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विवाद : उपयोग या उपभोग

कुमार अंबुज किसी भी समस्या के निदान के लिए समन्वयवादी तरीका एक आसान रास्ता है, पर वह कितना सही है, विचार होना चाहिए। प्राय: देखा गया है कि समन्वयवाद कहीं न कहीं अवसरवाद में जाकर स्खलित होता है। इसके बरक्स जब हम किसी विचार-विशेष में भरोसा करते, किसी दृष्टि के साथ खड़े होते हैं, तो […]

Author January 4, 2015 11:45 PM

कुमार अंबुज

किसी भी समस्या के निदान के लिए समन्वयवादी तरीका एक आसान रास्ता है, पर वह कितना सही है, विचार होना चाहिए। प्राय: देखा गया है कि समन्वयवाद कहीं न कहीं अवसरवाद में जाकर स्खलित होता है। इसके बरक्स जब हम किसी विचार-विशेष में भरोसा करते, किसी दृष्टि के साथ खड़े होते हैं, तो संगठन की जरूरत पड़ती ही है। क्योंकि ‘सामाजिक दर्शन या वैचारिकता’ को आप व्यक्तिगत तौर पर लागू नहीं कर सकते, वह अपनी प्रकृति, आकांक्षा और बुनियाद में ही सार्वजनिकता की मांग करती है। न्याय, स्वतंत्रता, समता, लोकतांत्रिकता वगैरह बहुवचनीय उपस्थिति हैं। इन्हें किसी व्यापक समाज में ही घटित किया जा सकता है। तब एक संगठन चाहिए, जिसके माध्यम से वैचारिकता और उसका क्रियान्वयन संभव हो।

ऐसे तमाम सांगठनिक मंचों का उपयोग, कोई अन्य विचारधारा से संपृक्त व्यक्ति को क्यों करने देगा और क्यों करना चाहिए, इस पर बात जरूरी है। जब हमारा विचार, साहित्य, कला की समझ और एजेंडा एकदम अलग है, बल्कि कहीं-कहीं एक-दूसरे के विपरीत है, तो क्या हम एक-दूसरे को समझने के लिए मंचों का साझा करें? मंच, रचना या विचार के शिविर नहीं होते और न ही ऐसी कोई मंशा वहां होती है कि धुर-विरोधी विचार को एक लोकतांत्रिक, सुविचारित और सदाशयी जगह उपलब्ध कराई जाए। (हालांकि कुछ प्रतिष्ठित लेखक महज लोभ-लाभ के लिए उनकी तरफ आकर्षित होने लगते हैं। यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।)

उनके इन उत्सवधर्मी और लेखकविहीन आयोजनों को कुछ गरिमा और लेखकीय व्यक्तित्व मिले, इसलिए वे अनेक औसत लोगों के साथ उन सुप्रसिद्ध लेखकों को बुलाना चाहते हैं, जिनमें अधिकतर वामपंथी हैं या कहें कि दक्षिणपंथी तो कतई नहीं हैं। मगर ऐसा होता नहीं देखा गया कि इन आयोजनों में जाकर किसी वामपंथी लेखक ने प्रखरतापूर्वक दक्षिणपंथ या व्यक्तिवाद के विरोध में अपनी बात कही हो, उसे चुनौती दी हो। हां, कभी-कभी लेखकों को ऐसा भ्रम हो सकता है कि उन्हें अभिव्यक्ति की असीम स्वतंत्रता दी जा रही है, क्योंकि दक्षिणपंथी संस्थाएं सांस्कृतिक फासीवाद के शुरुआती दौर में एक घालमेली लोकतांत्रिकता का निर्माण करना चाहती हैं, जहां किसी भी तरह का विमर्श हास्यास्पद, कारुणिक या समन्वयवादी हो जाए। वे अपने खिलाफ किसी भी प्रतिरोध को नखविहीन या आपसदारी का बना देना चाहती हैं।
दरअसल, कोई अपना मंच, संगठन बनाता ही इसलिए है कि वह दूसरे से अलग, असहमत और अपने एजेंडे के साथ काम करना चाहता है। यह छुआछूत नहीं, उसकी असहमति, विरोध और अलग कार्य है। यों भी, दूसरों के मंच का उपयोग करना गहरी योजना, समझ और चतुराई की मांग करता है। उसे अनुकरणीय या आदर्श नहीं बनाया जा सकता।

