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नदियों का जीवन

मानव जीवन के लिए जैसे शरीर में आक्सीजन का होना आवश्यक है, वैसे ही गंगा यमुना या अन्य नदियां भी न मरें, इसके लिए आक्सीजन का उनके पानी में होना आवश्यक है। मगर नदियों में सीवरेज और रासायनिक अपशिष्टों के बहाव से आक्सीजन की कमी से जलचरों की मौत बढ़ती जा रही है।

Author Published on: November 10, 2019 1:45 AM
गंगा।

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

जल जीवन मिशन का एक प्रमुख लक्ष्य है 2024 तक हर घर तक पेयजल पहुंचाना। अभी देश के आधे घरों में ही ऐसी सुविधा है। उनमें भी पानी चौबीस घंटे नहीं, औसतन दो घंटे, कभी-कभी तो कुछ मिनट और कुछ स्थानों पर एक दो दिन छोड़ कर पहुंचता है। हालांकि भारतीय मानकों में सुचारु जल आपूर्ति व्यवस्था वह मानी गई है जब प्रति व्यक्ति प्रति दिन चालीस लीटर साफ पेयजल उपलब्ध हो। पर विकास के साथ और विकास के लिए भी पानी की मांग बढ़ जाती है। एक व्यक्ति की स्वास्थ्य जरूरतों, जैसे साफ-सफाई, खाने-पीने आदि में औसतन करीब पच्चीस लीटर पानी लग जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू आवश्यकताओं के साथ पशुओं के लिए पेयजल की जरूरत भी जुड़ी होती है। देश के करीब एक चौथाई क्षेत्रों में, जो अक्सर सूखाग्रस्त रहते हैं, आसपास जल स्रोतों के न होने से इस मानक पर खरे उतर पाना मुश्किल होता है।

फिलहाल हर घर तक पेयजल पहुंचाने के लिए अगले पांच सालों में वर्तमान प्रयासों के चौगुने प्रयास करने होंगे। इस बीच दिक्कत यह भी बढ़ती जा रही है कि उपलब्ध जलस्रोत भी प्रदूषित होते जा रहे हैं। इसलिए जल के शुद्धीकरण में बहुत अधिक समय और धन लग रहा है। पानी को बिना उपचारित किए और सुरक्षित बनाए सीधे घरों में पीने के लिए नहीं भेजा जा सकता है। पर दुखद यह भी है कि अस्सी प्रतिशत पानी, जो घरों में पहुंचता है, बेकार मान कर बहा दिया जाता है।

अभी भारत में करीब आधी जल आपूर्ति भूमिगत जल से होती है। पर अत्यधिक दोहन और सर्वत्र सतह पर सीमेंट कंकरीट से बनी सड़कों, भवनों आदि के विस्तार से बरसाती पानी के भूजल भंडारों में पहुंचने की राह मुश्किल होती जा रही है। परिणाम स्वरूप खासकर नगरों, महानगरों में भूमिगत जलस्तर बहुत गहराई में पहुंच गया है। साथ ही पास की खेती, उद्योगों या कूड़े-कचरे के भूमिगत जलभंडारों को प्रदूषित भी कर रहे हैं। इस कारण अब चिह्नित हैंडपंपों पर यह चेतावनी देने के लिए निशान भी लगाए जा रहे हैं कि इन हैंडपंपों का पानी पीना घातक हो सकता है। दूसरी तरफ उन प्रसिद्ध विशाल झीलों, तलाबों में भी, जिनसे दशकों से नगरों, महानगरों और राज्यों की राजधानियों को पेयजल आपूर्ति होती रही है, कूड़ा-कचरा, मलमूत्र और प्रदूषण का जमवाड़ा होता जा रहा है। इन झीलों का परिमाप भी कम होता जा रहा है। इसलिए आवश्यकता है कि जल जीवन मिशन के लक्ष्यों को पाने के लिए नदियों की क्षमता और संभावनाओं का भी विवेचन हो।

देश में चार सौ से ज्यादा नदियां हैं। राष्ट्रीय नदियों के संरक्षण के लिए एक अलग निदेशालय भी है। कुछ नदियां बंगाल की खाड़ी में जाती हैं, कुछ अरब सागर में। नदियों से निकली नहरें भी कई नगरों-महानगरों में पेयजल आपूर्ति की प्रमुख स्रोत होती हैं। मगर नदियां भी निरंतर नए संकटों में घिरती जा रही हैं। मनुष्य ही इसके लिए मुख्य रूप से दोषी है। अनुपचारित और तथाकथित उपचारित जल-मल, कूड़ा-कचरा और मलबा पहुंचने से नदियों का जल पीने की बात तो छोड़िए, नहाने लायक भी नहीं रह गया है। आज नदियां मर रही हैं और मारी भी जा रहीं हैं। अगस्त, 2018 में एनजीटी को गंगा के संदर्भ में बताया गया था कि गंगा पर स्थापित सत्तर मॉनीटिरिंग स्टेशनों में से केवल पांच के क्षेत्र में गंगा का पानी पीने और सात में नहाने योग्य है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार कावेरी, कृष्णा, गोदावरी और नर्मदा की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है।

