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अस्मिताओं का उभार और इतिहास

सामाजिक या व्यक्तिगत चेतना में किसी उपन्यास के कथानक का स्थापित होना कोई गलत बात नहीं है, जब तक उसका उद्देश्य केवल मनोरंजन या फिर कुछ अस्पष्ट-सा इतिहासबोध पैदा करना हो। समस्या होती है जब इसके साथ अस्मिता की राजनीति का घालमेल होता है।

Author January 27, 2019 4:27 AM
प्रतीकात्मक फोटो

मणींद्र नाथ ठाकुर

आधुनिक युग में इतिहास लेखन एक तरह की विधा है, जिसमें वैज्ञानिकता का आग्रह रहता है। इसका अर्थ यह है कि बिखरे हुए तथ्यों के आधार पर किए जाने वाले दावे को सर्वमान्य तर्कों के सहारे स्थापित किया जाता है। इसलिए अगर कुछ और तथ्य सामने आते हैं या उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कोई ज्यादा तार्किक दावा प्रस्तुत करता है तो इतिहासकारों के समुदाय को उसे मान लेना होगा। इन दावों के तार्किक आधार, यानी तर्क करने की प्रणाली पर भी बहस हो सकती है, लेकिन इतना तय है कि बिना इतिहासकारों के न्यायालय में मान्यता प्राप्त किए, उसे इतिहास नहीं कहा जा सकता। जबसे दुनिया भर में अस्मिता के आधार पर राजनीति का चलन बढ़ा है, इतिहास की यह मान्यता भी खतरे में है, क्योंकि अस्मिता की राजनीति के लिए एक कहानी गढ़ने की जरूरत होती है और उसके लिए भी सामग्री इतिहास से ही मिलती है। नतीजतन, जब नई ताकतें सरकार में आती हैं तो इतिहास के पुनर्लेखन का प्रयास करती हैं। भारतीय स्कूली किताबों में बार-बार किए जाने वाले परिवर्तनों को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।

संचार के नए माध्यमों के आ जाने से अब इतिहास से अपने पक्ष में कहानी गढ़ने के लिए अस्मिताओं को कई और रास्ते मिल गए हैं। पर अब भी सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम सिनेमा और साहित्य को ही माना जा सकता है, क्योंकि इसका व्यापक प्रभाव होता है। साहित्य की पहुंच आसानी से जनता तक हो जाती है और कई पीढ़ियों तक उसका प्रभाव बना रहता है। मसलन, आप आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यास ‘वैशाली की नगरवधू’ या ‘मृगनयनी’ को लें तो आपको आश्चर्य होगा कि बहुत से लोग इतिहास की इन घटनाओं को केवल इन्हीं उपन्यासों के माध्यम से जानते हैं। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है।

समस्या केवल इतनी है कि उपन्यास लेखन में लेखक को काफी स्वतंत्रता होती है। लेखक चाहे कितना भी शोधपूर्ण उपन्यास लिखे, इस विधा के साथ लाचारी है कि उसे पठनीय होना चाहिए। पाठकों की रुचि बनाए रखने के लिए कई बार उसमें नाटकीयता या समकालीनता का पुट होना भी जरूरी होता है। इसलिए उपन्यासकारों के लिए इतिहास लेखकों की शुद्धता संभव नहीं है। पर उपन्यास के माध्यम से लिखे हुए इतिहास को कमतर नहीं आंका जा सकता। बल्कि इसकी दो खासियत हो सकती है। एक तो कल्पना के आधार उस समय के बारे में बहुत कुछ लिखने की छूट मिल जाती है, जिसमें ऐतिहासिक सत्य हो ही, जरूरी नहीं है। दूसरा, साहित्यकारों का लेखन आम आदमी की चेतना में स्थापित हो जाता है।

यहीं से समस्या शुरू होती है। सामाजिक या व्यक्तिगत चेतना में किसी उपन्यास के कथानक का स्थापित होना कोई गलत बात नहीं है, जब तक उसका उद्देश्य केवल मनोरंजन या फिर कुछ अस्पष्ट-सा इतिहासबोध पैदा करना हो। समस्या होती है जब इसके साथ अस्मिता की राजनीति का घालमेल होता है। अस्मिताएं अपने आप को सुदृढ़ करने के लिए ऐसे हर मौके की खोज करती हैं, जिससे समुदाय के सोए हुए ओज को जगाया जा सके। साहित्य की पहुंच इतिहास की किताबों से ज्यादा है, इसलिए उसका संज्ञान भी जल्दी और ज्यादा लिया जाता है। साहित्य से भी ज्यादा समस्या है सिनेमा के साथ। इस माध्यम की खासियत है कि इसकी लागत बहुत ज्यादा होती है और इसका उद्देश्य लाभ कमाना होता है। उस लागत पर फायदा तभी संभव है जब लोग अपना टिकट खरीद कर उसे देखें। इस तरह के ऐतिहासिक घटनाओं या पात्रों पर सिनेमा बनाने का फायदा है कि उसके बनने के क्रम में ही चर्चा शुरू हो जाती है और लोगों में उसे उन पात्रों को जीवंत देखने की इच्छा से धन बटोरना संभव हो पाता है। निश्चित रूप से लोग इस तरह के सिनेमा को देखने केवल इतिहास जानने के लिए नहीं जाते हैं। इसमें मनोरंजन होना आवश्यक शर्त है और मनोरंजन के लिए संगीत, नृत्य, कामुकता आदि का होना भी जरूरी है। इन बातों से अस्मितावादी विचलित हो जाते हैं। बहुतों के लिए यही सही मौका होता है अस्मिताओं को सुदृढ़ करने और एकता का राजनीतिक लाभ लेने का। इसी का फायदा लेकर कई लोग अपनी राजनीति भी चमकाते हैं।