बहरहाल, इस विचलन के तीन कारण हो सकते हैं:
सत्ता संरचनाओं से लाभ उठाने की नीयत। सत्तापीठों से प्रतिरोध में इच्छा की कमी और वामपंथी संगठनों की निष्क्रियता। इधर, इस तीसरी वजह से तमाम वरिष्ठ और युवतर लेखकों को वह ‘स्पेस’ उपलब्ध नहीं है, जो आज से दस-बारह साल पहले तक मुमकिन था। तब प्रलेस, जलेस, जसम के आयोजनों, गोष्ठियों की भरमार बड़े शहरों, छोटे कस्बों आदि में थी। तब अधिकतर शासकीय, स्वायत्त संस्थानों, परिषदों और अकादेमियों में भी वामपंथी या तुलनात्मक रूप से गहरा साहित्यिक ज्ञान रखने वाले लोग पदासीन थे और उनके आयोजनों में सहज, दुविधारहित शिरकत संभव थी। लेकिन आज भाजपा शासित राज्यों की संस्थाओं में पदासीन सचिवों, संपादकों, न्यासियों, अध्यक्षों का बायोडाटा देखें तो इनमें से अधिसंख्य की साहित्यिक-सांस्कृतिक विपन्नता का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। वे किसी कोटि के लेखक नहीं हैं।

अब वामपंथी रुझान वाले लेखकों के सामने संकट यह है कि वे जाएं तो जाएं कहां! लेकिन इसका समाधान यह कतई नहीं कि कहीं भी चले जाएं। समन्वयवादी, समझौतावादी हो जाएं। सच्चा समाधान तो यही होगा कि अपने वैचारिक संगठनों की सक्रियता बढ़ाई जाए। छोटे-छोटे दल बनाए जाएं, संस्थाओं की तरह काम किया जाए। या जब तक कोई सक्रिय संगठन नहीं बनता, अकेले या कुछ समानधर्मा मित्रों के साथ अपना काम जारी रखें। प्रतिबद्धता और धीरज के साथ। इधर-उधर लपलपाने से कैसे काम होगा। आप उनके मंच से फासीवाद या सांप्रदायिकता के खिलाफ कविता आदि पढ़ रहे हैं और आपके खिलाफ कुछ नहीं हो रहा है, तो जाहिर है कि अभी आप उनके रास्ते में ठीक से अवरोध नहीं बने हैं।

फासीवादी संरचनाओं में कैसे और कितनी जगह खोजी जाए, यह एक वृहत्तर रणनीति हो सकती है, लेकिन इसमें खास तरह के सामूहिक कौशल, चतुराई और विवेक की जरूरत होगी। इसलिए यहां ठहर कर सोचना होगा कि वे भला क्यों आपको जगह दे रहे हैं। जाहिर है, उनकी भी कोई रणनीति शामिल है। वे कोई भोले या उदार संगठन नहीं हैं। उनकी अपनी योजनाएं, प्रशिक्षण, आवरण, शिकारीपन और लक्ष्य हैं। अगर आप यह मान कर चल रहे हैं कि उनके मंच पर जाकर केवल आप उनका उपयोग कर रहे हैं तो इससे अधिक भोलापन कुछ नहीं हो सकता। वे अपने तात्कालिक या दूरगामी लाभ और रणनीति के तहत ही आपको बुलावा भेज रहे हैं।

