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विवाद : खूब परदा है

विनीत कुमार वीरेंद्र यादव के लेख ‘पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है’ (21 दिसंबर) पर बात करने से पहले उन्हें औपचारिक बधाई देना जरूरी है। इसलिए कि हम जिस वक्त रायपुर जाकर प्रतिबद्धता की जमीन से फिसल गए, उसी वक्त वीरेंद्र यादव ने एक पवित्र पूंजी से संचालित मंच की खोज कर ली। एक ऐसा मंच, […]

Author January 4, 2015 11:35 PM

विनीत कुमार

वीरेंद्र यादव के लेख ‘पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है’ (21 दिसंबर) पर बात करने से पहले उन्हें औपचारिक बधाई देना जरूरी है। इसलिए कि हम जिस वक्त रायपुर जाकर प्रतिबद्धता की जमीन से फिसल गए, उसी वक्त वीरेंद्र यादव ने एक पवित्र पूंजी से संचालित मंच की खोज कर ली। एक ऐसा मंच, जहां अपनी सुविधा से वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ बात की जा सकती है। शायद यही कारण है कि रायपुर साहित्य महोत्सव में (उनके शब्दों में छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा आयोजित) उन्होंने जिस साहस और स्पष्टता के साथ जाने से साफ मना कर दिया, वही विनोद कुमार शुक्ल, नरेश सक्सेना, अर्चना वर्मा से लेकर नगीन तनवीर- जो अपने रंगकर्मी पिता हबीब तनवीर के साथ छत्तीसगढ़ की फासीवादी ताकतों को चुनौती देते रहे- नहीं कर सके।

लेकिन उसी दौरान (12-14 दिसंबर) वीरेंद्र यादव पवित्र पूंजी से संचालित जिस मंच पर पधारे, उन्होंने उसकी चर्चा अपने पाठकों से करना बिल्कुल जरूरी नहीं समझा। अब भी फेसबुक वॉल पर रायपुर महोत्सव को लेकर प्रतिक्रियाएं जारी हैं, लेकिन वहां वीरेंद्र यादव की शिरकत को लेकर चुप्पी है। क्या यह अकारण है?
वीरेंद्र यादव ने इस पवित्र मंच से युवा और साहित्य को लेकर जो कहा, अगर उसकी कहीं चर्चा नहीं की और उनकी दिलचस्पी रायपुर में लोगों ने क्या बोला, जाने-सुने बिना फरमान जारी करने में रही, तो इसमें क्या आश्चर्य! मगर किसी कार्यक्रम में शामिल होने भर से अगर किसी लेखक की प्रतिबद्धता तय होती है, तो फिर जरूरी है कि लेखक के वक्तव्य पर बात करने के बजाय पूरी ताकत उस मंच के डीएनए टेस्ट में लगा दी जाए।

वीरेंद्र यादव ने फासीवादी सरकार के रायपुर साहित्य महोत्सव जैसे आयोजन के बजाय फासीवादी मीडिया को चुना और हमने रायपुर जाना तय किया तो इसके पीछे वीरेंद्र यादव जैसा कोई वैचारिक आग्रह नहीं था। बात बस इतनी थी कि रायपुर के मुकाबले सात-आठ दिन की सूचना पर लखनऊ जाकर बोलने की योग्यता हम नहीं रखते। मगर क्या निजी सुविधा से किए गए हमारे व्यक्तिगत फैसले को उतनी ही स्पष्टता से कॉरपोरेट फासीवादी मीडिया का विरोध कहा जाएगा, जितनी सफाई से वीरेंद्र यादव के मना कर देने को दर्ज किया गया!

फासीवादी सरकार की जगह कॉरपोरेट फासीवादी मीडिया को चुनना और यह जानते हुए कि फासीवादी सरकार का आयोजन है, हां कह कर फिर मना करना, इन दोनों स्थितियों में अपने को प्रतिबद्ध करार देने का जो सुख है, क्या साहित्य की जमीन इसी से बची रह जाएगी? यह बहस उस दिशा में भी बढ़ेगी जहां ‘‘आत्मावलोकन और आत्मालोचना की ईमानदार कोशिश’’ के तहत फैसले करने के बावजूद फिसलन बरकरार रह जाती है?

यह सच भला किससे छिपा है कि जिस कॉरपोरेट घराने ने संवादी कार्यक्रम शुरू किया है, उसने छत्तीसगढ़ तो छोड़िए, देश भर में फासीवादी ताकतों, हिंदुत्ववादी रुझान की एकतरफा रिपोर्टिंग और पेड न्यूज की अपसंस्कृति विकसित की है और जिसका अर्थशास्त्र ही इस पर टिका है। 2009 के लोकसभा चुनाव में पेड न्यूज के मामले में जिन दो अखबारों का नाम आया, उसमें एक नाम इसका (दैनिक जागरण) भी है, जिसके खिलाफ पीसीआइ की रिपोर्ट से अपना नाम हटवाने तक का मामला सामने आया।

दूसरा, फासीवादी सरकार से इस मीडिया घराने का क्या संबंध है और इनके पूर्वज इसी भाजपा के सांसद रहे हैं, क्या यह सब अलग से बताने की जरूरत है? बाबरी मस्जिद विध्वंस से लेकर ‘अच्छे दिन’ का बाकायदा अभियान इस अखबार ने किस तरह चलाया, इस पर भी किसी को शक हो सकता है? ज्यादा नहीं, इसकी सप्ताह भर की खबर को उठा कर देख लें तो भी यह समझ बनाने में मुश्किल नहीं होगी कि यह दरअसल उसी फासीवादी सरकार का मुखपत्र है, जिससे हमारा विरोध रहा है और जिसके कार्यक्रम में वीरेंद्र यादव जैसे पवित्र पूंजी से संचालित मंच की तलाश में निकले लोगों ने शिरकत की।

