ताज़ा खबर
 

असुरक्षित स्त्री

महिलाओं के लिए बनने वाली नीतियों का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक कि उन्हें सुरक्षित वातावरण नहीं दिया जाता। राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा योगदान इस बात की पुष्टि करता है कि महिलाएं विकास के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए योग्य और सक्षम हैं।

Author Published on: September 29, 2019 1:34 AM
बलात्कार के सबसे ज्यादा मामले मध्यप्रदेश में दर्ज किए गए हैं।

संजय ठाकुर

भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा देश में महिलाओं की स्थिति पर पिछले दिनों जारी रिपोर्ट देश में महिलाओं की बढ़ती असुरक्षा की एक चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट के अनुसार देश में हर घंटे चार महिलाएं बलात्कार का शिकार हो रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश में बलात्कार का आंकड़ा अड़तीस हजार नौ सौ सैंतालीस के पार हो गया है। इतना ही नहीं, महिलाओं के प्रति आपराधिक घटनाओं में हर वर्ष वृद्धि हो रही है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि हर आयु की महिला ऐसी घटनाओं की शिकार हो रही है। इस रिपोर्ट के अनुसार बच्चियों के साथ बलात्कार का आंकड़ा उन्नीस हजार सात सौ पैंसठ से आगे निकल गया है। कोमा में गई एक महिला का अस्पताल में बलात्कार भी इसी देश में घटित एक मामला है, जो निश्चित रूप से विकृत मानसिकता की पराकाष्ठा है। ऐसी स्थिति के चलते महिलाओं पर केंद्रित नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन पर भी कई सवाल खड़े होते हैं।

थॉमसन-रॉयटर्स फॉउंडेशन ट्रस्टलॉ प्रो बोनो की एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के लिए असुरक्षा की दृष्टि से भारत चौथे स्थान पर है। यूनीसेफ की रिपोर्ट ‘हिडन इन प्लेन साइट’ में खुलासा किया गया है कि भारत में पंद्रह से उन्नीस वर्ष की आयु की चौंतीस प्रतिशत विवाहित महिलाएं ऐसी हैं जो अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक या यौन-हिंसा का शिकार होती हैं। वहीं यूनाइटेड नेशन्स फंड फॉर पॉपुलेशन ऐक्टिविटीज और वॉशिंगटन स्थित संस्था इंटरनेशनल सेंटर रिसर्च आॅन वीमेन की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत में दस में से छह पुरुषों ने अपनी पत्नी या प्रेमिका के साथ कभी न कभी हिंसक व्यवहार किया है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के आधार पर दिल्ली को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर घोषित किया गया है। दिल्ली में पिछले पांच वर्षों के दौरान महिलाओं के साथ बलात्कार के मामलों में दो सौ सतहत्तर प्रतिशत वृद्धि भी इस बात की पुष्टि करती है। यहां हर वर्ष औसतन पांच सौ बहत्तर ऐसे मामले दर्ज हो रहे हैं। वर्ष 2016 में यह आंकड़ा दो हजार एक सौ पचपन तक पहुंच चुका था। इनमें ऐसे मामलों की भी बहुत बड़ी संख्या है, जिनके दर्ज होने के बाद एक लंबा समय बीत जाने पर भी कोई नतीजा नहीं निकला है। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि बर्बरता दर्शाती घटनाओं के बावजूद ऐसे मामलों में कमी आने के बजाय अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है। वर्ष 2012 के बहुचर्चित निर्भया कांड के बाद ऐसे मामलों के थमने या कम होने की उम्मीद थी, लेकिन इसके बिल्कुल उलट ऐसे मामलों में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। इस घटना के बाद बालात्कार के दर्ज मामलों में एक सौ बत्तीस प्रतिशत की वृद्धि निश्चित ही ऐसी घटनाओं को रोकने की दिशा में एक कारगर पहल किए जाने पर जोर देती है।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार महिलाओं के उत्पीड़न और बलात्कार के सबसे ज्यादा मामले मध्यप्रदेश में दर्ज किए गए हैं। यह राज्य महिलाओं के उत्पीड़न और बलात्कार के मामलों में तीन साल से सबसे आगे चल रहा है। यहां दूसरे अपराधों की अपेक्षा महिलाओं के प्रति 14.1 से 16.4 प्रतिशत ज्यादा आपराधिक मामले सामने आए हैं। ऐसे मामलों में उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है। यहां बलात्कार के चार हजार आठ सौ सोलह मामले दर्ज किए गए हैं। इस सूची में तीसरा स्थान महाराष्ट्र का है, जहां बलात्कार के चार हजार एक सौ नवासी मामले प्रकाश में आए हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि थोड़े-बहुत अंतर के साथ देश के लगभग सभी राज्यों में महिलाओं की स्थिति एक-सी है। इनमें कई राज्य ऐसे भी हैं, जहां की सरकारें महिलाओं को भयमुक्त वातावरण के बड़े-बड़े दावे करती रही हैं, लेकिन महिलाओं के प्रति अपराध में दूसरे राज्यों से भी कहीं आगे हैं। इससे इन राज्यों की सरकारों के दावों की पोल तो खुलती है, लेकिन इनकी जवाबदेही सुनिश्चित करवाने के लिए न तो केंद्र सरकार की कोई इच्छा-शक्ति है और न ही न्याय-व्यवस्था की इनके विरुद्ध कार्रवाई की कोई पहल।

