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इतिहास और कल्पना की जुगलबंदी

इधर एक बार फिर से इस बात को लेकर चर्चा शुरू हुई है कि ऐतिहासिक तथ्यों को आधार बना कर रचा जाने वाला गल्प कितना विश्वसनीय होता है। कथा में कितना इतिहास हो सकता है और इतिहास में गल्प को कितनी जगह दी जा सकती है। चिंता इस बात को लेकर भी जताई जाती रही है कि जब ऐतिहासिक चरित्र कथा में उतरते हैं, तो उनके साथ न्याय नहीं हो पाता। जबकि कुछ लोगों का तर्क है कि ऐतिहासिक पात्र कथा में उतरते हैं, तो कल्पना की बुनावट में उनका प्रभाव बढ़ जाता है। इस बार की चर्चा इतिहास और गल्प के परस्पर संबंधों पर। - संपादक

Author January 27, 2019 4:20 AM
प्रतीकात्मक फोटो

आनंद कुमार सिंह

इतिहास केवल तथ्य-निरूपण नहीं है, वह तथ्यों की रचनात्मक खोज भी है, व्याख्या और संरचना भी है। उत्तर-आधुनिक अवधारणाओं में इतिहास की व्याख्या वस्तु-विश्लेषण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह इस सीमा से आगे निकल कर कल्पना के तट को भी स्पर्श करने लगी है। आज इतिहास के दायरे में लोकाख्यान और लोकवृत्त भी समाहित हो गए हैं, जिसमें जीवन की वस्तुपरकता के पीछे चित्तवृत्तियों का फैलाव अधिक महत्त्वपूर्ण है। उनके कारण ही क्रमानुगत रूप से अतीत का विकास हुआ है, क्योंकि इतिहास को आगे बढ़ाने में मशीनी नियम नहीं काम करते, उन्हें मानव की चित्तवृत्तियां ही आगे ठेलती हैं। ऐतिहासिक फलक पर जीवन की छोटी-छोटी घटनाएं या जीवन-संघात ही वह प्रबल कारक है, जो जीवन को आगे की ओर फैलाता चलता है। इतिहास जीवन-संघात की जिस संवेदना को बाहर से ग्रहण करता है उसे ही साहित्य भीतर से पकड़ता है। दरअसल, इतिहास और साहित्य मनुष्य की संवेदन-क्षमताओं के दो रूप हैं, जो उन विवशताओं को रेखांकित करते हैं, जिनसे स्वयं मानव और मानव-समुदाय पारस्परिक संघर्षात्मक अंत:क्रियाओं, जीवन-संवेगों और गुणात्मक प्रतिफलनों से टकराते हुए अपने आप को पूरी गंभीरता से प्रकट करता है।

सत्तर के दशक में इतिहास को देखने और व्याख्यायित करने वाले ईएच कार और जीआर एल्टन की बहसों के बाद इतिहास और उसके प्रस्तुतीकरण की भाषिकी पर तथा साहित्य में इतिहास के उपयोग पर आज फिर से विचार होने लगा है। एक अत्याधुनिक इतिहास दार्शनिक रिचर्ड एवंस के अनुसार इतिहास बनाम कल्पना का मुद्दा भी फिर से ताजा हो गया है, जिसमें इतिहास को ‘डिफेंड’ करना जरूरी है। प्रश्न है कि क्या कल्पना और इतिहास दोनों को मिल कर चलना चाहिए या अलग-अलग अथवा इतिहास केवल तथ्य-निरूपण करने वाले सत्य की खोज है या वह भी साहित्य या भाषिकी का ही एक दूसरा स्वरूप है, जिसके लिए सत्य बहुआयामी अनुभव है?