अपने में प्रचुर जल प्रवाह से कुछ हद तक स्वयं को प्रदूषण मुक्त करने की जो ताकत नदियों को मिलती है, आज वे स्थितियां भी खासकर जलविद्युत्त परियोजनाओं के लिए बने बांधों से खत्म होती जा रही हैं। नदियों और वन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर मानवीय असंवेदनशीलता और गिद्ध दृष्टि भारत में ही नहीं है। पूरे विश्व में ऐसी स्थितियां हैं। इसलिए पृथ्वी और मानव मात्र को बचाने के लिए प्रकृति संरक्षण के उपायों के अंतर्गत प्राकृतिक संसाधनों को जीवित मानव का दर्जा दिए जाने की मुहिम जोर पकड़ रही है।

पूरी दुनिया में नदियों को व्यक्ति के रूप में वैधानिक मान्यता देने का उद्देश्य लोगों को नदियों से उनके व्यवहार में ज्यादा जिम्मेदार बनाना है। इक्वेडर प्रकृति को वे सारे मौलिक अधिकार देता है, जो मनुष्य को हासिल हैं। इसके अंतर्गत प्रकृति को बने रहने, अपने रखरखाव और अपने तथा अपने चक्रों को पुनर्जीवित करने और अपने कार्य करने का अधिकार है। 20 मार्च, 2017 को गंगा, यमुना को जीवित मनुष्य जैसा माने जाने के नैनीताल हाईकोर्ट के आदेश से भारत को भी दुनिया में विकसित होती इस वैधानिक प्रणाली और वैधानिक सोच में आगे बढ़ने का मौका मिला था, मगर वह फिलहाल इससे चूक गया है। क्योंकि इस आदेश पर केंद्र और राज्य सरकार की आपत्तियों के कारण 7 जुलाई, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने स्थगन आदेश मिल गया था।

आदेश में कहा गया था कि नदियां सांस लेती हैं, वे जिंदा हैं। पर्वतों से लेकर सागर तक ये नदियां समुदायों के जीवन को बनाए रखती हैं। भौतिक और सामाजिक सांस्कृतिक तौर पर लोगों का नदियों से संबंध है, इसलिए भी इनको वैधानिक मानव का दर्जा देकर समाज की आस्था को बचाना है। गंगा दुनिया की पांचवीं सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी है। गंगा के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने स्वयं नर्मदा नदी को वैधानिक मानव का दर्जा दे दिया था। मानव जीवन के लिए जैसे शरीर में आक्सीजन का होना आवश्यक है, वैसे ही गंगा यमुना या अन्य नदियां भी न मरें, इसके लिए आक्सीजन का उनके पानी में होना आवश्यक है। मगर नदियों में सीवरेज और रासायनिक अपशिष्टों के बहाव से आक्सीजन की कमी से जलचरों की मौत बढ़ती जा रही है।

सबको पेयजल देने के सपने को पूरा करना है, तो नदियों को जिंदा रखने की मुहिम आवश्यक है। प्रदूषित नदियां अपने पार्श्व के भूजल स्रोतों को भी क्षैतजिक रिसाव से प्रदूषित कर सकती हैं। अगर हम नदियों को जीवित व्यक्ति-सा मान लें, तो नदियों को जिंदा रखने के लिए हमारे प्रयास नई ऊर्जा और नए विकल्प पा सकते हैं। नदियां स्वस्थ और जिंदा रहेंगी, तो नदियों में आया पानी देर-सबेर घर में आए पानी का हिस्सा हो जाएगा।

देश में नदियों की सफाई की सोच 1985 में गंगा की सफाई योजना से बनी थी। नदियों को वैधानिक मानने की भी सोच को जमीन देने का काम गंगा के वैधानिक मानव स्तर को वैधानिकता देकर होनी चाहिए। हमें उन्हें केवल हमारी सेवा विकास के लिए संसाधन नहीं माना चाहिए। केंद्र सरकार ने तो अक्तूबर, 2010 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने अपने अटॉर्नी जनरल के माध्यम से दिए गए शपथ पत्र से सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 2020 तक गंगा प्रदूषण मुक्त कर दी जाएगी। 2020 तो दरवाजे पर ही है।

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