहानियां हम सबको कंठस्थ थीं, पर फिर भी हर साल उनको सुनना एक नया अनुभव-सा लगता था। इन्हीं कहानियों ने हमारे मानस में वे मिथक उतार दिए, जिनसे हम अपने को आज परिभाषित करते हैं।
मिथक लगभग सभी समाजों का जरूरी हिस्सा हैं। उनके बिना कोई भी समाज एक डोर में नहीं पिरोया जा सकता। एक तरह से मिथक समाज की प्राणवायु हैं- उन्हीं से उसमें सकारात्मक आंदोलन उत्पन्न होता है। ये प्रेरणा सोत्र भी हैं, जो हमें अपने पूर्वजों और उनके कल्पित या वास्तविक इतिहास से जोड़ते हैं।
वास्तव में किसी भी पुरानी सभ्यता का प्रतीक चिह्न मिथक ही हैं। भारत में तो इनका बाहुल्य है, पर दुनिया के हर देश में- सरल जनजातीय समाज से लेकर भव्य संस्कृतियों तक- मिथक प्रचलित हैं। उन्हीं के आधार पर जन समूह अपनी पहचान को परिभाषित करता है। खानपान के तौर-तरीके, सामाजिक मूल्य, धार्मिक पद्धतियां, पहनावा, साहित्य और कला आदि सब इन्हीं मिथकों से उपजे हैं और उन्हीं में समाते हैं। रोचक बात यह है कि लगभग सभी मिथकों का इतिहास ठोस तरीके से स्थापित नहीं किया जा सकता, पर उनसे निकले क्रियाकलापों की खोज जरूर संभव है।
हिंदुस्तान के आलावा, मिस्र, ग्रीस, रोम, चीन, माया संस्कृतियां ऐसी हैं, जो मिथकों के आधार पर रची गई हैं। देवी-देवताओं का वर्णन और उनके प्रति घोर श्रद्धा इन सभी संस्कृतियों के आधारभूत स्तंभ थे। वास्तव में कोई भी धर्म या व्यापक जीवन-शैली ऐसी नहीं है, जिसके पीछे कोई बड़ा मिथक न खड़ा हो। कई धर्म तो ऐसे हैं, जिनका मिथक तो एक है, पर उस पर अमल अलग-अलग है।
पर क्या आज की तारीख में नए मिथक बन सकते हैं? क्या हमारे समाज चले आ रहे मिथकों पर मिट्टी डाल कर मौजूदा परिस्थियों को उस तरह परिभाषित कर सकते हैं कि अल्पकाल में ही नए मिथक बन जाएं, जो वर्तमान को समझने और निपटने में सक्ष्म हों? और अगर ऐसा नहीं हो सकता, तो क्या हम पुराने मिथकों को ही और मजबूत कर सकते हैं या फिर उनको विसर्जित ही क्यों न कर दें? बिना मिथक को जीए।
वैसे अपने काल में चलते हुए मिथकों को पुन: गढ़ा जा सकता है और उनको वर्तमान देश और काल से जोड़ा जा सकता है। भारत में ऐसा होता आया है, जबकि और जगह यह संभव नहीं हो पाया है। इसके कई उदाहरण हैं- ग्रीस और मिस्र के मिथक प्रचलन में सैकड़ों सालों से नहीं हैं। नए अविष्कार और जीवन शैलियां उन्हें लील गई हैं। वास्तव में यूरोप और उत्तरी अफ्रीका में पिछले एक हजार साल से कोई भी प्राचीन मिथक प्रचलित नहीं है, जबकि वहां रोम, ग्रीस और मेसोपोटामिया जैसे मिथक रचने वाली भव्य संस्कृतियां फली-फूली थीं। ईसाई और इस्लामिक धर्मग्रंथों में कुछ गिने-चुने मिथक जरूर हैं, पर बाकी सारा खजाना गर्त में चला गया है। यूरोप में आज प्राचीन मिथकों को बचाने की कोई गुंजाइश नहीं है। समाज इनसे आगे बढ़ चुका है, उसका संदर्भ बदल चुका है।
पर भारत में ऐसा नहीं हुआ है। बाल्मीकि रामायण के राजा राम को गोस्वामी तुलसीदास ने मुगल शासन काल में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का संदर्भ दिया और धनुर्धारी के रूप में पुन: स्थापित किया था। महाभारत के श्रीकृष्ण के अलग-अलग रूपों को लेकर उनको सजाया संवारा गया है, जिससे कोई कृष्ण के बाल रूप पर समर्पित है, कोई शृंगार रूप पर तो कोई उनके दार्शनिक उवाचों से प्रेरित हैं। आदि शंकराचार्य ने वैदिक ज्ञान को काल और स्थान के अनुसार वेदांत के रूप में परिभाषित किया था। ब्रह्मा, विष्णु, महेश के मिथकों को उन्होंने हमारे जीवन और दर्शन से अत्यंत सशक्त तरीके से जोड़ा था।
अभी हाल के बीते इतिहास में भी कई देवी-देवताओं के मिथक जो सुप्त थे, जागृत हो कर हमारी जीवन शैली का ऐसा हिस्सा बन गए हैं कि लगता है वे वैदिक काल की ही देन हैं। ये समाज से ही उपजे नए मिथक हैं और हमारे मानस की रचना शक्ति के अद्भुत उदाहरण हंै।
भारत के मिथकों का गोमुख वेद जरूर है, पर उनसे निकली और उनमें मिलती धाराएं हर मानव क्रिया की जीवन स्रोत बन गई हैं। सबकी अपनी विशिष्ट पहचान है, जो उतनी ही शुद्ध और निर्मल है, जितनी कि ज्ञान गंगोत्री है। मिथक से मिथक बनाना और फिर उसको प्रेम और दर्शन से जोड़ देने में भारतीय मिथकवाद की सार्थकता रही है और आज भी है।
कहानी कहना जीवंत समाज का पहला जरूरी लक्षण है। कहानी कहलवाई नहीं जा सकती। वह काल और स्थान के अनुसार अपने आप अंकुरित होती है और फिर एक बेल की तरह फैलती चली जाती है। उसका बीज शुद्ध कल्पना नहीं है, बल्कि इतिहास के मर्म का अर्क है, जिसका अमृतपान हमारी संस्कृति अविरल करती आ रही है। इसमें कट्टर मानसिकता के जरिए तट बंधन करने की कोशिश घातक है। हमें इसके विरोध में सक्रिय रहना है, जिससे नई कहानी कहने की हमारी स्वतंत्रता हमेशा बची रहे और हमारी संस्कृति की प्राणवायु कभी शिथल न होने पाए।

 

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