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नक्सलवाद का नासूर

केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न मंत्रालयों की प्रमुख योजनाओं के अलावा वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों के लिए विशिष्ट पहल की गई है, जिसमें प्रमुख तौर पर सड़क और टेलीकॉम कनेक्टिविटी में सुधार, वित्तीय समावेशन, कौशल विकास तथा शिक्षा शामिल हैं।

रायपुरछत्तीसगढ़ में नक्सलियों की आगजनी में जली जेसीबी और ट्रैक्टर (फोटो सोर्स – ANI)

विवेक ओझा

इस वक्त देश के ग्यारह राज्यों के नब्बे जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित हैं। इनमें झारखंड के कुल तेईस में से उन्नीस जिलों को नक्सल और माओवाद प्रभावित माना गया है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मताबिक वित्त वर्ष 2017-18 और 2018-19 के लिए झारखंड के तेरह जिलों को विशेष केंद्रीय सहायता के तहत वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए क्रमश: अस्सी करोड़ और दो सौ साठ करोड़ रुपए निर्गत किए गए हैं। नक्सलवाद और माओवाद से निपटने के उद्देश्य से इस वर्ष जुलाई में केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता में वामपंथी उग्रवाद (एलडब्ल्यूई) को लेकर समीक्षा बैठक की गई, जिसमें प्रमुख सचिव, प्रभावित राज्यों के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), खुफिया ब्यूरो के निदेशक (डीआईबी), केंद्रीय सशस्त्र बलों के महानिदेशक शामिल हुए। इस समीक्षा बैठक में निष्कर्ष रूप में कहा गया कि पिछले पांच वर्षों में वामपंथी उग्रवाद की हिंसा में लगातार कमी आई है और भौगोलिक रूप से भी इसके प्रभावित क्षेत्रों में गिरावट दर्ज की गई है।

जब 2018 में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों को लेकर समीक्षा बैठक हुई थी, उसमें पाया गया था कि वामपंथी उग्रवाद का प्रभाव एक सौ छब्बीस जिलों से कम होकर बयासी जिलों तक सिमट गया है, लेकिन सावधानी के तौर पर आठ और जिलों को इस सूची में जोड़ लिया गया है। इसके साथ ही वर्ष 2018 में चौवालीस जिलों को वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों की सूची से बाहर निकाल दिया गया था। सरकार का मानना है कि उसकी नीतियां, सामाजिक-आर्थिक समावेशन रणनीति, सुरक्षा बलों का आधुनिकीकरण और अन्य ठोस उपाय इस स्तर पर किए गए कि सरकार को इस मामले में सफलता मिली। राज्यों की ओर से सुरक्षा के संबंध में उनकी चिंताओं और सुझावों को दर्ज किया गया। वामपंथ उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र में तैनात सुरक्षा बलों की कार्य स्थिति में सुधार करने और उन्हें प्रभावी बनाने के लिए मोबाइल कम्युनिकेशन पर भी चर्चा की गई।

हाल ही में भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने वामपंथी उग्रवाद और विशेषकर नक्सलवाद से निपटने में मिली सफलता पर आंकड़े प्रस्तुत किए हैं। 2014 से अप्रैल, 2019 के दौरान इसके पहले के पांच वर्षों की तुलना में नक्सली हिंसा से जुड़ी घटनाओं में तैंतालीस फीसद तक कमी आई है। गृह मंत्रालय के अनुसार नक्सली हिंसा की दो-तिहाई घटनाएं सिर्फ दस जिलों में हुई हैं। भारत सरकार का मत है कि नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के कारण नक्सली हिंसा और इसके भौगोलिक विस्तार में कमी आई है। 2016-19 के बीच नक्सली हिंसा की संख्या 2013-15 की तुलना में 15.8 फीसद कम रही, और इस कारण होने वाली मौतों की संख्या में भी 16.6 फीसद कमी आई। केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि वह नक्सलवाद से निपटने के लिए एक समग्र नीति लागू कर रही है। इसके तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षाबलों की तैनाती करने के साथ ही विकास कार्य किए जा रहे हैं। इसी का परिणाम है कि माओवाद से प्रभावित अब केवल दस राज्य- छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश हैं, जो आंतरिक सुरक्षा के समक्ष चुनौती उत्पन्न करते हैं।

