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मुद्दा: इंटरनेट और लोकतंत्र

गौरतलब है कि वर्तमान क्लाउड-कंप्यूटिंग के दौर में डिजिटलीकरण की विभिन्न प्रक्रियाओं में ‘डाटा’ एक अनिवार्य प्रत्युत्पाद हो चला है।

Author Published on: February 9, 2020 1:08 AM
डाटा ‘संरचित’ और ‘असंरचित’ दो रूपों में उपलब्ध होते हैं।

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड’ यानी ‘सेबी’ ने हाल में डिजिटलीकरण के केंद्रबिंदु ‘इंटरनेट’ पर उपलब्ध विभिन्न वेबसाइटों के डाटा को लेकर कई महत्त्वपूर्ण घोषणाएं की है। इसके निदेशक डाटा के महत्त्व को समझाते हुए कहते हैं कि वित्तीय संस्थाओं के लिए यह ‘चतुर्थ स्तंभ’ है। इसमें प्राथमिक तीन स्तंभ- समाज, प्रक्रियाएं और तकनीक हैं। गौरतलब है कि वर्तमान क्लाउड-कंप्यूटिंग के दौर में डिजिटलीकरण की विभिन्न प्रक्रियाओं में ‘डाटा’ एक अनिवार्य प्रत्युत्पाद हो चला है, जिसमें भाषिक स्रोत के रूप में उपलब्ध पाठ, फोटो, आॅडियो और वीडियो शामिल हैं। डाटा ‘संरचित’ और ‘असंरचित’ दो रूपों में उपलब्ध होते हैं। असंरचित डाटा के अधिकांश स्रोत आज विभिन्न सोशल मीडिया, सामूहिक उपस्थिति और पारस्परिक संपर्क की वेबसाइटें हैं। कंप्यूटर और मोबाइल प्लेटफॉर्म पर इंटरनेट के सहयोग से किए जाने वाले अधिकांश कार्यों में ब्राउजर से लेकर सर्वर तक की सक्रियताओं से हमारा तात्कालिक कार्य तो संपन्न हो जाता है, लेकिन साथ ही इन कार्यों से जुड़े डाटा पर प्राय: कोई न कोई अपना अधिकार जमा रहा होता है और इसे संकलित कर रहा होता है।

इन सभी कार्यों में लोकतंत्र के प्रहरी की दावेदारी में प्रतिस्पर्धारत सोशल मीडिया से जुड़ी वेबसाइटें या एप्प सबसे आगे हैं। यहां तक कि सर्वाधिक लोकप्रिय सोशल मीडिया का प्लेटफॉर्म ‘फेसबुक’ के मालिक ने पिछले ही साल इसे लोकतंत्र का ‘पंचम स्तंभ’ घोषित किया था। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत जो इंटरनेट जनित बाजार के सर्वाधिक उपभोक्ताओं वाले देशों में से एक है, में डाटा और इसके संग्रहण और सुरक्षा आदि पहलुओं से भारतीय समाज ही क्या, सरकारें भी फिलहाल असहाय हैं। व्यापक जागरूकता का अभाव, नीतिपरक रिक्तता और सक्षम वैधानिक प्रावधानों के अभाव में अनेक वैश्विक कंपनियां भारतीय समाज द्वारा इंटरनेट पर सक्रियता के फलस्वरूप एकत्रित डाटा का मुक्त दोहन करती रही हैं और फिर उन्हीं डाटा के आधार पर बनाए उत्पादों को भारतीय सहित वैश्विक समाजों को बेचती और परोसती भी रही हैं।

जबकि इसके बदले होने वाले लाभों से भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार वंचित रही है। ऐसे में ‘सेबी’ की इस सक्रियता का स्वागत किया जाना चाहिए। साथ ही उसकी अग्रिम योजनाओं के प्रति भी आशान्वित होना चाहिए, जिसके अनुसार वह डाटा-संग्रहण के साथ कृत्रिम मेधा और मशीन प्रशिक्षित उपकरणों द्वारा बाजार के रुझानों को विश्लेषित करने, समझने और फलस्वरूप निर्णय लेने की क्षमता विकसित किए जाने की व्यवस्था पर केंद्रित एक परियोजना पर काम कर रही है। हालांकि, इसका केंद्रित लक्ष्य यह है कि सोशल मीडिया से ग्रहित असंरचित डाटा के आधार पर किए गए विश्लेषणों से विभिन्न आर्थिक गतिविधियों को पहले की तुलना में बेहतर और सुरक्षित तरीके से संपादित किया जा सके।

इंटरनेट डाटा सिर्फ वित्तीय क्षेत्र नहीं, बल्कि बदले समय में कंप्यूटिंग, प्रशासन, कृषि, चिकित्सा, शिक्षा, नीति-निर्माण और रोबोटिक्स आदि क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। आज के समय में जब मौसम-चक्र बदल रहा है, तो लोक-कवि घाघ की लोकोक्तियां से आगे जाकर किसानों को मौसम-चक्र को समझने में इससे सहायता मिल सकती है। इसी तरह चिकित्सा के क्षेत्र में नई-नई बीमारियों के लक्षण, उसकी दवाएं विकसित करने और समाज को उन बीमारियों से सचेत रहने के लिए आवश्यक सूचनाएं मिल सकती हैं। इंटरनेट डाटा के आधार पर ही आजकल महानगरों में यातायात नियंत्रण के प्रभावी व्यवस्थापन, नागरिक सुरक्षा और अपराध-नियंत्रण आदि में आवश्यक सहयोग मिलना भी शुरू हो चुका है।

