ताज़ा खबर
 

कुचक्र में आवाम

देह-सुख का त्याग कर जिंदगी खाक होने से पहले ही जीवन राख कर देना या फिर उसे जी भर कर जी लेना। क्या सही है और क्या गलत। कम उम्र में अपनी उम्र के बच्चों के बाप से ब्याहे जाना या फिर उसी पति के बेटे से शारीरिक संबंध स्थापित कर लेना।

Author March 13, 2016 2:41 AM

देह-सुख का त्याग कर जिंदगी खाक होने से पहले ही जीवन राख कर देना या फिर उसे जी भर कर जी लेना। क्या सही है और क्या गलत। कम उम्र में अपनी उम्र के बच्चों के बाप से ब्याहे जाना या फिर उसी पति के बेटे से शारीरिक संबंध स्थापित कर लेना। क्या पाप है और क्या पुण्य इस निष्कर्ष में रामसरूप अणखी नहीं जाते, अपने उपन्यास ‘दुल्ले की ढाब’ में समाज की सच्ची तस्वीर लाकर पाठक तक रख देते हैं। स्याह-सफेद सब कुछ, सही-सही घटनाएं बयान करने के लिए साधारण नजर आने वाले परंपरागत शिल्प को ही वह औजार बनाते हैं।
दुल्ले के बुढ़ापे की जवान पत्नी सरदारो के शरीर की जरूरत कहां से पूरी होती। सबसे आसान और परिवार की आन की ढाल से लैस चेहरा खड््डू का है। दुल्ले का बड़ा लड़का। खैर खड््डू की तो शादी करवा दी जाती है तो सरदारो गांव के जवान मैंगल के पास पनाह पाती है। दुल्ले की ढाब पर बाबा रामदास की बादशाहत नजर आती है।

HOT DEALS
  • Panasonic Eluga A3 Pro 32 GB (Grey)
    ₹ 9799 MRP ₹ 12990 -25%
    ₹490 Cashback
  • Lenovo Phab 2 Plus 32GB Gunmetal Grey
    ₹ 17999 MRP ₹ 17999 -0%
    ₹0 Cashback

दरअसल ‘दुल्ले की ढाब’ के अस्तित्व की कहानी दुल्ले के विरह और अकेलेपन से जुड़ी है। एक दिन उसका अकेलापन उसे टिब्बा और थमंणवाल गांवों के बीच वाले निर्जन टीले पर ले जाता है जहां वह जोर-जोर से ढोल बजाने लगता है और दोनों गांवों के लोग उसका यह पागलपन देख इकट्ठा हो जाते हैं। दुल्ले के इशारे पर पहले से मौजूद गड्ढे पर खुदाई होती है और बाद में दोनों गांवों के लोग मिलकर सफर के दौरान सहूलियत के लिए बावड़ी खोद देते हैं। यहीं दुल्ला सांसारिकता त्याग कर फकीरी करने लगता है। और एक दिन उसका सेवक रामदास वहां का मठाधीश बन बैठता है। आगे चल कर अणखी दिखाते हैं कि धार्मिक मठ और राजनीति की जुगलबंदी समाज की सबसे छोटी और महत्त्वपूर्ण इकाई गांव को अपने हितों के लिए कैसे संचालित करती है।

भूमंडलीकृत दुनिया की प्रवृत्तियों और प्रावधानों के तहत ग्रामीण सभ्यता के सामाजिक और आर्थिक ढांचे का ताना-बाना धीरे-धीरे बिखर रहा है। उसके धागे उधड़ रहे हैं। कुछ इस तरह कि वह एक दिन जर्जर होकर खत्म हो जाएगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब तक महाजनों के चंगुल में फंसी हुई है। न तो शादी-ब्याह या किसी अन्य संकट के समय लिये कर्ज से वह कभी मुक्त हो सकता है और न ही किसी लाला-बनिए का कर्ज वह उतार पाता है। व्यवस्था के ये हिस्से जोंक की तरह आज भी किसान का खून चूसने पर उतारू हैं। किसान की फसलें बहुत कुछ तरह बारिश पर निर्भर हैं, ऊपर से विदेशों से आने वाला बीज अपने साथ नई आफत ले आता है।