दुनिया भर में साहित्य की लगभग सभी महत्त्वपूर्ण विधाओं में ऐसी रचनाएं आई हैं, जिनमें इतिहास का उपजीव्य विद्यमान है। ऐतिहासिक घटनाओं की आधारिकी पर महाकाव्यों की रचना पहले से होती रही है। पिछले साठ-सत्तर वर्षों में हिंदी में जो उपन्यास लिखे गए हैं उनमें भी इतिहास के ‘द्रव्य’ का खूब उपयोग किया गया है। रांगेय राघव का ‘मुर्दों का टीला’ हो या राहुल सांकृत्यायन का ‘वोल्गा से गंगा’, यशपाल का ‘दिव्या’ हो या ‘अमिता’- इनमें इतिहास को जीवंत करने की कोशिश की गई है। यद्यपि भगवती चरण वर्मा के ‘चित्रलेखा’ उपन्यास को जैसी प्रसिद्धि मिली, वैसी किसी ऐतिहासिक उपन्यास को नहीं मिली। उसके बराबर अगर कोई उपन्यास टिक सका तो वह है आचार्य चतुरसेन की ‘वैशाली की नगरवधू’, पर साहित्यिक गहराई, विशद विवेचन और तलस्पर्शी दृष्टि के साथ भाषा के नए अवतार में प्रकट होकर जो उपन्यास कालजयी बन गया वह ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ ही है। वृंदावन लाल वर्मा की ‘विराटा की पद्मिनी’ और ‘मृगनयनी’ भी कम मोहक और महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। ये सभी उपन्यास इतिहास की नींव पर ही टिके हैं, लेकिन ये इसलिए महत्त्वपूर्ण नहीं हैं कि ये रचनाएं इतिहास के स्थूल और बाहरी पक्ष का साक्षी बन कर इतिहास को पुष्ट करने आई हैं, बल्कि ये इतिहास के कलेवर को ‘एक्सप्लोर’ और उसका विस्तार करती हैं। ऐसी रचनाओं में बीते हुए जीवन के सारे उजले और चटकीले रंगों के साथ ही धुमैले और मटमैले रंगों को भी पसरने-फैलने और खिलने का भरपूर अवसर होता है, जो इतिहास की बहिर्मुखी दृष्टि में अंट नहीं पाता।

प्राचीन काल में रामायण और महाभारत को इतिहास ही कहा गया था। उसका उद्देश्य ही था ऐतिह्य जीवन को तद्वत रच कर प्रस्तुत करना, जैसा वह मूलत: रहा होगा। इसीलिए इतिहास की परिभाषा में ही कहा गया है -‘इति ह आस’ यानी ऐसा ही था। तात्पर्य यह कि इतिहास एक पटल है रचनाकार के लिए, जिसमें घटित जीवन को भाषा में फिर से जीवित करके रख दिया गया है कि वह घटनाक्रम ‘ऐसा ही था’। इतिहास केवल वही नहीं है जिसकी विद्यमानता की पुष्टि होती है, बल्कि वह भी उसी रिक्थ का हिस्सा बन जाता है, जो इतिहास का सादृश्य-विधान रचता है। यह बिना कल्पना की शक्ति के संभव नहीं है। कल्पना केवल अघटित में प्रवेश नहीं करती, बल्कि वह विधायक कल्पना स्वयं एक नई और समांतर सृष्टि कर देती है, जिसमें इतिहास का भ्रूण पलने लगता है। कल्पना केवल ‘फैंसी’ तत्त्व नहीं, बल्कि वह ‘फैंटेसी’ भी है, जो अतीत के द्रव्य को संस्कारित कर मनचाहे स्वरूप में या इतिहास में घटित के समतुल्य ही कहानी रच देती है। अंतत: इतिहास भी एक कहानी होती है। जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ के अनुवाद के समय उसका नाम ‘हिंदुस्तान की कहानी’ रखा था, क्योंकि उनकी दृष्टि में इतिहास मूलत: एक कहानी ही है।

‘द मेडिटेरेनियन एंड द मेडिटेरेनियन वर्ल्ड’ के रचयिता फ्रांसीसी इतिहासकार ब्रोदेल ने कहा था कि सच्चा इतिहास केवल तथ्यपरक कल्पना के बल से ही लिखा जा सकता है। ‘डिक्लाइन एंड फाल आफ रोमन एंपायर’ का रचयिता एडवर्ड गिब्बन केवल इतिहासकार नहीं है, वह एक खूबसूरत रचनाकार है, जो राष्ट्रों के उत्थान-पतन को एक अन्य प्रसिद्ध इतिहासकार ‘स्टोरी आफ सिविलाइजेशंस’ के महान लेखक विल ड्यूरां की तरह ही दार्शनिक नजरिए से देखता है। यहां ‘स्टोरी’ और ‘हिस्ट्री’ में अंतर ही मिट जाता है। उसी शृंखला में ‘हिस्ट्री आफ औरंगजेब’ भी एक क्लासिक रचना है, जिसमें जदुनाथ सरकार औरंगजेब के अंतर्मन में प्रविष्ट होकर शिवाजी को गलती से छोड़ देने के अफसोस को एक साहित्यकार की संवेदना से देखते-दिखाते हैं। दरअसल, भाषा की रचनात्मकता और कल्पना की प्रौढ़ता के कारण ही ये सभी रचनाएं लोकप्रिय हुई हैं और ‘क्लासिक’ का दर्जा रखती हैं। विलियम डेलरिंपल को छोड़ कर आज ऐसे इतिहासकारों का अभाव नजर आता है, जो भाषा और कल्पना को केवल तथ्य बरतने के माध्यम की तरह नहीं, बल्कि विचार-निष्पत्ति के लिए साध्य बना कर प्रस्तुत करते हैं।

