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तीरंदाज: जन-संवाद ही रास्ता

हाल-फिलहाल मीडिया के प्रचार-प्रसार का जो मॉडल है, उसे तुरंत उलटा नहीं जा सकता। बाजार की ताकत उसके पीछे है और कोई भी प्रत्यक्ष हमला वह बर्दाश नहीं करेगा। बाजार संगठित है, उसके पास संसाधन हैं, लठैत भी हैं। इस स्थिति में धीरे-धीरे उसकी जमीन काटनी होगी। पत्रकार को जन-संवाद में जनता को जोड़ना होगा।

Author Updated: October 20, 2019 1:52 AM
आज मीडिया खबरनवीस कम रह गया है और मत-वक्ता ज्यादा हो गया है।

शक के माहौल में पत्रकारिता और पत्रकार की क्या कोई भूमिका हो सकती है? वैसे पत्रकारिता शायद अब है और नहीं भी है। है, क्योंकि कहा जाता है कि मीडिया की पहुंच और प्रभाव अंतिम व्यक्ति तक है। नहीं इसलिए है, क्योंकि पहुंच और प्रभाव होने के बावजूद मीडिया के पास अपना कहने के लिए कुछ नहीं है। वह तो वही सुन और कह रहा है, जो उसके कान में और जुबान पर बाजार के कारोबारी फूंक रहे हैं।

बाजार मंत्र के तहत मीडिया सरस्वती को छोड़ कर लक्ष्मी का भक्त हो गया है और इस भक्ति के चलते मीडिया ‘बिग पर्पस आॅफ पोलिटिकल कॉमर्स’ का जरखरीद लठैत हो गया है। पोलिटिकल कॉमर्स या राजनीतिक वाणिज्य का बड़ा उद्देश्य है और वह है व्यक्तिगत स्वार्थ को सार्वजनिक हित के रूप में पेश करना, उस पर तथाकथित जन-सहमति प्रायोजित करना और फिर उससे भरपूर लाभांश अर्जित करना।

इस पूरे बिजनेस मॉडल में मीडिया की शायद सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका है। महत्त्वपूर्ण इसलिए, क्योंकि मीडिया ही तथाकथित जन-सहमति की आपूर्ति करने में सक्षम है। अपनी पहुंच की वजह से वह जनमत संग्रह का ढोंग कर सकता है और फिर स्वतंत्र स्तंभ होने का दावा कर के निजी स्वार्थ को सार्वजनिक हित का जामा पहना सकता है।

यह सब थोड़ा-बहुत पहले भी होता था, पर आटे में नमक जितना। जन-संवाद या पब्लिक डिस्कोर्स की गंगा को उलटी बहाने की सोचना भी पत्रकारिता में पाप माना जाता था। पत्रकार हस्तक्षेक नहीं करते थे, सिर्फ पब्लिक डिस्कोर्स को रिपोर्ट करते थे। बाजार के निजी स्वार्थों के लिए यह तथस्ट भूमिका काफी नहीं थी। धीरे-धीरे पत्रकारिता मीडिया हो गई, पत्रकार मीडियाकर्मी हो गए और समाचार पत्र, न्यूज चैनल्स मीडिया आउटलेट बन गए।

जो पत्रकार पहले लोगों से बैठ कर आत्मीयता से हाल लिया करते थे, मीडियाकर्मी के अवतार में हमारे आपके घर में घुस कर अपनी लाठी तब तक भांजते हैं जब तक हम डर-सहम कर या तो चुप नहीं हो जाते हैं या फिर हामी नहीं भर देते हैं। निजी स्वार्थों के जमींदारों के मीडिया लठैतों की जिम्मेदारी जन-सहमति की डिलीवरी है, उसी के उसे पैसे मिलते हैं और बाजार की वाहवाही।

आज मीडिया खबरनवीस कम रह गया है और मत-वक्ता ज्यादा हो गया है। खबरों को हाशिए पर ढकेल कर मीडिया मत-प्रवक्ता भी होने की भरपूर कोशिश करता है। ओपिनियन को ‘न्यूज’ बना कर पूरी पहलवानी से न्यूज दंगल में उतरा जा रहा है। सारा प्रयास है कि ‘खबरों’ का खेला हो, खबर बिके, चले और उससे बाजार के दादाओं की स्वार्थ सिद्धि हो।

गौर से अपने टीवी स्क्रीन पर देखें और आपको समझ में आ जाएगा की मीडिया मत-प्रवक्ता किस तरह जनमानस के साथ फुटबाल खेल रहे हैं और बाजार के लिए लोकमत के दनादन गोल दाग रहे हैं। सारी चीख चिल्लाहट इसीलिए है। शोर प्रायोजित किया जा रहा है, क्योंकि सबको चुप कराने के लिए कुछ लोगों का शोर मचाना जरूरी है।

