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भाषायी हिंसा और समाज

हाल के वर्षों में आक्रामक और भयादोहन करने वाली भाषा का चलन बढ़ा है। खासकर महिलाओं और दलितों के विरुद्ध ऐसी भाषा का प्रयोग राजनीति में आम हो चली है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें महिला राजनेताओं पर अभद्र टिप्पणी समय-समय पर की जाती रही है।

Author Published on: August 18, 2019 1:29 AM
मालेगांव में प्रदर्शन के दौरान मौके पर मौजूद भीड़। (express photo)

ज्योति सिडाना

सूचना क्रांति के इस दौर में तेजी से बढ़ते सोशल मीडिया ने भाषा के मूल चरित्र को ही बदल दिया है। सोशल मीडिया पर किसी लेख या विचार की प्रतिक्रिया में भद्दी-भद्दी गालियां लिखना, महिलाओं के विरुद्ध नकारात्मक और अश्लील टिप्पणी करना आम बात हो गई है। आक्रामक और अशोभन भाषा का प्रयोग बढ़ा है। पहले समाज में अगर दूसरों के दिलों को जीतना या उन्हें प्रभावित करना हो तो मीठी वाणी बोलने पर बल दिया जाता था। भाषा चिंतन और अभिव्यक्ति को दूसरों तक पहुंचाने का न केवल एक सशक्त माध्यम, बल्कि यह एक ऐसा शस्त्र है, जिससे किसी को भी अपना मित्र या शत्रु बनाया जा सकता है। यही गुण उसे पशु जगत से अलग करता और श्रेष्ठ बनाता है। किसी भी समाज की भाषा (लिखित/ मौखिक दोनों) उसकी सभ्यता, संस्कृति और विरासत का आईना होती है। भाषा की समृद्धि से संबंधित समाज की समृद्धि और विकास का पता चलता है। इसका स्पष्ट मतलब हुआ कि भाषिक स्तर में गिरावट समाज के सांस्कृतिक और मूल्यगत पतन की ओर इशारा करती है।

भाषा और समाज के अंतर्संबंधों को सामाजिक क्रियाओं के संदर्भ में परखने की कोशिश सभ्यता के प्रारंभ से ही होती रही है। शक्तिशाली लोग आक्रामक और भयभीत करने वाली भाषा का प्रयोग करते हैं, ताकि शक्तिहीन लोग उनके आर्थिक और सांस्कृतिक गुलाम बने और उनके निर्देशों पर कार्य करते रहें। भारतीय समाज में उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों और आदिवासियों के प्रति तथा परिवार में और उसके बाहर पुरुषों द्वारा महिलाओं के प्रति आक्रामक तथा भय उत्पन्न करने वाली भाषा प्रयुक्त होती रही है। छिपे तौर पर शोषण के प्रति आक्रोश व्यक्त करने के लिए शोषित तबका पारस्परिक संवाद में गाली-गलौच की भाषा इस्तेमाल करता है।

हाल के वर्षों में आक्रामक और भयादोहन करने वाली भाषा का चलन बढ़ा है। खासकर महिलाओं और दलितों के विरुद्ध ऐसी भाषा का प्रयोग राजनीति में आम हो चली है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें महिला राजनेताओं पर अभद्र टिप्पणी समय-समय पर की जाती रही है। किसी के विचारों से सहमत-असहमत होना, उसे पसंद-नापसंद करना अलग बात है, पर सार्वजनिक रूप से किसी नागरिक के विरुद्ध अपशब्दों का प्रयोग करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग है। इसे लोकतंत्र के लिए एक बड़ा खतरा कहा जा सकता है। संविधान किसी भी नागरिक को यह अधिकार नहीं देता कि वह दूसरे नागरिक का अपमान करे या उसके लिए अश्लील/ अभद्र भाषा का प्रयोग करे। केंद्र और राज्यों में सम्मानित जन-प्रतिनिधि तथा विभिन्न राजनीतिक दलों के पदाधिकारी सार्वजनिक रूप में जिस भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं वह लोकतांत्रिक राजनीति को शर्मसार करती है। असभ्य शब्दों का प्रयोग इस तथ्य को सिद्ध करता है कि लोकतंत्र में शालीन भाषा सिकुड़ती जा रही है। फेसबुक और सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यकों के प्रति घृणात्मक प्रचार इस भाषा को मीडिया में धीरे-धीरे स्वीकृति प्रदान करता नजर आता है।