जब कीटनाशक तक नकली बेचे जा रहे हों तो गरीब किसान किस पर भरोसा करे। यह व्यवस्था पर व्यंग्य ही है कि संता आत्महत्या करने से पहले दुकानदार से सल्फास की गोलियां असली होने की तस्दीक कर लेना चाहता है। किसान अपनी बदहाली से मुक्त होने के फेर में नित नए संकट में फंसता जाता है। अंत में उसके पास उपाय क्या रहता है? धीरे-धीरे मरने से बेहतर वह एक ही बार में अपनी जीवन लीला खत्म कर देना चाहता है।
रामसरूप अणखी पाठक का ध्यान किसान की आत्महत्या के कारणों की तह में ले जाने में कामयाब होते हैं। वह देख पाते हैं कि पैसे से पैसा बनाने वाली इस व्यवस्था में खेतिहर व्यवस्था का ढांचा कैसे टूटने के कगार पर है। संता कीमती लाल, नौहर चंद और कस्तूरी चंद जैसे महाजनों-बनियों के बनाए जाल में फंसता ही चला जाता है। रही-सही कसर उसका भाई जोरा उसे अफीमची बना पूरी कर देता है। नशे के धंधे का मकड़जाल पंजाब की ग्रामीण व्यवस्था को कैसे घुन की चाट रहा है इस ओर भी अणखी पाठक का ध्यान ले जाते हैं।

पंजाब पिछले तीस वर्षों में बहुत बड़े परिवर्तन से गुजरा है। हरित क्रांति के बाद का खुशहाल पंजाब आतंकवाद के भीषण दौर से गुजरा, इसी बीच बिहार के कामगारों पर पंजाब के बड़े किसानों की निर्भरता और नशे के कारोबार का योजनाबद्ध तरीके से पांव पसारना अपने आप में एक बड़ा संकट था। आतंकवाद के साए में काले कच्छे वाले गिरोह की कहानी को अणखी ने बहुत खूबसूरती से बीच में उतारा है। आतंक के साए में घरों में दुबके लोग अपने दबे हुए गुस्से को एक काल्पनिक गिरोह से मुठभेड़ में साकार होता हुआ देखना चाहते हैं।

सामाजिक समूहों के इस मनोविज्ञान को भी अणखी बखूबी समझते हैं। वह गांव में होने वाली दुरभिसंधियों के प्रसंग भी बीच-बीच में लाते हैं। जहां साजिशें बुनी जाती हैं, हत्याओं के षड्यंत्र अंजाम दिए जाते हैं और उनके लिए हथियार मुहैया कराए जाते हैं। गांव के सरपंच और डेरे के महंत जैसे ग्रामीण सत्ता के केंद्र इस सियासत में शामिल रहते हैं। अफीम और नशे का कारोबार पहले से तंगहाल किसानों को और निकम्मा बनाता है और अंत में वे अपनी जमीनें बेचने और गिरवी रखने के लिए मजबूर होते जाते हैं। यहां बाहरी तौर पर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है। बस जाल है, चारा है, और शिकारी जानता है कि मछलियों को स्वयं ही उसमें फंसते जाना है।

पांच अध्यायों में बंटे इस उपन्यास के चौथे अध्याय में पंजाब के आतंकवाद के दौर की कुछ घटनाएं हैं। इन घटनाओं के माध्यम से अणखी बताना चाहते हैं कि आतंक की यह लहर पंजाब के लिए कैसे दोधारी तलवार साबित हुई। एक तरफ आतंकवादियों के हाथों पंजाब का अवाम पीछे की ओर गया तो दूसरी ओर पुलिस की बर्बरता ने भी जुल्म ढाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। हर तरह से पंजाब का आम नागरिक ठगा गया। इस पूरे प्रसंग में आतंक और सत्ता के गठजोड़ की गहरी पड़ताल लेखक ने की है। थमंणवाला में जस्सी सरपंच एक ओर आतंकी गुरमीत से तो दूसरी ओर थानेदार से मिला हुआ है। वह अपने रास्ते से अछरा जैसे अच्छी नीयत के लोगों को हटाने में तो पुलिस से मिलीभगत करता ही है, समय आने पर रुपयों के लालच में अपने साथी आतंकी गुरमीत को भी नहीं छोड़ता। इस पूरे चक्र में यदि कोई पिसता है तो वह है पंजाब का अवाम।
जहां तक सवाल है उपन्यास के शिल्प का, तो अणखी प्रेमचंद के समय का परंपरागत ढांचा ही दोहराते नजर आते हैं। कुछ परंपरागत ढांचे के दोहन का लोभ और कुछ अनुवाद की सीमाएं कह लें, यह वृहद उपन्यास घटनाओं के विश्लेषण और ब्योरों में बहुत गहराई में नहीं उतर पाता। फिर भी कुछ प्रसंगों में रोचकता और उत्सुकता बनी रहती है।
निरंजन देव शर्मा
दुल्ले की ढाब: रामसरूप अणखी; अनुवाद: जसविंदर कौर बिंद्रा; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली- 3, मूल्य- 150 रुपए

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App