बाजार की हरकत परवान तभी चढ़ सकती है, जब टोकने वाले सुन्न पड़े हों। शोर, कठमुल्ला प्रवचन और लोकमत की चिंघाड़, नुमाइंदगी की शोखियों में बुद्धिजीवी सुर मिलते ही सुन्नाहट एक काले बदल की तरह सबको निगल जाती है। जनचेतना, लोकमत या पब्लिक इंटेरेस्ट को सुन्न करना ही मीडिया का काम है, क्योंकि इसी अंधेरे में राज्य का व्यापार हो सकता है।

मीडिया और बाजार की खेला-खेली में एक गंभीर विडंबना उत्पन्न हो गई है। पत्रकार का सीधा रिश्ता देश के नागरिक (यानी आम आदमी, पर यहां आम आदमी कहना ठीक नहीं होगा, उसके और मतलब लग सकते हैं) से था। पत्रकारिता उसी के लिए है, उसी की है और उस पर ही निर्भर है। पत्रकार की गणेश प्रक्रिमा वही है। पर पत्रकारिता के मीडिया होते ही बाजार ने नागरिक को पब्लिक डिस्कोर्स से अपहृत कर लिया। यानी लोकतंत्र से लोक अपहृत होकर तंत्र का बंदी है।

पब्लिक और पब्लिक इंटरेस्ट लोकतंत्र के जीवन प्राण हैं। इन्हीं की वजह से वह चलता फिरता है, सोचता और करता है। सार्वजनिक हित के बिना लोकतंत्र सड़ी हुई लाश है। मीडिया आउटलेट इसी लाश के गिद्ध हैं। दूसरी तरफ पत्रकार एक स्वस्थ नागरिक की रोशन आंखें, बातूनी जुबान और सर्वजन हिताय सोच है। बाजार लाश चाहता है, तो पत्रकार जीवंत प्राणी। इस जद्दोजहद में पत्रकार की भूमिका सबसे अहम है। सार्वजनिक हित पर जो संकट है, उसे किसी भी तरह हराना होगा और जन-संवाद में अपना स्थान बाजार से छीनना होगा।

पर हाल-फिलहाल मीडिया के प्रचार-प्रसार का जो मॉडल है, उसे तुरंत उलटा नहीं जा सकता। बाजार की ताकत उसके पीछे है और कोई भी प्रत्यक्ष हमला वह बर्दाश नहीं करेगा। बाजार संगठित है, उसके पास संसाधन हैं, लठैत भी हैं। इस स्थिति में धीरे-धीरे उसकी जमीन काटनी होगी। पत्रकार को जन-संवाद में जनता को जोड़ना होगा।

वस्तुत: जन भागीदारी ही स्वस्थ और निरपेक्ष पत्रकारिता का मूल मंत्र और ब्रह्म प्राण है। इसी से एक अद्भुत लोकतंत्र की रचना हो सकती है। जन-भागीदारी में ही पत्रकारिता का भविष्य है और पत्रकारों को इसे फिर से गढ़ के उसमें प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी।

पर ऐसा होगा कैसे? टेक्नोलॉजी और पत्रकारों की साझेदारी से। वे दिन गए, जब पत्रकार एक व्यक्ति विशेष होने की वजह से अलग-थलग पड़ा था। टेक्नोलॉजी ने आज उसे अपने जैसे लोगों से और लोक समहू से जोड़ दिया है। वह मंच के लिए मीडिया आउटलेट पर निर्भर नहीं रह गया है। आज भी और भविष्य में और ज्यादा उसके पास ऐसे मंच होंगे, जिनका प्रसार, प्रभाव और पहुंच मीडिया आउटलेट से कम नहीं होगी।

हो सकता है कि आज अकेला चना भाड़ न फोड़ पाए, पर बहुत सारे चने जब एक भाड़ में इकट्ठा होकर उछल-कूद मचाएंगे तो भाड़ पर असर जरूर आएगा। आज नहीं तो कल, भाड़ फूट ही जाएगा।

वस्तुत: कल की पत्रकारिता मत-वक्ता और सूचना प्रधान मीडिया आउटलेट से हट कर सामुदायिक बातचीत के मॉडल पर आधारित होगी। पत्रकार इस बातचीत का जरूरी हिस्सा होंगे। वे जन करलव, सुगबुगाहट, लोक बहस या आक्रोश को सिर्फ दर्ज नहीं करेंगे, बल्कि उसको बड़े लोक-संवाद से भी जोड़ेंगे।

दूसरे शब्दों में, पत्रकार की भूमिका किसी मॉडरेटर की तरह होगी, जो हर तर्क को मौका देगा, एक तर्क को दूसरे तर्क से जोड़ेगा और फिर बातचीत में भागीदारों के विशेष बिंदुओं से उन्हीं की बात का उन्ही के लिए निष्कर्ष निकालेगा। इसी से हर नागरिक को अपनी नागरिकता का पूरा लाभ और संतुष्टि मिलेगी तथा पत्रकारिता को उसकी गरिमा, विश्वनीयता और चौथा स्तंभ होने का वास्तविक गर्व होगा।

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