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दूसरी नजर: चौकीदार नहीं, सक्षम प्रबंधक चाहिए

चौकीदारी एक सम्मानजनक काम है जो सदियों से चला आ रहा है। सभी समाजों और पृष्ठभूमियों के लोग चौकीदारी करते आए हैं। यह सामान्य काम है और अलग-अलग लोग यह काम करते हैं।

Author March 24, 2019 3:11 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फोटोः पीटीआई)

चौकीदारी एक सम्मानजनक काम है जो सदियों से चला आ रहा है। सभी समाजों और पृष्ठभूमियों के लोग चौकीदारी करते आए हैं। यह सामान्य काम है और अलग-अलग लोग यह काम करते हैं। उदारीकरण ने घरों से लेकर व्यावसायिक दफ्तरों को सुरक्षा गार्ड मुहैया करा कर इसे एक नए संगठित कारोबार के रूप में खड़ा कर दिया। इन चौकीदारों के पास कोई हथियार नहीं होता, सिर्फ बैंकों की सुरक्षा में तैनात गार्ड ही हैं जिन्हें बगल में हथियार रखने की इजाजत मिली हुई है। मोटे तौर पर, दिन हो या रात बगैर किसी घटना के गुजर जाता है। और यह ऐसे ही चलता रहता अगर श्री नरेंद्र मोदी ने घमंड के साथ अपनी पार्टी के लोगों को अपने नाम से पहले ‘चौकीदार’ लगाने का आदेश नहीं दिया होता। कुछ ही घंटों में भाजपा के दावे की एक और मिसाल देखने को मिल गई- पच्चीस लाख लोग चौकीदार बन चुके थे। यह एलान किया गया कि मोदी इनसे बाचतीच करेंगे। मुझे लगता है अगला पड़ाव गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रेकार्ड है।

सर्कस चालू है
भाजपा राज में शासन एक सर्कस बन चुका है। एक रिंग मास्टर है, लेकिन उसमें शेर या बाघ नहीं हैं। मेमनों और खरगोशों पर चाबुक चलाया जा रहा है। बेशक ऐसे पर्याप्त जोकर हैं जो कहेंगे कि 2019 के बाद चुनाव नहीं होगा।
जबकि कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इस सर्कस का मजा ले रहे हैं। ऐसे लोगों की तादाद काफी बड़ी है जो प्रासंगिक सवाल पूछ रहे हैं। एक के बाद एक सर्वे से यह रहस्योद्घाटन हो चुका है कि लोगों की जो दो सबसे बड़ी चिंताएं हैं उनमें एक बेरोजगारी और दूसरी किसानों का संकट, खासतौर से कर्ज का बोझ।
हर दिन गुजरने के साथ ही बेरोजगारी भी साफतौर पर बढ़ती दिखाई दे रही है। मीडिया द्वारा गायब कर दिए जाने के बावजूद नेशनल सैंपल सर्वे आॅर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) की हैरान कर देने वाली खबर जगजाहिर है। एनएसएसओ नियत अवधि पर श्रम बल का सर्वे (पीएलएफएस) करवाता है। पिछली बार 2011-12 में यह सर्वे हुआ था, उसके बाद 2017-18 में हुआ। राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग ने अंतिम रिपोर्ट को दिसंबर 2018 में मंजूरी दी थी, लेकिन भाजपा सरकार ने इसे जारी नहीं किया। रिपोर्ट को दबाए रखने का विरोध करते हुए आयोग के दो बाकी सदस्यों- पीसी मोहनन और जेवी मीनाक्षी ने भी जनवरी 2019 में इस्तीफा दे दिया। इस बारे में सरकार की ओर से स्पष्टीकरण का एक शब्द भी नहीं आया है।
इस रिपोर्ट से जो बातें निकल कर आर्इं, वे ये हैं-
-शहरी भारत में पुरुष बेरोजगारी की दर 7.1 फीसद है और ग्रामीण भारत में 5.8 फीसद।
-कामगारों की संख्या (जिसमें शहरी और ग्रामीण इलाकों के पुरुष और महिलाएं शामलि हैं) में 4.7 फीसद की गिरावट आई है और इनकी संख्या बयालीस करोड़ से घट कर 37.3 करोड़ रह गई है।
-ग्रामीण क्षेत्रों में चार करोड़ तीस लाख रोजगार खत्म हुए और शहरी क्षेत्रोंं में चालीस लाख।
-ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के रोजगार ज्यादा खत्म हुए, जबकि शहरी इलाकों में पुरुषों के रोजगार ज्यादा गए।
ये आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि बेरोजगारी बढ़ी है और ग्रामीण क्षेत्रों में संकट ज्यादा गहराया है। सरकार इन दोनों ही से इनकार करती है और पीएलएफएस की परेशानी में डालने वाली सच्चाई को दबा दिया गया है।