उपाय यही है कि अपने वैचारिक संगठनों को मजबूत किया जाए। चंूकि हमारे संगठन या समानधर्मी लोग उतने सक्रिय नहीं रह गए हैं, इसलिए अब अन्य मंचों पर जाना मजबूरी है या यही उचित है, यह सोचना, दोहरा नुकसान करना है। हर शहर में ऐसे वरिष्ठजन की भरमार है, जो अपने उत्तर-जीवन में समन्वयवादी हो सकने के लिए तत्पर हैं। जबकि अभी दशक-दो दशक पहले ये युवा तुर्क, गुस्सैल, नाराज, आक्रामक और अपने तेवरों के लिए विख्यात थे। हालांकि अब शायद अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता है कि इनमें से अधिसंख्य दरअसल महत्त्वाकांक्षी रूप से अवसरवादी थे। पहले वामपंथी या मार्क्सवादी होने से या उनके लेखक-संगठनों में रहने से लाभ, प्रतिष्ठा, सम्मान, वगैरह मिल सकता था, सो लिया। अब उनका तर्क है कि ‘कहां कहां नहीं जाओगे’, ‘किस किस को मना करोगे’, ‘यह तो छुआछूत है’। ‘चारों तरफ अब ऐसी ही संस्थाएं हैं, ऐसे ही लोग हैं।’ ‘वे भी इसी समाज से हैं, सबसे तो अपना संबंध है।’ ‘सबको शिक्षित करना है। अपने ही जैसे लोगों के बीच में क्या बोलते रहना।’ ‘एक विशाल साहित्यिक परिवार है।’ अब ये समावेशीकरण पर जोर देते हैं, हर जगह से पैसा, चर्चा और सुविधा लेना है। सच्चाई यह है कि ये उनके मंचों का ‘उपयोग’ नहीं, ‘उपभोग’ करना चाहते हैं। फिर प्रश्न है कि आपने अपना मंच या संगठन क्यों बनाया? अगर आप बार-बार वहीं जाकर खड़े होते हैं तो फिर किसी भी तर्क का कोई अर्थ नहीं। वह शब्दाडंबर है। आपकी ‘पोजीशन’ ही अर्थवान है, वही अवस्थिति आपके विचारों का वास्तविक सूचकांक है।

यह भी कम अजीब स्थिति नहीं कि दक्षिणपंथी संस्था या सत्ता में वामपंथी रुझान का कोई लेखकनुमा अधिकारी पदस्थ होते ही आशा करने लगता है कि उसके रहते सभी वामपंथी लेखकों को इस संस्था में आना-जाना शुरू कर देना चाहिए। वह सोचता है कि यह उसकी उदारता, उसका साहस है कि वह किसी वामपंथी छवि के लेखक को आमंत्रित कर रहा है। वह उस संस्था के द्वार, बावजूद विपरीत विचार की सरकार के, वाम लेखकों के लिए भी खोले दे रहा है। ध्यान से देखें तो वह स्वयं दया का पात्र है, उसे अपनी प्रशासकीय श्रेष्ठता साबित करनी है। वह तमाम लेखकों को आमंत्रित, प्रलोभित करता है। यह दिलचस्प विडंबना है कि अनेक ‘तथाकथित प्रतिबद्ध लेखक’ वहां जाते हैं!

इसलिए कौन कहां बना रहता है, क्या करता है और किन रास्तों से गुजरता है या किन मुद्दों से कन्नी काट जाता है, ये सब बातें महत्त्वपूर्ण और निर्णायक हैं। कहीं भी, किसी भी विचार के मंच पर जाने के लिए यों किसी तर्क की जरूरत नहीं है। यह आपकी स्वतंत्रता का विषय हो सकता है, लेकिन इसे किसी सिद्धांत की ओट में ‘सही’ या ‘जरूरी’ साबित करने की कोशिश हास्यास्पद है। अगर दूसरे मंचों का उपयोग संगठित, नीतिगत, किन्हीं वैचारिक, सुनियोजित, रणनीतिक आधारों पर किया जा रहा है तो स्वागतयोग्य हो सकता है। इस रणनीति की तरफ उत्सुकता से भी देखा जा सकता है। लेकिन क्या ऐसा है? बिल्कुल नहीं।

 

 

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