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तीरंदाज: व्यंग्य की जगह

ट्रंप भी राष्ट्रवादी हैं। संयुक्त राष्ट्र के सम्मलेन में उन्होंने पिछले हफ्ते अपने भाषण में कहा था कि विश्व को ‘ग्लोबलाइजेशन’ को भूल कर ‘नेशनलिज्म’ अपनाना चाहिए, पड़ोसी राष्ट्रों से मधुर संबंध रखने चाहिए, पर इतने नहीं कि उनकी वजह से राष्ट्रहित पर जरा-सी भी आंच आए।

Author Published on: September 29, 2019 12:45 AM
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप। (AP Photo)

अश्विनी भटनागर

अमेरिका में कुछ दिन पहले एक कार्टून छपा था, जिसमें दिखाया गया था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक उम्रदार महिला ज्योतिषी के सामने बैठे हैं और वह उनका भविष्य पढ़ कर कह रही है- ‘मैं आपके आने वाले समय में एक दीवार देख रही हूं।’ वह ऐसा कहते वक्त जेल की चारदीवारी की ओर इशारा कर रही है। पर टंÑप के लिए उसका मतलब मेक्सिको बॉर्डर पर दीवार खींचने की उनकी योजना से है। जेल का संदर्भ टंÑप के खिलाफ महाभियोग लाने के हाउस स्पीकर के ऐलान से कार्टूनिस्ट ने लिया था। कार्टून छपा और टंÑप के विरोधियों ने इसको सोशल मीडिया पर जम कर साझा भी किया था। राष्ट्रपति कुछ झुंझुलाए जरूर थे, पर बात आई गई हो गई थी।

लगभग इसी समय पाकिस्तान के अखबार ‘द नेशन’ में भी एक कार्टून छपा था, जिसमें दिखाया गया था कि टंÑप और भारत के प्रधानमंत्री एक बढ़िया रथ पर सवार हैं, जिसको वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान खींच रहे हैं। टंÑप ने उनके आगे ‘मध्यस्थता’ (कश्मीर के मसले पर) की गाजर लटकाई हुई है और इमरान उस गाजर को पाने के चक्कर में हैरान-परेशान अपने को रथ में जोते हुए हैं। कार्टून के छपते ही पाकिस्तान के सियासी गलियारों में हड़कंम मच गई थी। अखबार पर हर तरफ से दबाव आने लगे थे और अंतत: ‘द नेशन’ ने पहले पन्ने पर माफीनामा छाप दिया था। अपने को ‘राष्ट्रवादी’ अखबार घोषित करते हुए उसने लिखा था कि कार्टून नामुनासिब था, जिसको छाप कर उसने गलती की थी, विशेषकर उस दिन, जिस दिन न्यू यॉर्क में संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दे पर अहम चर्चा होने वाली थी। अखबार ने अपनी ‘भूल’ का ठीकरा कार्टूनिस्ट के सिर पर फोड़ दिया था। उसको नौकरी से बर्खास्त कर दिया था।

टंÑप भी राष्ट्रवादी हैं। संयुक्त राष्ट्र के सम्मलेन में उन्होंने पिछले हफ्ते अपने भाषण में कहा था कि विश्व को ‘ग्लोबलाइजेशन’ को भूल कर ‘नेशनलिज्म’ अपनाना चाहिए, पड़ोसी राष्ट्रों से मधुर संबंध रखने चाहिए, पर इतने नहीं कि उनकी वजह से राष्ट्रहित पर जरा-सी भी आंच आए। भारत को भी वे यही पाठ पढ़ा रहे थे और पाकिस्तान को भी। पर फिर भी कहीं न कहीं दोनों देशों के बीच अपनी मध्यस्थता की गुंजाइश बनाए रखने पर आमादा थे। खैर, राजनीतिक और कूटनीतिक मसला जो भी हो, पाकिस्तान का अखबार पहले पन्ने पर अपनी राष्ट्रवादी कटिबद्धता को मुखरित करके ही बाज आया था। राष्ट्र के लिए विमति या फिर कार्टून का व्यंग्य कितना जरूरी है, इससे उसका सरोकार नहीं था।