वीरेंद्र यादव जिस प्रभावी विरोध की आकांक्षा रायपुर गए लेखकों से रखते हैं, क्या यही सवाल इस मंच से उन्होंने किया कि जो पैसे लेकर खबरें छापने के लिए ब्लैक लिस्टेड हुआ हो, वह किस नैतिक अधिकार से अभिव्यक्ति का उत्सव करा रहा है? ऐसे में क्या इस मीडिया घराने के कार्यक्रम को केंद्र में फासीवादी सरकार बनने के जश्न के रूप में परिभाषित किया जा सकता है? काश, निष्कर्ष इतने सपाट होते! स्थितियां इससे कहीं अधिक विद्रूप हैं।

आप गौर करें कि पिछले कुछ सालों से साहित्योत्सव का चलन जिस भव्यता के साथ बढ़ा है, वह कॉरपोरेट घरानों, कॉरपोरेट मीडिया और अब कॉरपोरेट की ताकत पर गठित सरकार की दिलचस्पी की परिणति है। भव्यता और सुविधा के स्तर पर जिसकी वाजिब शिकायत और विरोध अलग-अलग मंचों से जारी है। इन क्षेत्रों से साहित्योत्सव के लिए जबरदस्त पूंजी मिल रही है और इनके आयोजन में मुख्य बात है कि सब कुछ जनसंपर्क एजेंसियों और इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों के दम पर हो रहा है। क्या यह सवाल नहीं है कि जो अखबार, एफएम, टीवी चैनल साहित्य के लिए पांच लाइन तक की जगह नहीं देते, वे अचानक परिशिष्ट और स्पेशल स्टोरी पर कैसे उतर आते हैं? क्या यह सब मुफ्त में, जनहित के तहत होता है?

असल चिंता इस बात की है कि साहित्य और अभिव्यक्ति के नाम पर इन तीनों मंचों से जो लाखों-करोड़ों रुपए लुटाए जा रहे हैं, उसके पीछे नीयत सिर्फ छवि सुधारने की नहीं। इसके भीतर राजस्व का एक ऐसा मॉडल विकसित करना है, जो देश में पानी, बिजली, गैस की तरह कारोबार कर सके, सरोकार भारी मुनाफे में तब्दील हो सके। जो काम पहले लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के नाम पर मीडिया के साथ किया गया, अब वही साहित्य को ‘लिटरेचर इंडस्ट्री’ में बदल कर करने की कोशिश हो रही है। हम भले अलग-अलग नामों को लेकर जाने न जाने का फैसला कर रहे हैं, अपने चरित्र और असर पैदा करने में एक-दूसरे से भिन्न नहीं हैं।

हम सरकार के बुलावे पर मना करके फासीवादी कॉरपोरेट मीडिया में शिरकत करने और खुद को बचाने का भ्रम भर पाल रहे हैं। ब्रांड लेखकों को बुलाने या बुला कर ब्रांड बनाने का जो चलन शुरू हुआ है, उसमें मुक्तिबोध से लेकर हबीब तनवीर सब जंचाए जा रहे हैं और सारा विरोध इसमें शामिल होने न होने तक सिमट जा रहा है। क्या यह पूरा मॉडल जल-जंगल-जमीन की लूट और उसके वाजिब हकदार को बेदखल किए जाने से साम्य नहीं रखता?

वीरेंद्र यादव ने अपने कहे की तो कहीं चर्चा नहीं की, लेकिन गूगल से जो दो पंक्तियां मिलीं, बिल्कुल सही हैं कि इसके लिए सिर्फ मीडिया और बाजारवाद नहीं, हम लेखक भी दोषी हैं।

हम दोषी इस अर्थ में भी हैं कि साहित्योत्सव को लेकर सारी कवायद वैचारिकी की जमीन को अर्थशास्त्र के अखाड़े में तब्दील करने की चल रही है और हम पार्टनर की पालिटिक्स जानने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। क्या दर्जनों साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक इसे रोक पा रहे हैं? आखिर जिन मंचों पर जाने से लेखक कठघरे में खड़े किए गए, उन्हीं मंचों से विज्ञापन लेकर संपादक अब तक कैसे पवित्र बने रह गए? इसी संवादी में क्या अखिलेश ने ‘तद्भव’ की आर्थिक पवित्रता का नुस्खा वितरित किया? मामला साफ है, क्योंकि कठघरे में लेखक को खड़ा करना फिर भी आसान है। इससे साहित्य के अर्थशास्त्र के बाकी अखाड़े सुरक्षित रह जाते हैं।

फिर भी हमारा रायपुर जाना सध गया कि हम बेहद करीब से जान सके कि सरकार की मशीनरी, कॉरपोरेट, पीआर एजेंसी, कॉरपोरेट मीडिया और साहित्यिक ठेकेदारी के बूते जो साहित्योत्सव कराए जाते हैं, उनकी शक्ल कैसी होती है? रायपुर साहित्य महोत्सव हम जैसों के लिए केस स्टडी है, जिससे देश भर में जनतंत्र को, मैनेजमेंट और मीडिया को चाकर बनाने की जो खुली कार्यशाला चल रही है, उसका विश्लेषण कर सकते हैं।

 

 

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