इस रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के बलात्कार और उत्पीड़न में मध्यप्रदेश का पहले, उत्तर प्रदेश का दूसरे और महाराष्ट्र का तीसरे तथा महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के अपराध में त्रिपुरा का पहले और दिल्ली का दूसरे स्थान पर होना; देश के बड़े राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में अंतर को उजागर करता है। ऐसा इसलिए कि लंबे समय तक देश के बड़े राजनीतिक दल ही इन राज्यों पर शासन करते रहे हैं। इन राज्यों में लगातार बढ़ रही अपराध की ऐसी घटनाएं महिलाओं के प्रति विभिन्न राजनीतिक दलों की संवेदनशीलता की पोल खोलने के साथ-साथ इस बात की भी पुष्टि करती हैं कि महिलाओं के प्रति विभिन्न राजनीतिक दलों की गंभीरता चुनावों, राज्यसभा, लोकसभा और विधानसभा के भाषणों तक ही सीमित है।

आए दिन महिलाओं को घरेलू हिंसा, बलात्कार, यौन-शोषण और दूसरे कई तरह के उत्पीड़न का दंश झेलना पड़ रहा है। यहां तक कि कई मामलों में उसे सामूहिक बलात्कार तक का शिकार होना पड़ रहा है। ऐसे में महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में प्राथमिकता के आधार पर काम करने की जरूरत है। यों तो महिलाओं की स्थिति पर चिंतन की जरूरत बहुत पहले से महसूस की जाती रही है, लेकिन विभिन्न सरकारों; संबंधित प्रशासन और विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा इस ओर कभी गंभीरता न दिखाए जाने से देश में महिलाओं की असुरक्षा लगातार बढ़ रही है। ऐसे माहौल में महिला-आरक्षण से ज्यादा महिलाओं के प्रति हो रही बर्बरता को रोकने के लिए दिशा निर्धारित करने पर जोर देने की जरूरत है। महिलाओं को आरक्षण से कहीं ज्यादा सुरक्षित वातावरण की जरूरत है। महिलाओं के लिए बनने वाली नीतियों का तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक कि उन्हें सुरक्षित वातावरण नहीं दिया जाता। राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किया जा रहा योगदान इस बात की पुष्टि करता है कि महिलाएं विकास के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए योग्य और सक्षम हैं। ऐसे वातावरण के निर्माण से महिलाओं के विकास को सुनिश्चित करने के साथ-साथ लोगों की इनके प्रति अवधारणा और मानसिकता को भी बदलने में सहायता मिलेगी।

सरकार को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कोई भी महिला घरेलू हिंसा की शिकार न हो पाए और किसी भी महिला को घरेलू झगड़ों के कारण आत्महत्या न करनी पड़े। हालांकि महिलाओं के आत्महत्या करने के बहुत-से कारण भावनात्मक और निजी पाए गए हैं, लेकिन महिलाओं द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं के दूसरे कारणों का भी पता लगाना होगा। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि हर वर्ष हो रही आत्महत्याओं में महिलाओं का आंकड़ा बहुत बड़ा है। चिंताजनक है कि हर वर्ष आत्महत्याओं के कुल मामलों में सड़सठ प्रतिशत महिला-आत्महत्या से संबंधित होते हैं। इस तरह देखें तो आत्महत्या करने वाले हर पांच में एक गृहिणी होती है। महिलाओं द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के ये मामले हैरान करने वाले भी हैं। सरकार को पुलिस की छवि को सुधारने के भी प्रयास करने चाहिए। पुलिस की अच्छी छवि और सौहादर्पूर्ण व्यवहार से ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा। संबंधित कानून को प्रभावी ढंग से लागू करके महिलाओं के प्रति अपराध की घटनाओं पर निश्चित ही रोक लगाई जा सकती है।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 वक़्त की नब्ज़: यह पेशेवर तरीका नहीं
2 वक्त की नब्जः सम्मान पर बेमानी सवाल
3 वर्षा जल की जगह