हाल में बहुचर्चित फिल्म ‘पद्मावत’ को ही लें। सैकड़ों वर्षों से जायसी की यह पुस्तक उपलब्ध है, जिसमें इस कहानी को आधार बना कर बहुत कुछ कहा गया है। जब यह लिखी गई थी, तब इस पर कोई असंतोष नहीं था। अब साहित्य के विद्यार्थियों के अलावा कोई इसे शायद ही पढ़ता होगा। लेकिन इस पर एक फिल्म बनी और हंगामा हो गया। फिल्म में कई दृश्यों पर कुछ लोगों को क्षोभ था। इसके विरोध में एक सेना ही बन गई। चारों तरफ हुड़दंग शुरू हो गया। अगर हम कुछ लोगों की इस इस बात को मान भी लें कि इस हंगामे के पीछे राजनीतिक दलों की साजिश थी, फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि इस फिल्म ने एक खास जाति की दुखती रग को छेड़ा होगा।

समझना मुश्किल है कि फिल्मों या साहित्य में इतिहास को आधार बनाते ही इतनी समस्या क्यों होती है और क्या ऐसा होना उचित है। एक पक्ष यह भी है कि जो लोग इतिहास के अध्येता नहीं होते, सिनेमा में वर्णित इतिहास ही उनके मानस का हिस्सा हो जाता है और अगर उसमें किसी समुदाय की छवि को खराब किया जाए, तो वही सामाजिक चेतना में जम जाता है। फिर उस समुदाय के जीवन पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ता है। चाहे कोई कितना भी बौद्धिक बहस कर ले कि सिनेमा को मनोरंजन के माध्यम की तरह ही देखना चाहिए, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर उसका दुष्प्रभाव किसी के जीवन या समुदाय की आत्म-छवि पर पड़ता हो तो उसे नजरंदाज करना संभव नहीं है।

अगर हम इस तर्क को मान लें तो फिर किसी ऐतिहासिक घटना पर सिनेमा बन ही नहीं सकता या फिर बनने के पहले समुदाय से अनुमति लेनी होगी। ये दोनों ही संभव नहीं हैं। फिर भी लेखकों, निर्माता-निर्देशकों को इतना खयाल तो जरूर रखना चाहिए कि अगर उनकी रचनात्मक स्वतंत्रता से समाज में कोई नकारात्मकता आ रही हो तो उसके बारे में सचेत हों। जहां तक हो सके अपनी कल्पनाशीलता को इतिहासकारों की स्थापित मान्यताओं की सीमा में रखने का प्रयास करें। अस्मिता की राजनीति के इस युग में यही उचित है कि जहां तक हो सके उनकी चिंताओं को रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर अपनी आय का साधन न बनाया जाए। रचनात्मक स्वतंत्रता का अर्थ सामाजिक संदर्भ में ही खोजा जा सकता है, अन्यथा वह अराजकता की सीमाओं को पार कर उपलब्ध स्वतंत्रता के लिए भी घातक हो सकता है। इससे अस्मिता की राजनीति को सामंतवादी हद तक ले जाने की जिद प्रबल हो सकती है। इसके कई उदाहरण हाल के दिनों में दुनिया भर में देखने को मिले।

हम निश्चित रूप से अपने समाज को रचनात्मक स्वतंत्रता के लिए तैयार करें, लेकिन यथार्थवादी आकलन के अनुसार उपलब्ध स्वतंत्रता के अंदर ही काम करें तो बेहतर है। बुद्ध का मध्यम मार्ग ही इसमें उचित है- ‘वीणा के तार को इतना ढीला न छोड़ें कि उससे आवाज ही न निकले और उसे इतना कसें भी नहीं कि वह टूट जाए।’ समाजनीति की यह समझ साहित्य और सिनेमा में इतिहास के पुनर्पाठ के लिए भी लागू होती है।

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