अभूतपूर्व बेरोजगारी
दूसरे आंकड़े भी पीएलएफएस के नतीजों की पुष्टि करते हैं। सीएमआइई की रिपोर्ट में कहा गया है कि फरवरी 2018 में कुल कामगारों (नौकरी में लगे लोगों की संख्या) की संख्या चालीस करोड़ पचहत्तर लाख थी, जो फरवरी 2019 में घट कर चालीस करोड़ कह गई। सीएमआइई ने यह भी बताया कि 2018 में एक करोड़ दस लाख रोजगार खत्म हुए। तमिलनाडु के उद्योग मंत्री ने विधानसभा में बताया कि नोटबंदी और जीएसटी की वजह से राज्य में पांच लाख रोजगार खत्म हो गए।
किसी भी शहर में चले जाइए- अमदाबाद के अखबार नगर में, जयपुर के थड़ी बाजार चौक या इंदौर के खजराना चौक, आप देखेंगे कि दिहाड़ी मजदूरों की आमद अब पहले के मुकाबले आधी से भी कम रह गई है और ये और ज्यादा गरीबी हो गए हैं। खलासी (हेल्परों) के 62907 पदों पर भर्ती होनी है। इसके लिए बयासी लाख से ज्यादा लोगों ने आवेदन किया है। आंकड़ों के मुताबिक इनमें चार लाख उन्नीस हजार एक सौ सैंतीस बीटैक स्नातक हैं और चालीस हजार सात सौ इक्यावन इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्रीधारी हैं!
सत्ता में बैठे चौकीदार शायद सोचते होंगे कि उनका काम घरों की निगरानी है, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं कि उन घरों में रहने वाले बेरोजगार हैं या उनकी नौकरियां जा रही हैं।

किसानों के साथ जुल्म
इसी तरह की कहानी कृषि क्षेत्र में गहराते संकट की है। डा. अरविंद सुब्रह्मण्यम ने पिछले आर्थिक सर्वे में (2017-18) भाजपा सरकार को इस बात के लिए गंभीर रूप से दोषी ठहराया था कि पिछले चार साल में वास्तविक कृषि जीडीपी और वास्तविक कृषि राजस्व का स्तर स्थिर बना हुआ है।
सरकार इस बात के दोषी निकली कि –
-एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) में उचित बढ़ोतरी से इंकार कर देना, इसका नतीजा यह हुआ कि उत्पादकों के दाम गिर गए,
– खरीद व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जाना; शांता कुमार कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी खरीद व्यवस्था से सिर्फ छह फीसद किसानों को ही फायदा पहुंचा,
– आयात निर्यात नीति को लेकर बहुत ही निराशाजनक स्खिति; भारत से होने वाले कृषि निर्यात पर रोक या प्रतिबंध (जैसे प्याज और आलू) और भारत में उन चीजों का आयात करना जिनसे यहां के किसानों पर असर पड़ा (जैसे दालों का आयात),
– बीज, खाद, डीजल, बिजली, पानी, किराए की मशीनरी आदि के बेलगाम होते दामों को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाना,
– खाली शेखी बघारना कि किसानों की आमद दोगुनी हो जाएगी, लेकिन गैर-फसल कृषि के जरिए किसानों की आय बढ़ाने में मदद के लिए कोई कदम नहीं उठाना,
– नोटबंदी से तबाह हुए सीमांत और छोटे किसान जो और ज्यादा कर्ज में फंसते चले गए, और ऐसे किसानों का कर्ज माफ नहीं करना।
किसानों को लेकर ये सारे पाप करते हुए चुनाव के मौके पर हर किसान परिवार को दो हजार रुपए यानी का सत्रह रुपए रोजाना का चुनावी तोहफा थमा दिया गया!
कर्ज बोझ का पैमाना देखें (नाबार्ड के अनुसार प्रति किसान एक लाख चार हजार रुपए) तो कर्ज माफी आर्थिक और नैतिक रूप से जरूरी थी। भाजपा सरकार ने कर्ज माफी से साफ इनकार कर दिया और छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में इस गलती की उसे कीमत चुकानी पड़ी।
भाजपा सरकार का अनुभव हमें यह बताता है कि वक्त की जरूरत कुशल आर्थिक प्रबंधकों की है, सिर्फ खुद चौकीदार बन जाने की नहीं।

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