उपन्यासकार इतिहास के मलबे में दबे हुए जीवन का उत्खनन कर जीवन को फिर से जिंदा करता है और एक समांतर संसार का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। यही नहीं, जिन उपन्यासकारों ने मिथकीय घटनाओं के आधार पर अपना ताना-बाना बुना है उन्होंने भी इतिहासोपरि काल में छलांग लगाई है और ‘मिथमेकिंग’ का काम किया है। प्राय: घटनाओं के वृत्तांत को ही इतिहास समझने के पश्चिमी या अधिक सही अभारतीय आग्रहों के कारण भारत में लिखे गए पौराणिक आख्यानों को इतिहासेतर बताया गया, लेकिन आज जब इतिहास की दृष्टि में ‘पब्लिक-स्फीयर’ का महत्त्व समझ में आया है तब इतिहास को पुनर्सृजित करने के लिए लोकदृष्टि का महत्त्व बढ़ गया है। इसलिए साहित्य की दृष्टि में ही नहीं, बल्कि, इतिहास की अपनी दृष्टि में भी ऐसी कथाओं का महत्त्व रेखांकित होना चाहिए, जिसमें इतिहास को फिर से घटित कर मानवीय संवेदना और जीवन-संघात को उद्घाटित करने का काम किया गया है।

अगर उपन्यासकार के पास केवल भाषा की प्रतिभा है, लेकिन इतिहास की आंख नहीं है तो वह जो कुछ भी परोसेगा, वह अंधा साहित्य होगा। ठीक वैसे ही जिस तरह इतिहासकार के पास तथ्यों का जखीरा तो है, लेकिन रम्य और विधायक कल्पना के पंख नहीं हैं तो वह उड़ान नहीं भर सकेगा। उदाहरण के लिए इतिहास और कल्पना के प्रसंग में ‘अकबर’ उल्लेखनीय है। फ्रेडरिक आगस्टस, बर्क और विंसेंट स्मिथ की किताबों को पढ़ कर जितना हम अकबर को नजदीक से नहीं समझ पाते उससे कहीं ज्यादा उस पर लिखे उपन्यासों को पढ़ कर समझते हैं। शाजी जमां के उपन्यास ‘अकबर’ के अतिरिक्त इस विषय पर कोई महत्त्वपूर्ण औपन्यासिक कृति हिंदी में देखने में नहीं आई। इसमें मुगल दरबार के रस्मो-रिवाज के साथ ही अकबर के व्यक्तित्व को उद्घाटित करने का प्रयत्न किया गया है। इस संदर्भ में पिछले वर्षों में अंग्रेजी में प्रकाशित प्रदीप गर्ग के उपन्यास ‘अकबर ए फॉरगॉटेन लीगेसी’ को देख कर लगता है कि इतिहास और कल्पना मिल कर किसी महत्त्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर किस तरह खोज सकते हैं। अकबर की विडंबना यह है कि वह पाकिस्तान के इतिहास में नास्तिक और धर्मद्रोही के रूप में चित्रित है और भारत के इतिहास में एक वर्ग उसे धर्मविरोधी जिहादी मान कर चलता है। मध्यकालीन सीमाओं के भीतर उसके द्वारा किए गए सर्वधर्म सामंजस्य के वास्तविक प्रयत्नों के बावजूद आज भी उसके नायकत्व को स्वीकार नहीं किया जा सका है।

प्रदीप गर्ग ने इसका जवाब पाने की कोशिश की है कि संविधान में उल्लिखित जिस पंथनिरपेक्ष भारतीयता को हम समावेशी संस्कृति की पूर्व शर्त के रूप में देखते हैं उसका अग्रदूत तो अकबर था। लेकिन इतिहास और कल्पना के युगपत मेल से बने इस रसायन को हम अपनी राष्ट्रीयता का स्वाभाविक अंग नहीं बना सके हैं। सवाल है कि ऐतिहासिक उपन्यास क्यों लिखे जाएंगे, अगर वे उस उद्देश्य को उद्घाटित करने में सक्षम ही नहीं हैं, जिसके लिए वे लिखे जा रहे हैं। आजकल अंग्रेजी में इतिहास आधारित उपन्यास लेखन की बाढ़ आई हुई है, जिसमें सनसनीखेज बहुत है, लेकिन मानीखेज बहुत कम। साहित्य में इतिहास की दावेदारी या इतिहास में साहित्य की बैठकी से नया कुछ निकलता जरूर है, लेकिन मूल बात है कि इतिहास और कल्पना की जुगलबंदी का सहज सुर सध पाता है या नहीं। प्रदीप गर्ग ने इसका शायद एक रास्ता भी सुझा दिया है।

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