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मुद्दा: अंतिम उपाय नहीं कर्जमाफी

नीति निर्माताओं को इस सच्चाई से आंख नहीं मूंदना चाहिए कि किसान के तनावों का अंत अगर भविष्य को सोचते हुए करना है, तो केवल वित्तीय कर्जमाफी से काम नहीं चलेगा।

Author January 27, 2019 4:08 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Express Archives)

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

अब विशेषज्ञ, आमजन और खुद प्रबुद्ध किसान नेता भी मानने लगे हैं कि बार-बार की कर्जमाफी किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकती। कर्जमाफी कोई इलाज नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में बहुत सारे किसान परिवारों के पास आधा हेक्टेयर जमीन भी नहीं है। इतनी कम जमीन पर साल भर परिवार पालने लायक उगाना और बचे हुए को बाजार में बेच कर लाभ कमाना लगभग असंभव है। मौसम की मार अतिरिक्त अनिश्चितता पैदा कर देती है। ऐसे में किसान के लिए कर्ज लौटाना आसान नहीं होता। सामान्यतया एक किसान परिवार की औसतन प्रति माह जितनी आय होती है, उससे ज्यादा परिवार का औसत खर्च होता है। इसलिए किसान परिवार कर्जे की स्थिति में रहता है। नतीजतन, सरकारों और राजनीतिक दलों को कर्जमाफी की घोषणा करनी पड़ती है। हालांकि बहुत पहले केंद्रीय वित्तमंत्री ने चेताया था कि जो राज्य किसानों की कर्जमाफी करेंगे, उन्हें इसके लिए अपने वित्तीय संसाधन अपने आप जुटाने होंगे। पर आज तक राज्य एक के बाद एक किसानों की कर्जमाफी की घोषणाएं करते रहे हैं।

किसान की कर्जग्रस्तता तभी कम होगी, अगर उसकी फसल उत्पादन की लागत में कमी आए। पर हो उसके उलट रहा है। कारण है कि जमीन के फसल उगाने में खपे पोषक तत्वों की फिर से जमीन में समय से वांछित भरपाई होने में दिक्कतें आ रही हैं। कृषि के लिए पोषक क्षेत्र कहे जाने वाले क्षेत्रों में भी जिनसे पोषक तत्वों की सतत आपूर्ति की संभावनाएं खेती में बनी रहती थीं, वहां भी पारिस्थितिकीय अवमूल्यन हुआ है या प्रतिबंध उपजे हैं। मसलन, पहाड़ी क्षेत्रों में समीप के जंगल और उनकी जैव विविधता तथा जलागम क्षेत्रों में मृदा संरक्षण और जल संरक्षण की उचित व्यवस्था न होने से पहाड़ी खेती के लिए भरोसेमंद पोषक क्षेत्र के अंश योगदान में कमी आई है।

उत्पादन लागत कम करने के उपायों के रूप में जैविक खेती अपनाने का सुझाव दिया जा रहा है। अगर कम लागत और उत्पादों के अच्छे दामों की प्राप्ति के लिए जैविक खेती अपनाई जानी ही है, तो उसके लिए भी जैव विविधता की बहुत आवश्यकता है। साथ ही स्वस्थ जलागम क्षेत्रों और पोषक क्षेत्रों के रूप में अच्छे चारागाहों की बहुत आवश्यकता है। जैविक खेती बिना जैव विविधता और पशुपालन के नहीं हो सकती। सो, इसके लिए भी संवेदित होना और समझदारी बनाना आवश्यक है कि किसानों का बैंकों से लिया गया कर्ज सरकार भुगतान तो कर देगी, पर उस कर्ज को लौटाने के भी प्रावधान होने चाहिए, जो हम खेत की मृदा से हर फसल चक्र में लेते रहते हैं। खासकर सूक्ष्म पोषक तत्वों के रूप में। खेतों से जब तेज बहाव के कारण या नंगे क्षेत्रों से आंधी हवा के कारण जो मृदा की ऊपरी परत का क्षरण होता है, वह भी प्रकृति से लिया गया कर्ज है, जो समय से और उचित राशि में न लौटाया गया, तो देर-सबेर यह किसान की ऋणग्रस्तता को भी बढ़ा देगा। क्योंकि जब औद्योगिक और सघन खेती की बात हो रही हो तो बैंकों से ज्यादा ऋण लेने की आवश्यकता ही नहीं रहती, बल्कि मिटट्ी से भी ज्यादा संसाधन जुटाने की जरूरत हो जाती है।

