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परिदृश्य : तर्कशीलता की मशाल

सुभाष गाताडे शब्द और विचार हर किस्म, हर रंग के कठमुल्लों को बहुत डराते हैं। महज यह संभावना कि तमाम बंधनों से मुक्त मन ‘पवित्र किताबों’ के जरिए आस्थावानों तक पहुंचे ‘अंतिम सत्य’ को प्रश्नांकित कर, चुनौती दे या अंतत: उलट सकता है, उन्हें बेहद आतंकित करती है। वे इस पर एकमात्र उसी तरीके से […]
Author March 15, 2015 07:59 am

सुभाष गाताडे

शब्द और विचार हर किस्म, हर रंग के कठमुल्लों को बहुत डराते हैं। महज यह संभावना कि तमाम बंधनों से मुक्त मन ‘पवित्र किताबों’ के जरिए आस्थावानों तक पहुंचे ‘अंतिम सत्य’ को प्रश्नांकित कर, चुनौती दे या अंतत: उलट सकता है, उन्हें बेहद आतंकित करती है। वे इस पर एकमात्र उसी तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं, जिससे वे परिचित होते हैं। वे विचारों के खिलाफ कुल्हाड़ियां उठाते या छुरों-पिस्तौलों के जरिए मुक्त आवाजों को खामोश कर देते और अपनी इन मानवद्रोही हरकतों के लिए उन्हीं ‘किताबों’ में स्वीकार्यता ढूंढ़ लेते हैं।

तर्कशीलता, न्याय और प्रगति की एक ऐसी ही आवाज के कोल्हापुर की सड़कों पर खामोश किए जाने- जिसके तहत हिंदुत्ववादी संगठनों से ताल्लुक रखने वाले हमलावरों ने बयासी साल के कॉमरेड पानसरे पर गोलियां चलाई थीं, जब वे टहल कर लौट रहे थे- की घटना के महज एक सप्ताह के अंदर बांग्लादेश की राजधानी ढाका की सड़कों पर बयालीस साल के अविजित रॉय की इस्लामी अतिवादियों के हाथों हुई हत्या की खबर सुर्खियां बनीं। इस्लामी अतिवादियों ने उन पर तब हमला किया जब वे ढाका के चर्चित ‘एकुशे पुस्तक मेले’ से अपनी पत्नी रफीदा अहमद बोन्ना के साथ बाहर निकल रहे थे। पहले से वहां घात लगाए बैठे हमलावरों ने छुरों से रिक्शे पर सवार अविजित रॉय पर हमला किया और उनको बचाने में उनकी पत्नी को भी बुरी तरह घायल किया। अविजित की वहीं मौत हो गई और रफीदा बुरी तरह घायल हुर्इं।

यों कामरेड पानसरे और अविजित रॉय में कोई बाहरी समानता नहीं थी। पानसरे अपनी युवावस्था में ही कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ गए थे। राज्य समिति की अगुआई करने से लेकर तमाम किस्म के कामों में मुब्तिला थे। गोवा मुक्ति संग्राम से लेकर संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन, महंगाई के खिलाफ आंदोलन, बांध-पीड़ितों की लड़ाई और अंधश्रद्धा के खिलाफ संघर्ष जैसे कामों में वे लगातार सक्रिय रहे। हाल में वे रोड-टोल के मसले पर आंदोलन की अगुआई कर रहे थे। उनका मानना था कि टोल की उगाही अन्यायपूर्ण तो है ही, भ्रष्टाचार का जरिया भी है, जो राजनीतिकों को मालामाल करता है।

इसके बरक्स ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अजय रॉय के बेटे अविजित ने इंजीनियरिंग की शिक्षा पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई सिंगापुर में की थी और पिछले कई सालों से अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी कर रहे थे, उन्होंने वहां की नागरिकता भी ली थी। मगर दक्षिण एशिया के इस हिस्से में उनकी अधिक शोहरत उनके द्वारा वर्ष 2000 में शुरू किए गए ब्लॉग ‘मुक्तो मना’ से थी। बांग्ला और अंगरेजी, दोनों भाषाओं में संचालित यह वेबसाइट दक्षिण एशिया के मुक्त चिंतकों, तर्कवादियों और मानवतावादियों के बीच बहुत मशहूर थी। वे सरकारी सेंसरशिप और वहां बांग्लादेश में ब्लॉगरों की गिरफ्तारी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध-प्रदर्शनों का समन्वय करने में भी आगे थे।

