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नई शिक्षा नीति और भारतीय भाषाएं

शिक्षा नीति की सैद्धांतिकी, राजनीति, राष्ट्रवादी सोच और छात्रों पर पड़ने वाले पढ़ाई के अतिरिक्त दबाव, इन चारों के बीच संतुलन स्थापित किए बिना हम एक अच्छी शिक्षा नीति की परिकल्पना नहीं कर सकते।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

विनोद शाही

भारत की शिक्षा नीति में विविध भाषाओं के पठन-पाठन से संबंधित जो सिद्धांत अभी तक सबसे अधिक स्वीकृत रहा है, उसे त्रिभाषा फॉर्मूला कहा जाता है। इसके अंतर्गत अंग्रेजी, हिंदी और किसी एक प्रांतीय भारतीय भाषा को छात्रों द्वारा विषय के रूप में चुनने की बात कही जाती है। इससे छात्रों को भाषा ज्ञान तो प्राप्त होता है, पर विविध भाषाओं की अंत:क्रिया की बात, जिसे वास्तव में मूल सिद्धांत होना चाहिए, पीछे छूट जाती है।

इस भाषा नीति से संबंधित दूसरी समस्या अहिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी के शिक्षण से जुड़ी हुई है। खासतौर पर तमिलनाडु जैसे प्रदेश इस त्रिभाषा फार्मूले को दक्षिण भारत पर हिंदी के आरोप के रूप में देखते हैं। एक अन्य समस्या यह है कि प्राथमिक और माध्यमिक पाठशाला के जीवन से संबंधित जो अध्ययन-अध्यापन होता है, उसमें एक से अधिक भाषाओं में प्रवीणता हासिल करने के लक्ष्य से जुड़ा शिक्षण, छात्रों पर अनेक विषय पढ़ने का अतिरिक्त भार डालता है। उनके सामने विषय इतने अधिक हो जाते हैं, कि भाषा के साथ संबंधित अध्ययन उनके लिए ज्ञान विज्ञान को हासिल करने से भी बड़ी चुनौती बन जाता है।

इन सभी बातों को सम्मुख रखते हुए अगर हम भविष्य की शिक्षा नीति में भाषा के पठन-पाठन के संबंध में किसी व्यावहारिक विकल्प को खोज सकें, तो वह न केवल छात्रों के लिए हितकारी होगा, बल्कि भाषा पर आधारित राजनीति और उसके राष्ट्रवाद से संबंधित पक्ष के संदर्भ में भी हमें किसी सम्यक समाधान खोजने की दिशा में ले जाएगा। शिक्षा नीति की सैद्धांतिकी, राजनीति, राष्ट्रवादी सोच और छात्रों पर पड़ने वाले पढ़ाई के अतिरिक्त दबाव, इन चारों के बीच संतुलन स्थापित किए बिना हम एक अच्छी शिक्षा नीति की परिकल्पना नहीं कर सकते। बात जब शिक्षा की होती है, तो हमारे सामने सबसे जरूरी सवाल छात्रों का होना चाहिए। हमें छात्रों को एक ऐसे पाठ्यक्रम को प्रदान करने की बात सोचनी चाहिए, जो उन पर अतिरिक्त दबाव डाले बिना उन्हें- भविष्य के लिए तैयार कर सके।