मिटट्ी का ठीक से संरक्षण न हो, तो खेतों की ऊपरी सतह पर जो पोषक पूरक रसायन डाले भी जाते हैं वे बरसात के साथ बह जाते हैं। शहरीकरण की भूख, नगर निकायों का प्रसार तथा कई लेनों वाले राजमार्गों और नहरों के पटने के कारण भी किसानों का खेती करना मुश्किल हुआ है। इनके कारण भी पोषक तत्वों का भूमिगत रिसाव और उनकी मात्रा बाधित हुई है। प्रदूषण खेती और बगीचों पर प्रतिकूल असर डाल रहा है। ये सब भी जमीन के उन पोषक तत्वों के संसाधन बैंक को क्षरित करते हैं, जिनसे किसान अब तक ऋण लेता रहा है और उसके उत्पादन को सहायता मिलती रही है। जब किसान के मित्र जीवों, पक्षियों, तितलियों, केचुओं, परागण में मददगार कीट-पतंगों में कमी हो जाती है तो मौद्रिक सहयोग बहुत कारगर नहीं होते हैं।

वैज्ञानिक मंगला राय ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जहां तीन दशक पूर्व किसान एक किलो नाइट्रोजन, पोटाश और फास्फोरस का उपयोग कर पचास किलो गेहूं पैदा करते थे, वहां आज वे उससे केवल आठ किलो गेहूं पैदा कर पा रहे हैं। निस्संदेह इनमें बीजों के प्रकार की भी भूमिका होगी। बोरोन, मैग्नीज, मौलीबींडम, कॉपर, जिंक, आयरन, कैल्शियम, क्लोरीन, मैग्नीशियम, नाइट्रजेजन, फास्फोरस, सल्फर फसलों की आवश्यकता सूक्ष्म पोषक के रूप में पूरा करते हैं। किसान पर जमीन का भी कर्ज है। सरकार उसके इस ऋण मोचन पर भी सोचे।

एक बात और वैज्ञानिक संदर्भों में समझी जानी चाहिए। स्वाइल कार्ड या मृदा कार्ड से जमीन के रासायनिक तत्वों की जानकारी केवल मृदा की रसायनिक स्थितियों या मृदा रसायनशास्त्र से संबंधित होती है। पर खेती के उत्पादन सुधार में मृदा की भौतिक स्थितियों जैसे उनकी रंध्रता, ठोसपन आदि की मददगार स्थितियों का भी होना लाभप्रद रहता है। किसानों को इस क्षेत्र में भी आवश्यक जानकारी दी जानी चाहिए।

कुछ मामलों में सरकारें भू-उपयोग में बदलाव की अपनी नीतियों के चलते उपरोक्त संदर्भों में अपने को भी कठघरे में पाएंगी। किसान के खेतों के पास की जमीनों को जब आसान भू-उपयोग के बदलाव के बाद ऐसे कारक पैदा हो जाते हैं, जो उस किसान के खेत में, जो अब भी खेती करना चाहता है, नमी की कमी हो जाती है। कारखानों के अपशिष्टों से घातक रसायनों का प्रवाह होने लगता है, धुंआ बढ़ जाता है, तो भी किसान जमीन से संसाधन लेने के बावजूद कर्ज की भरपाई करने में असमर्थ होने लगता है।

इसलिए किसान पर जमीन की उधारी बनी रहती है। सरकार उसके ऋण मोचन पर भी सोचे, बेशक उसके लिए प्रदर्शन नहीं हो रहे हैं। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का मानना है कि खेती की ऋण माफी की घोषणा राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्रों और वादों का हिस्सा नहीं होना चाहिए। एक पत्र में एक आम नागरिक ने लिखा था कि किसान कर्जमाफी अगर ऐसे ही होती रही तो कृषि सरकारी खजाना भरने के बजाय खाली करने का काम करेगी। इसी परिप्रेक्ष्य में इस तथ्य पर भी ध्यान देना चाहिए कि जिस तरह व्यावसायिक एकल फसल हो रही है तथा साथ ही खेतों को पारंपरिक तौर का आराम नहीं दिया जा रहा है, उससे जमीन के कृषि पोषक तत्वों का खजाना भी खाली हो रहा है। एक फसल के बाद तुरंत दूसरी फसल बोने की आपाधापी भी किसान के पराली जलाने का एक कारण है।

ऐसे कारनामों से खजाना और खाली हो रहा है। पहले पारंपरिक ढंग से किसान ऐसी फसलें और ऐसा फसल चक्र अपनाते थे कि पिछली फसल में लगी जमीन के सूक्ष्म तत्वों की लागत अगली बोई फसल से हो जाती थी। न भूलें कि उगी हुई फसलों की छिपी लागत प्रकृति वहन करती है। यह लागत वायुमंडल से भी मिलती है और जमीन से भी। चूंकि किसान सीधे दाम देकर इसे नहीं खरीदता है, इसलिए उसकी तरफ से कर्जमाफी की मांग नहीं आती है। पर जिम्मेदार सरकारों के नीति निर्माताओं को इस सच्चाई से आंख नहीं मूंदना चाहिए कि किसान के तनावों का अंत अगर भविष्य को सोचते हुए करना है, तो केवल वित्तीय कर्जमाफी से काम नहीं चलेगा।

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