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किताबें मिलीं: ‘मैंने जो जिया’, ‘कविता की समकालीन संस्कृति’, ‘कविता की समझ’ और ‘मेरी धरती मेरे लोग’

किताबों की समीक्षा।

Author November 11, 2018 6:12 AM

मैंने जो जिया

मैंने जो जिया’ रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ का आत्मवृत्त है। उद्भ्रांत ने काव्य के साथ गद्य को भी बहुत सलीके से बरता है। गौर किया जाए तो उनकी कविता में भी गहरी इतिवृत्तात्मकता है। साथ ही जब वे कोई गद्य लिख रहे होते हैं, तो उसमें भी इतने व्यापक ब्योरे समाए होते हैं कि उनकी स्मृति का लोहा मानना पड़ता है। अपने आत्मवृत्त में वह उसी क्षमता को एक अलग ऊंचाई तक ले जाते हुए प्रतीत होते हैं।
किसी आत्मवृत्त में दो चीजें काफी महत्त्व की होती हैं- वह है साहस और सच। सच साहस से ही बयां होता है। पर कई बार यह भी देखने में आता है कि आत्मकथ्य में लोग झूठ भी साहस के साथ बयां कर देते हैं, पर झूठ की कलई पाठक उतार देते हैं। उद्भ्रांत ने साहित्य संसार में एक लंबा दौर गुजारा है और उनके व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं से हमारा साहित्य जगत रूबरू है। इस कृति में भी उन पहलुओं के जीवंत रूप से हमारा साक्षात्कार होता है। लेखक का बचपन और युवावस्था काफी दारुण है। पर उनके व्यक्तित्व में जो तेज धार है, वह हमें तभी से चमकती हुई दिखाई पड़ती है।
यूं इस कृति की यह भी खासियत है कि लेखक सिर्फ जन्म से नहीं, बल्कि जन्म के और आगे से आगे अपने समय को समझने की कोशिश करता है। अपने परिवार के विस्थापन, संघर्ष, अभाव और नैतिक द्वंद्व का जो सच इसमें उकेरा गया है, वह लगभग सभी भारतीय मध्यवर्गीय परिवारों का यथार्थ है। दिलचस्प है कि लेखक ने अपनी अद्भुत स्मृति के सहारे जीवन के ऐसे छोटे-छोटे ब्यरो दिए हैं, जिससे सहज ही कृति में कथा रस पैदा हो गया है। हालांकि इस आत्मकथा के आगे के अंश अभी आने हैं, पर जितना है, उतना ही किसी औपन्यासिक कृति की अभिव्यंजना को समेटे हुए है।
मैंने जो जिया (बीज की यात्रा) : रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’; अमन प्रकाशन, 104-ए/80 सी, रामबाग, कानपुर; 395 रुपए।

कविता की समकालीन संस्कृति

बीती शताब्दी के अंतिम दशक में दर्जनाधिक कवियों ने अपनी पहचान न सिर्फ कायम की, बल्कि सदी की सरहद पर भोर की आहट दे रहे इक्कीसवीं सदी के युवा कवियों का मार्गदर्शन भी किया। नरेश सक्सेना, ज्ञानेंद्रपति, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, विजेंद्र, अरुण कमल, ऋतुराज, चंद्रकांत देवताले, वेणुगोपाल, हरिश्चंद्र पांडेय, मदन कश्यप, लीलाधर मंडलोई, कात्यायनी, रंजना जायसवाल, पवन करण, सुरेशसेन निशांत, केशव तिवारी, योगेंद्र कृष्णा और संतोष चतुर्वेदी जैसे प्रगतिशील चेतना के गायकों ने नागार्जुन, धूमिल और कुमार विकल के बाद उत्पन्न अंतराल को भरने की महत्त्वपूर्ण कोशिश की।
पिछले पचास वर्षों की हिंदी कविता को मुक्तिबोध, नागार्जुन या धूमिल न दे पाने के बावजूद सृजन के उर्जस्वित उत्थान की उम्मीद जगाती है। राजेश जोशी के समानांतर कवियों में नरेश सक्सेना जी एक ऐसे कवि हैं, जिन्होंने अपनी सृजन यात्रा में तमाम धूप-छांही उतार-चढ़ाव के बावजूद अपने आपको नएपन की ताजगी के साथ जिलाए रखा। उबड़-खाबड़ मैदान की तरह सामने खड़ी है इक्कीसवीं सदी, जो वरिष्ठतम, वरिष्ठ, युवा और नव कवियों को एक साथ लेकर आगे बढ़ रही है। इसमें कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह जैसे तार सप्तकी हस्ताक्षर हैं, तो नरेश सक्सेना जैसे धूमिल के समकालीन व्यक्तित्व भी। ‘कविता की समकालीन संस्कृति’ पुस्तक समय के हस्ताक्षरों से बुनी हुई, साहित्य के पौधों, गायकों और सिपाहियों को समर्पित है। इस उम्मीद के साथ कि साहित्य का पाठक आत्यंतिक निरपेक्षता के साथ इस पुस्तक का मूल्यांकन करेगा।
कविता की समकालीन संस्कृति : भरत प्रसाद; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 480 रुपए।