उन्हें अच्छे रोजगार प्राप्त करने के लिए भी आगे ले जा सके।
और प्रांतीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने महत्त्व को साबित करने लायक बना सके।
ये सभी बातें मुख्यत: छात्रों के हित के संदर्भ में देखी जानी चाहिए। इस संदर्भ में निर्णय करते समय हमें-
प्रांतीय, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय राजनीति को दूसरे स्थान पर रखना चाहिए।
राष्ट्रवाद की बात विचारधारा के रूप में हमारे लिए बहुत महत्त्व रखती है, तथापि उसका शिक्षा नीति के साथ संतुलन और विवेकपूर्ण सामंजस्य बिठाया जाना चाहिए ।
इन बातों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा नीति का व्यावहारिक गठन, उपर्युक्त लक्ष्यों को नीति निर्धारक की तरह ग्रहण करते हुए किया जाना चाहिए।
तो क्या किया जाना चाहिए?
प्राथमिक और मूलभूत बात यह होनी चाहिए कि हम छात्रों को त्रिभाषा फार्मूले के आधार पर तीन विषय पढ़ने के लिए न कह कर एक ही विषय पढ़ने के लिए कहें।
इसे एक ही ‘बहुभाषी विषय’ के पाठ्यक्रम के रूप में तैयार किया जाए।
विविध भाषाओं का ज्ञान इन भाषाओं की अंत:क्रिया को व्यावहारिक बनाने वाला होना चाहिए।
अनेक भाषाओं में समान अधिकार से बातचीत करने और लिख पाने की योग्यता मुख्य होनी चाहिए।
इसलिए उसे साहित्य संबंधी अध्ययन से अलहदा सामान्य भाषा ज्ञान के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
बहुभाषी विषय के पाठ्यक्रम को विविध भाषाओं के बीच की अंत:क्रिया के रूप में तैयार करके इस लक्ष्य को आसानी से हासिल किया जा सकता है।
यह सब कैसे संभव हो सकता है, इस संबंध में कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:
छात्रों को एक ही प्रश्न का उत्तर कई भाषाओं में लिखने के लिए कहा जा सकता है।
एक-एक पंक्ति की प्रश्नोत्तरी के रूप में दोनों या तीनों भाषाओं में अभिव्यक्ति करने की नई परिपाटी का विकास किया जाना चाहिए।
उपर्युक्त रूप में अगर हम एक ही बहुभाषी विषय में सभी भाषाओं को पढ़ाने के संबंध में प्रारूप तैयार कर सकें, तो फिर हम उसी के संदर्भ में उस सवाल से मुखातिब होंगे कि कौन सी भाषाएं पढ़ाई जाएं? यह सवाल इस रूप में उठ सका, तो यह अपनी प्रकृति बदल देगा। फिर वहां राजनीति की बजाय शिक्षा की पठन-पाठन की पद्धति केंद्र में आ जाएगी।
त्रिभाषा फार्मूला एक अरसे से इस लिहाज से अर्थपूर्ण रहा है। अगर अहिंदी प्रदेशों में से कोई एक प्रदेश वहां हिंदी की उपस्थिति को लेकर कुछ दुविधा में नजर आता है, तो हम वहां इस संदर्भ में निम्न रूप में थोड़ा लचीला दृष्टिकोण अपना सत्य हैं।
हिंदी या संस्कृत का अध्ययन करने की बात वहां एक चुनाव के रूप में दी जा सकती है। संस्कृत को क्लासिकी भाषा के रूप में ग्रहण करने की बात वैसे भी उठती रही है। संस्कृत को हिंदी की जगह चुनने के संबंध में अगर दुविधा नहीं हुई, तो उसका परोक्ष प्रभाव हिंदी के पक्ष में मानसिकता तैयार करने वाला ही होगा। इसे भविष्य की दूरगामी सोच के तहत स्वीकार करने लायक बनाया जा सकता है।
यह दूरगामी सोच निम्न रूपों में परिणाम लाने वाली हो सकती है:
अंग्रेजी, हिंदी या संस्कृत और प्रांतीय भाषा, इन तीनों के साथ जुड़े हुए एक ही ‘बहुभाषी’ विषय के पाठ्यक्रम को तैयार करने पर हम इसे किसी एक भाषा के दूसरे पर आरोप के सवाल से बच जाएंगे।
यह स्थिति विविध भाषाओं के बीच आपसी रिश्ते बढ़ाने का हेतु ही अधिक हो जाएगी।
इस बहुभाषागत विषय के अध्ययन में छात्रों को एक ही सवाल के उत्तर अनेक भाषाओं में देने को प्रेरित किया जाए तथा एक भाषा से जुड़े विविध उद्धरणों, वाक्यों के अनुवाद शेष दो भाषाओं में करने से जुड़े प्रश्न ही अधिक दिए जाएं।
इससे किसी एक भाषा के अध्ययन के बजाय भाषाओं के आपसी रिश्ते के संबंध में ही योग्यता हासिल करने की बात केंद्र में आ जाएगी।

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