हास्य और व्यंग्य देश की सेहत के लिए उतने ही जरूरी हैं, जितना नागरिकों के स्वास्थ के लिए खुली हवा और साफ पानी है। अखंड भारत के प्राचीन काल से इसकी एक विशिष्ट परंपरा रही है। यशस्वी महाराजाओं से लेकर बादशाहे-आलमों तक सभी ने राजकाज की प्रक्रिया में इसको जरूरी नकेल के रूप में सहर्ष स्वीकार किया है। पाकिस्तान के पंजाब में मिरासियों की दरबार में अहम भूमिका थी। वे राजा के सम्मुख कटु से कटु बात कह जाते थे और शासक उनके चुभते व्यंग्य से हंस कर सीख लेते थे। ऐसा माना जाता था कि अच्छे से अच्छे शासन में भी कमी-बेसी रह जाती है और व्यंग्यकार उसको अपने तरीके से शासक के सामने उजागर कर देता है। इसमें सबका फायदा था- शासक का और शासित का। उसका उद्देश्य राजा को शर्मिंदा करना नहीं, बल्कि उसको सचेत करना होता था।

पर कभी-कभी शासक समझदार कम और अहंकारी ज्यादा हो जाते हैं। व्यंग्य को व्यक्तिगत विरोध मान लेते हैं। वे उसका ‘राष्ट्रहित’ में दमन करने पर उतारू हो जाते हैं। पर उनका पराक्रम व्यर्थ ही साबित होता है। हास्य और व्यंग्य कभी बूट तले नहीं लाए जा सकते हैं। इतिहास इसका गवाह है। रूस में सौ साल पहले हुई क्रांति के बाद हास्य-व्यंग्य सरकार की भृकुटी चढ़ा देते थे। इसके चलते चंचल व्यंग्य भूमिगत हो गया था। उसने अपना स्थान बदल दिया था, पर अपना स्वभाव और भूमिका नहीं बदली थी। सार्वजनिक अभिव्यक्ति भूमिगत हो गई थी और अंदर ही अंदर उसने शासन की नीव खोखली कर दी थी। चक्रवर्ती यूनियन आॅफ सोशलिस्ट सोवियत रिपब्लिक यानी यूएसएसआर टूट कर महज रूस में तब्दील हो गया था। नाजी जर्मनी, फासिस्ट इटली, कम्युनिस्ट पोलैंड, तानाशाही यूगांडा आदि को भी मजाक पसंद नहीं था और इसीलिए अंतत: खुद एक भद्दा मजाक बन कर रह गए थे।

वैसे टंÑप जैसे राष्ट्रवादी अपने को अत्यधिक गंभीरता से लेते हैं। वे अपने को हाड़ मांस का जननायक नहीं, बल्कि मानव जाति को दिया गया ईश्वरीय वरदान मानते हैं। वे अमोघ हैं। टंÑप का दुर्भाग्य यह है कि वे अमेरिका में हैं, जहां पर मूल लोकतांत्रिक संस्थाएं अभी तक कर्तव्यविमुख नहीं हुई हैं। वे कार्टूनिस्ट की बलि नहीं ले सकते हैं। इमरान तन्जीम में हलाल वाजिब रिवयात है। जम्हूरियत के नुमाइंदे एक झटके में नाफरमानी को हलाल करने से नहीं चूकते हैं। विडंबना यह है कि इस चलन के शिकार खुद कई वजीर-ए-आजम हो चुके हैं। औरों को कुर्बान करने के चक्कर में खुद शहीद हो गए हैं। हास्य और व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष के विरोधी नहीं हैं। ये तीर आपसदारी में छोड़े जाते हैं। इनका उद्देश्य अपमान करना या चोट पहुंचना नहीं होता, बल्कि अपने मन का बोझ साझा करना होता है। यह एक सकारात्मक मानवीय प्रवृत्ति है। जिसने इसे स्वीकार किया है, वह लाभान्वित हुआ है। नकारने वाले का इसने नरक तक पीछा किया है।

हास्य-व्यंग्य कलात्मक अभिव्यक्ति है। इसकी मर्यादा स्वयं में निहित है। इसको हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। यह व्यवस्था बेलगाम, अमर्यादित उन्हीं लोगों को दिखती है, जो खुद को शीशे के आगे खड़े करने में हिचकिचाते हैं और जब शीशा बरबस सामने आ जाता है तो ये खुद से ही शर्मिंदा होकर आंदोलित हो जाते हैं। वे शीशा तोड़ कर अपराध भाव से मुंह मोड़ लेते हैं। वे भूल जाते हैं कि शीशे के जितने टुकड़े होंगे उतने ही प्रतिबिंब भी बनेंगे। पहले विकृति सिर्फ एक आईने से झलकती थी, अब सौ से दिखेगी। ठीक वैसे ही जैसे एक कार्टून जो एक अखबार में छप कर खत्म हो गया था, आज हजार लबों पर सुर्ख रूह होकर चमक रहा है। जीता व्यंग्य ही है। बाकी सब हार गए हैं, जल्द ही फना भी हो जाएंगे।

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