कविता की समझ

कविता की वर्तमान आलोचना की स्थिति को देखते हुए सुधीर रंजन सिंह की कविता के प्रस्थान के बाद कविता की समझ आश्वस्त करती है कि कविता-आलोचना की सुदृढ़ परंपरा अभी बची हुई है। सुधीर रंजन विधा के रूप में कविता और आलोचना की जो समझ विकसित करते हैं, वह कविता-आलोचना को समृद्ध करती है। उनके यहां रचना और आलोचना की जांच-परख बहुत ही संवेदनात्मक, सुचिंतित और व्यवस्थित है, तभी वे ‘कविता का अर्थ’, ‘वाग्मिता और बिंब’, ‘कविता और अनुभव’, ‘कविता और राजनीति’, ‘कविता और मनोविमर्श’ के पारंपरिक ‘नरेटिव’ का आधुनिक पाठ तैयार करते हैं। वे आलोचना की काव्यशास्त्रीय परंपरा के साथ आधुनिक कविता-आलोचना की यात्रा में अनुभूति, यथार्थ, भाषा, तकनीक, दृष्टि और काव्य-सिद्धांत को विधिवत विश्लेषित करते हैं, और उसके माध्यम से राष्ट्रीय काव्यधारा, छायावाद और परवर्ती कविता में नागार्जुन, मुक्तिबोध, शमशेर और अज्ञेय की कविता पर अलहदा विचार करते हैं।
समकालीन कविता की संश्लेषी परंपरा, आठवें दशक की कविता में समाजवादी यूटोपिया के अंत और नब्बे के बाद की कविता पर जिरह करते हुए अपने समय, समाज, संस्कृति की सृजनात्मकता और उसके सिद्धांतों के अंतर्विरोधों की खोज करते हैं। इस तरह यह पुस्तक कविता की ही समझ नहीं है, बल्कि हमारी संस्कृति की सृजनात्मकता और सिद्धातों द्वारा निर्मित द्वैत के भेद को खोलती है जिस पर कविता के भविष्य का पाठ भी निर्भर करता है।
कविता की समझ : सुधीर रंजन सिंह; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 595 रुपए।

मेरी धरती मेरे लोग
समकालीन भारतीय और विश्व साहित्य के वरेण्य कवि शेषेंद्र शर्मा का यह संपूर्ण काव्य संग्रह है। शेषेंद्र शर्मा ने अपने जीवन काल में रचित समस्त कविता संकलनों को पर्वों में परिवर्तित- एकत्रित करके ‘आधुनिक महाभारत’ नाम से तेलुगु में प्रकाशित किया है। ‘मेरी धरती मेरे लोग’ उसी का हिंदी रूपांतरण है, जिसे महाकाव्य नोबेल साहित्य पुरस्कार के लिए भारत वर्ष से नामित भी किया गया था।
महाकवि शेषेंद्र के भावों और कल्पनाओं का आलोक एक साथ ही अपने युग की दशों दिशाओं में विकीर्ण होकर उनकी विभिन्न समस्याओं का तरल स्पर्श करता है। वे अपने परिवेश को अपनी गहरी संवेदनशील अंतरदृष्टि से देख-परख कर अपनी प्रखर प्रतिक्रिया बेबाक शब्दों में प्रकट कर देते हैं। जहां अनेक अन्य कवि युग-विशेष में रहकर भी अपनी पूर्व परंपरा से विशेष निबद्ध रहते हैं, शेषेंद्र परंपरा से रस-गंध लेकर भी अपने चारों ओर व्याप्त आवेष्टन से अधिक प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण कर अपनी कलात्मक वाणी का वासंती वातास बिखेर देते हैं। उनका संपूर्ण काव्य-जगत उनकी गहन चिंतनशीलता, तरल भावुकता, अभिनव कल्पना प्रवणता तथा आधुनिक संवेदनशीलता की मीनार हो गया है। उनका काव्य-परिवेश उधार लिया हुआ, आयातित, अनभोगा और गैरईमानदार परिवेश नहीं, बल्कि अपनी मज्जा, रक्त-शिराओं और आत्मा से झेला-भोगा हुआ, स्वायत्त और ईमानदार परिवेश है। परिवेश की एक ऐसी ही कविता है- ‘भूख’। भूख क्रांति की जननी है। भूख की लिपि से ही समाज में क्रांति, विद्रोह या विस्फोट के शब्द लिखे जाते हैं। भूख सामाजिक विषमता का परिणाम और विध्वंस की भूमिका है। स्वभावत: समाज में फैली भूख को कवि ने संवेदना की दृष्टि से देखा है।
मेरी धरती मेरे लोग : शेषेंद्र शर्मा; गुंटूरु शेषेंद्र शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट, हैदराबाद; 425 रुपए।

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