भाषा का आविष्कार मानव सभ्यता की प्रमुख उपलब्धि है। पर भाषा से शक्तिशाली लोगों का खिलवाड़ दर्शाता है कि संस्कृति और भाषा सिर्फ जन-सामान्य गढ़ता है और शक्ति संपन्न तबका उसका अपने हितों के लिए उपयोग कर शिष्टता और अशिष्टता का विभाजन उत्पन्न करता है। कार्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर शिष्ट भाषा का इस्तेमाल करने वाले उच्च अधिकारी अपने अधीनस्थों के लिए अपमानजनक शब्दों का निस्संकोच प्रयोग करते हैं, जबकि अपने वरिष्ठों को ‘सर’ कहते नहीं अघाते। महिलाओं की अस्मिता को ‘पब्लिक प्रॉपर्टी’ के रूप में व्यक्त करने वाली गाली-गलौज की भाषा सार्वजनिक स्थलों पर कहीं भी सुनी जा सकती है। अब तो संसद भी इससे अछूती नहीं है। हमारे जन-प्रतिनिधि इसी परिवेश में समाजीकृत होते हैं और फिर शक्ति संपन्नता का दंभ उन्हें भाषायी हिंसा के लिए प्रेरित करता है। असल में भाषायी हिंसा एक किस्म की क्रूरता है, जो इस बात का संकेत देती है कि ‘अगर तुझमें हिम्मत है तो मेरा कुछ भी बिगाड़ के देख ले, पर मैं तुझे समाप्त करने की क्षमता रखता हूं।’ आश्चर्य की बात तो यह है कि जन-आंदोलनों में सामान्यतया ऐसी भाषा प्रयुक्त नहीं होती, क्योंकि जन संघर्षों में भाषायी शालीनता स्वाभाविक रूप से आंदोलन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता बन जाती है।

एक और विसंगति सामने आई है। पहले माना जाता था कि गाली-गलौज अशिक्षित या अल्प शिक्षित लोगों का काम है, जबकि तथ्य यह है कि लोग जैसे-जैसे शिक्षित हो रहे हैं, अशोभन भाषा का प्रयोग भी बढ़ रहा है। तो क्या यह मान लिया जाए कि शैक्षणिक उपलब्धि एक ऐसी शक्ति है, जो व्यक्ति में दंभ भर देती है? विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों द्वारा अश्लील इशारे और शारीरिक हाव-भाव इस तथ्य को व्यक्त करते हैं कि जीत और हार की प्रस्तुति भाषायी दंभ पर आधारित होने लगी है। एक सीमा तक यह भी सच है कि धार्मिक लोग सर्वाधिक अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं। यहां अपशब्द का अभिप्राय केवल गाली से नहीं है। उन वाक्य विन्यासों से भी है, जिनमें घमंड और अक्खड़पन देखने को मिलता है।

जैस-जैसे मीडिया का व्यवसायीकरण हुआ है, अपशब्द भी एक वस्तु बन गए हैं। टेलीवीजन के रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ की भाषा में एक गाली वाले शब्द का अनवरत प्रयोग (हालांकि उसके मौखिक वाचन को बंद रखा जाता है/ सेंसर कर दिया जाता है) इस तथ्य को दर्शाता है कि अंग्रेजी के अशोभन शब्द संभवत: हमें अशोभनीय नहीं लगते, क्योंकि इसमें औपनिवेशिक मानसिकता है। इन शब्दों का बुरा न लगना गुलामी को दर्शाता है। तो फिर हिंदी में गाली-गलौज की भाषा से परहेज क्यों? जैसा सवाल भी उठाया जा सकता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हिंदी की गाली-गलौज की भाषा औपनिवेशिक मानसिकता, जो अंग्रेजी के वर्चस्व से झलकती है, को चुनौती है। शायद जन-प्रतिनिधि गाली-गलौज की भाषा का सरेआम प्रयोग कर शक्ति संपन्न लोगों के बीच भाषा के उस लोकतंत्रीकरण का संकेत दे रहे हैं, जिसमें किसी भी भाषा में निहित अपशब्दों का इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता है।

ऐसा नहीं कि अपशब्दों की यह भाषा केवल भारतीय यथार्थ है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने विभिन्न पश्चिमी देशों में अशोभन भाषा के प्रयोग का विस्तार किया है। चीन, अमेरिका, फ्रांस, उत्तर कोरिया आदि देशों में भी राजनेता गाली-गलौज की भाषा का प्रयोग करने लगे हैं।

दरअसल, आक्रामकता को लोकप्रिय नेतृत्व की विशेषता मान लिया गया है। पर गाली-गलौज की भाषा एक तरह का भाषायी फासीवाद है, जिसमें जनसामान्य को सांस्कृतिक परिदृश्य से हटाने की धमकी भी है। क्या भाषायी हिंसा लोकतंत्र के समक्ष चुनौती नहीं है? अगर है तो गांधी के देश में इस हिंसा का मुकाबला करने के लिए क्या जन सामान्य के पास कोई लोकतांत्रिक हथियार बचा है? आवश्यक है कि शारीरिक और मानसिक हिंसा के साथ-साथ भाषायी हिंसा पर भी विचार विमर्श किया जाए, क्योंकि भाषायी हिंसा भी लोकतंत्र के समक्ष अनेक प्रकार के ‘जोखिमों’ को उत्पन्न कर रही है, जिसकी कल्पना संभवत: हम आज नहीं कर पा रहे हों, पर भविष्य में समाज के समक्ष अनेक संकटों को उत्पन्न कर सकती है।

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