अभी इसी गणतंत्र दिवस की परेड की सुरक्षा में ‘त्रिनेत्र’ नामक प्रणाली काम कर रही थी, जो सार्वजनिक भीड़ से भी कैमरे की सहायता से अपराधी के रूप में पूर्ववत दर्ज व्यक्ति की पहचान कर सकता था। हाल में, खुले में हुई सैकड़ों चोरी और छेड़खानी आदि की घटनाओं को सीसीटीवी के सहयोग से ही घंटों में अपराधियों की पहचान हुई है। इसलिए क्लाउड-कंप्यूटिंग और डाटा-संसाधन के महत्त्व को स्वीकार करने में किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए। समस्या डाटा के नियंत्रण और एकाधिकार की है। इंटरनेट की लोकप्रियता, देश में उपलब्ध इसके व्यापक बाजार और ‘डिजिटल इंडिया’ के नारों के बावजूद अधिकांश इंटरनेट-डाटा पर नियंत्रण अमेरिकी कंपनियां जैसे गूगल और फेसबुक आदि के पास हैं।

यहीं नहीं, देश में निजी वेबसाइटों के सेवा-प्रदाताओं के सर्वर भी अधिकांश देश से बाहर और अधिकतम अमेरिका में ही हैं। उच्च गुणवत्ता, अपेक्षाकृत सस्ता और व्यवस्थित होने के कारण चयन के समय अमेरिकी सेवा-प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए सर्वर वेब-होस्टिंग हेतु एक सहज विकल्प होते हैं। यही नहीं, देश में महत्त्वपूर्ण सरकारी संस्थाओं के बीच आपसी संपर्क के लिए ई-मेल की सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों का केंद्र भी अधिकतर अमेरिका ही हैं। ऐसे में यह स्थिति हिंदी फिल्मों के उस जमींदार की तरह है, जो मजदूरों की मेहनत की कमाई से स्वयं को न सिर्फ समृद्ध करता, बल्कि उन्हीं मजदूरों को महंगी ब्याज दर पर कर्ज भी बांटता है।

वैसे भी किसी बाजार के अंतिम लक्ष्य में समाज एक पूंजी-निर्माण का स्रोत ही होता है और इंटरनेट के बाजार में भारत एक बड़ा बाजार है और हमारा समाज डाटा-संग्रहण का बड़ा स्रोत भी है। हां, इतना जरूर है कि इसी समाज के सैकड़ों युवा इन कंपनियों में रोजगार से भी जुड़े हैं, लेकिन करोड़ों लोग बिना किसी वेतन के कुछ सुविधाओं के नाम पर परोक्षत: मजदूरी भी कर रहे हैं। बल्कि कई मायनों में इसे बंधुआ मजदूर कहना बेहतर होगा।

यहां एक पक्ष निर्भरता का भी है। डिजिटलीकरण की प्रक्रिया के तहत पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग सूचना-प्रौद्योगिकीय साधनों से जुड़ा है और आज सरकार, बाजार और लोकतंत्र सभी की इन साधनों पर निर्भरता बढ़ी है। बल्कि यह देखना भी कितना विस्मयकारी है कि ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि वेबसाइटों पर होने वाले लाइक, शेयर, फालो और ट्रेंड को लोकतंत्र के थर्मार्मीटर की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा है। ध्यान रहे कि इनमें से अनेक माध्यमों पर विभिन्न देशों में चुनाव-प्रक्रिया को प्रभावित करने के गंभीर आरोप लगे और सिद्ध भी हुए हैं।

ऐसे में, ऐसे किसी एक माध्यम पर निर्भरता का होना डरावना ही है। जिस बाजार का उद्देश्य ही लाभ कमाना है, वह हमारा व्यक्तिगत डाटा किसी को न बेचता हो, इसकी गारंटी नहीं है। दूसरा यह कि आज हम जहां आ पहुंचे हैं, वहां कुछ घंटों और दिनों के इंटरनेट बंद होने से अर्थव्यवस्था सहित पूरा तंत्र प्रभावित होने लगा है। तब समाज का इंटरनेट पर और इंटरनेट-संसाधनों का किसी निजी कंपनी पर निर्भर होना, कई बार पूरे तंत्र और लोकतंत्र को बंधक बनाने जैसा होगा। दूसरी तरफ इन सभी वेब-माध्यमों द्वारा एकत्रित डाटा पर अमेरिका केंद्रित कंपनियों का वर्चस्व होना सुखद कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि कल वहां से कोई इन्हीं डाटा के आधार पर हमारी सरकारों से मोल-भाव भी कर सकता है।

हालांकि देश में पिछले संसद सत्र में सरकार लंबी तैयारी के बाद ‘व्यक्तिगत डाटा सुरक्षा बिल’ लेकर आई है, जिसके तहत देश में विभिन्न वेब-माध्यमों द्वारा प्रयुक्त डाटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक प्राधिकरण बनाने की बात की गई है। यह भी कहा गया है कि देश का डाटा देश से बाहर के सर्वर में न जाए, लेकिन जब तक यह प्रभावी रूप से काम न करने लगे, तब तक डाटा की सुरक्षा, संसाधन और इससे होने वाले आर्थिक नुकसान को रोकना कठिन है।

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी

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