वामपंथी उग्रवादी विचारधारा से प्रभावित होकर की जाने वाली नक्सली और माओवादी हिंसक गतिविधियां भारत की आंतरिक सुरक्षा के समक्ष एक बड़ा खतरा हैं। शासन तंत्र, पूंजीपति और उद्योगपतियों को संदेह की नजर से देखने वाले नक्सली और माओवादी लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के खिलाफ अपनी समानांतर सरकार चलाने में विश्वास रखते हैं। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव, विकास के लाभों का समतामूलक वितरण न होना, गरीबी और बेरोजगारी आदि के चलते उग्रवाद का प्रसार हुआ है। जनजातीय समुदाय में अत्यंत रक्ताल्पता और अन्य बीमारियों से होने वाली मौत, जीविका के साधनों का अभाव, लघु वन उत्पादों के स्वामित्व को छीनने, भूमि स्वामित्व और अधिग्रहण के मामलों के फलस्वरूप उत्पन्न विस्थापन और सामाजिक आर्थिक बहिष्करण आदि आधारों पर वामपंथी उग्रवादी सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न खड़े करते हैं।

भारत सरकार ने इससे निपटने के लिए इन क्षेत्रों में समावेशी विकास की रणनीति अपनाई है। सबसे पहले इन क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन पर बल दिया गया है। इन क्षेत्रों में डिपार्टमेंट आॅफ पोस्ट्स ने वित्तीय समावेशन के लिए बत्तीस वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में प्रथम चरण में 1788 ब्रांच पोस्ट आॅफिस (142 महाराष्ट्र में) की स्वीकृति दी है, जिसमें से 1484 ब्रांच पोस्ट आॅफिस कार्यशील हो चुके हैं। इसके अलावा डिपार्टमेंट आॅफ फाइनेंशियल सर्विसेज ने वर्ष 2015 से 2018 के अंत तक तीस सर्वाधिक वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में 604 नई बैंक शाखाएं और 987 एटीएम स्थापित किए हैं, जिससे इन क्षेत्रों में वित्तीय सेवाओं और सुविधाओं को बढ़ावा दिया जा सके। इसके अलावा इन क्षेत्रों में रूपे डेबिट कार्ड को निर्गत करने और बैंक मित्रों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की भी सिफारिश की गई है। नाबार्ड ने भी भारत के अनुसूचित बैंकों को ऐसे क्षेत्रों में बैंक शाखाएं खोलने में मदद करने और सौर शक्ति वाले वीसैट कनेक्टिविटी देने का भी प्रस्ताव किया है।

सामाजिक समावेशन के तहत इन क्षेत्रों में जीविकोपार्जन के लिए रोशनी नामक स्कीम चलाई गई थी, लेकिन भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने अब समाधान नामक रणनीति बनाई है, जिसमें कुशल नेतृत्व, आक्रामक रणनीति, प्रोत्साहन एवं प्रशिक्षण, कारगर खुफिया तंत्र, कार्ययोजना के मानक, कारगर प्रोद्यौगिकी, प्रत्येक रणनीति की कार्ययोजना और नक्सलियों के वित्तपोषण को विफल करने की रणनीति को शामिल किया गया है। हाल में भारत सरकार द्वारा अवसंरचनात्मक विकास और सुरक्षा बलों के आधुनिकीकरण और आसूचना प्रणालियों को मजबूती देने के चलते वामपंथी उग्रवादी में अधोमुखी प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। इसके अलावा पुलिस बलों का आधुनिकीकरण भी किया जा रहा है। उग्रवाद प्रभावित राज्यों में स्थानीय पुलिस की सतर्कता और दक्षता के बिना वामपंथी उग्रवाद समाप्त नहीं किया जा सकता, इसलिए उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न मंत्रालयों की प्रमुख योजनाओं के अलावा वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों के लिए विशिष्ट पहल की गई है, जिसमें प्रमुख तौर पर सड़क और टेलीकॉम कनेक्टिविटी में सुधार, वित्तीय समावेशन, कौशल विकास तथा शिक्षा शामिल हैं।

इस दशकों पुरानी समस्या से निपटने के लिए, संबंधित राज्य सरकारों के साथ विभिन्न उच्चस्तरीय विचार-विमर्श के बाद यह उपयुक्त समझा गया है कि तुलनात्मक रूप से अधिक प्रभावी क्षेत्रों के लिए एकीकृत दृष्टिकोण के परिणाम मिलेंगे। इसे ध्यान में रखते हुए वामपंथी उग्रवादी हिंसा के संबंध में इसके विस्तार और प्रवृत्तियों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है और योजना तैयार करने, विभिन्न उपायों के क्रियान्वयन और उनकी निगरानी के संबंध में विशेष ध्यान देने के लिए ग्यारह राज्यों में नब्बे सर्वाधिक प्रभावित जिलों को लिया गया है। इसके पीछे सोच माओवादी खतरे से एक ठोस तरीके से निपटने के लिए राज्य सरकारों की क्षमता में वृद्धि करने की है।

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