हर किस्म की धार्मिक कट््टरता के खिलाफ आवाज उठाने में दोनों आगे थे और इसके लिए अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने को तैयार थे। ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब हिंदुत्व-अतिवादियों ने कामरेड पानसरे को धमकी भरा पत्र भेजा था कि ‘तुमचा दाभोलकर करू’। दाभोलकर जैसा उनका हश्र करने की यह चेतावनी थी। अविजित को भी इ-मेल और फेसबुक के जरिए अक्सर धमकियां मिलती थीं। उनकी हत्या के आरोप में जिस इस्लामी अतिवादी को गिरफ्तार किया जा चुका है, उसने उन्हें बाकायदा जान से मारने की कई बार धमकी दी थी। मगर न कामरेड पानसरे और न ही अविजित ने रूढ़िवादिता, बंददिमागी (या बकौल अविजित ‘आस्था के वायरस’) के खिलाफ अपने संघर्ष की धार कभी कम होने दी।

दोनों को शब्दों से जबर्दस्त लगाव था, जो उनकी रचनाओं में प्रगट हो रहा था। कलम को तलवार की तरह थामे कामरेड पानसरे ने जनता को जगाने के मकसद से कई अन्य किताबों की रचना की। जैसे द्विवर्णी शिक्षा-व्यवस्था, मार्क्सवाद का परिचय, मुसलिम तुष्टीकरण का सच, राजर्षि शाहू की विरासत आदि, जिनके कई संस्करण निकले। शिवाजी के इतिहास पर लिखी उनकी छोटी पुस्तिका ‘शिवाजी कोण होता’ यानी ‘शिवाजी कौन थे’ बहुत चर्चित हुई। कई अन्य भाषाओं में अनूदित इस पुस्तिका की मराठी में एक लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं।

सत्तर के दशक के बाद महाराष्ट्र में जिस तरह संकीर्णमना संगठनों ने शिवाजी को अपनी जनद्रोही राजनीति में समाहित करने की, उन्हें ‘हिंदू राजा’ के तौर पर प्रचारित करने की कोशिशें तेज कीं, तब उसका प्रतिवाद करने के लिए और शिवाजी के असली स्वरूप को सामने लाने के मकसद से उन्होंने गहन अध्ययन कर यह पुस्तिका पेश की। हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों के बीच सांप्रदायिक तत्त्वों की असलियत को रेखांकित करने वाली उनकी आवाज इन दोनों समुदायों को अपने साझे इतिहास, साझी विरासत को देखने पर भी जोर डालती है।

एक जगह पानसरे लिखते हैं: ‘‘हिंदुओं के दंगाई धर्मांध हैं, उसी तरह मुसलमानों के बीच भी दंगाई हैं। कुछ मुसलमान अपने आप को शहंशाह का वारिस समझते हैं और यह सोचते हैं कि उन्होंने इस मुल्क में राज किया। बताइए, इस देश में जब मुसलमानों की हुकूमत थी तब भी सारे मुसलमान कोई बिरयानी का स्वाद नहीं ले रहे थे, शराब नहीं पी रहे थे। उनका बहुलांश गरीब ही था। इसके अलावा, शिवाजी का स्वराज्य कायम करने में जिन मुसलमानों ने अपनी कुरबानी दी, उनका खून भी तो आप के पूर्वजों का ही खून था।’’

अविजित भी खूब लिखते थे, विज्ञान, दर्शन और भौतिकतावाद पर लिखी उनकी एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी अंतिम दोनों किताबें काफी चर्चित रही हैं- ‘अविश्वासेर दोर्शन’ यानी संदेह का दर्शन और ‘विश्वासेर वायरस’ यानी ‘आस्था का वायरस’। ‘आस्था के वायरस’ में उनका प्रमुख तर्क है कि ‘आस्था आधारित आतंकवाद समाज पर कहर बरपा करेगा।’ ‘फ्री एन्क्वायरी’ में लिखे अपने अंतिम आलेख में उन्होंने लिखा: ‘‘मेरे लिए धार्मिक उग्रवाद एक किस्म का संक्रामक विषाणु है। इस संदर्भ में मेरे हाल के अनुभव इसी बात की ताईद करते हैं कि ऐसा धार्मिक उग्रवाद आस्था का विषाणु है।’’
दोनों लगभग अकेले थे, जब हमलावरों ने उन्हें अपना निशाना बनाया, मगर उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए जीवन के तमाम क्षेत्रों से हजारों की तादाद में लोग जुटे थे।

धर्मांधता की राजनीति के बढ़ते बोलबाले का परिणाम है कि हम दक्षिण एशिया के इस हिस्से में हर किस्म के मजहबी जुनून का विस्तार देख सकते हैं। एक ऐसा आलम जब धर्म को राजनीति से अलग करने की, वास्तविक सेक्युलर समाज बनाने की लड़ाई गतिरोध का शिकार होती दिखती है, हमें क्या करना चाहिए!

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